मुक्तिबोध का व्हाट्सएप नंबर : शरद कोकास की कविता

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4.01.2018

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक चुटकुला चल रहा है ” एक नवोदित कवि ने एक वरिष्ठ कवि से पूछा ..’सर, आपके पास मुक्तिबोध का व्हाट्सएप नंबर है क्या ?” फिर उस दिन गंगाशरण सिंह की पोस्ट पढ़ी तो उन्होंने हल्के -फुल्के मज़ाक के साथ कहा कि उस नवोदित कवि को बताना चाहिए था कि ‘मुक्तिबोध का व्हाट्स एप नम्बर’ शरद कोकास के पास है, वे पुरातत्ववेत्ता हैं और सबका रिकॉर्ड रखते हैं .

. मैंने इस बात को गंभीरता से लिया ..मन में यह बात घुमड़ती रही कि क्या सचमुच यह पीढ़ी मुक्तिबोध से अनभिज्ञ है ? फिर अभी दो दिन पहले राजनांदगांव स्थित मुक्तिबोध के निवास पर जाना हुआ ..वहीं इस कविता ने जन्म लिया .. लीजिये आप भी पढ़िए ‘ मुक्तिबोध का व्हाट्स एप नंबर’ ..साथ में कुछ चित्र उस मकान के , रानी ताल और बंद हो चुकी बी एन सी मिल के हैं .अगर आपने मुक्तिबोध की कविताएँ पढ़ी होंगी तो इसमें प्रयुक्त कई शब्द आपके जेहन में होंगे ही …

शरद कोकास 

*मुक्तिबोध की हस्त लिपि में उनका यह एक गीत जो एक जर्जर से कागज़ पर राजनांदगांव के मुक्तिबोध स्मारक में काँच की एक प्लेट के नीचे रखा है जिसे मैं अपने मोबाइल के स्कैनर से स्कैन करके ले आया ।*

  • *शरद कोकास*

 

( सभी चित्र शरद कोकास )

 

***

मुक्तिबोध का व्हाट्सएप नंबर

 

रानी तालाब के घाट की सीढ़ियों पर
कुछ शब्दों के पाँवों के निशान हैं
एक पुराने खण्डहर से मकान की खिडकी पर
बैठे हैं कुछ शब्द शून्य में निहारते

अभी अभी आत्महत्या की है कुछ शब्दों ने
कूदकर बूढ़े ताल की गहराइयों में
कुछ शब्द थके-हारे चढ़ रहे हैं
अनंत की ओर जाने वाली चक्करदार सीढियाँ

बी एन सी मिल की ढही हुई चिमनियों के क़रीब
विचित्र प्रोसेशन के अंतिम सिरे पर
पाँव घिसटते चल रहे हैं कुछ ज़ख़्मी शब्द

शहर के कुख्यात हत्यारे डोमाजी उस्ताद ने
ख़रीद लिए हैं तमाम पुस्तकों के बाज़ार
जहाँ प्रकाशित होने वाली किताबों से
लोकहित पिता की भांति
बेदख़ल कर दिए गए हैं तमाम शब्द
जो जीवन की व्यर्थता पर उसे कोंचते थे

काँच की प्लेटों के नीचे
जर्जर हो चुके पन्नों में
अन्यमनस्क सी लिपि में लिखे कुछ शब्द
अपने ही बांधवों को
सुन्दर सुसज्जित किताबों में देखकर
बेचैन हैं

टेरियर कुत्तों के जबड़ों के बीच फंसे शब्द
लाल गरमीले रक्त और लार में
डूबते उतराते हैं अपनी व्यर्थता में

वे शब्द अब भी उपस्थित हैं
गुज़रे ज़माने के चेहरे पर पड़ी झुर्रियों में
अथवा मन की परित्यक्त सूनी बावड़ी की
गहराइयों में पैठे
भय के ब्रह्मराक्षस के होंठों पर

वे नहीं पहुँच पाए
कला के उत्तुंग शिखरों की कगार पर
कि उन्हें भी डर लगता रहा ऊँचाइयों से
क़ैद हो गए कुछ शब्द
बुद्धिजीवियों की समझ के
सागौनी दरवाज़ों के भीतर
जंग खाई चिटकनियों को हिलाकर
ढूँढते रहे वे बाहर आने का रास्ता
जो उन्हें पीड़ित शोषित
जनता के हड़ताली पोस्टरों तक पहुँचाता था

भूखे बच्चों की तरह अब भी बाहर हैं वे शब्द
चमचमाते दावतखानों की परिधि से
कि अब कवियों की यह नई यह पीढ़ी
उन्हें तलाश रही है आभासी संसार में

मिलेंगे ज़रूर उन्हें वे शब्द
मीलों गहरे अतीत के सर्वग्रासी अंधेरों में
कि उन्हें उतरना होगा वहाँ तक
बिना किसी जी पी एस सिस्टम के

पहुँचना होगा मनुष्यता के उस दौर तक
जब नहीं थे कोई रास्ते मन बहलाने के
अपने भीतर की अंधी सुरंगों से बाहर आने के
तमाम दरवाज़े भी बंद हो चुके थे

उन्हें सुनाई देगी
यातनाओं के बीहड़ से आती एक आवाज़
अब तक क्या किया जीवन क्या जिया !
अरे मर गया देश जीवित रह गए तुम !

वे शायद तभी अंतर कर सकेंगे
उस देश और आज के राष्ट्र में
फ़र्क कर सकेंगे
मोबाईल के स्क्रीन से आती रौशनी
और जीवन के कठिन अंधेरों में

जहाँ आज भी ज़रूरी सवालों पर
चुप हैं कविजन साहित्यिक
चित्रक शिल्पकार और नर्तक
अपनी मुखरता की अनभिज्ञता में
उन तमाम शब्दों की तलाश में
एक बार मुक्तिबोध तक पहुँचने के बाद
वे फिर कभी किसी से नहीं पूछेंगे
आपके पास मुक्तिबोध का व्हाट्स एप नंबर है क्या ?

***

शरद कोकास

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