लोया मामला: मौत से जुड़े सारे रिकार्ड गायब, पुलिस ने मानी दस्तावेजों से छेड़छाड़ की बात.: विश्वदीपक की रिपोर्ट, नवजीवन से साभार.

बड़ी ख़बर , , रविवार , 04-02-2018

जनचौक ब्यूरो 

सीबीआई जज बीएच लोया की रहस्यमय मौत में एक और नाटकीय मोड़ आ गया है। जज लोया की मौत के सिलसिले में नागपुर के जिस थाने में मामला दर्ज किया गया था, वहां से जज लोया की मौत से जुड़े सारे रिकॉर्ड गायब हो गए हैं। इतना ही नहीं, इस थाने के 2014 के सारे के सारे रिकॉर्ड भी गायब हैं।

जज बीएच लोया की 1 दिसंबर, 2014 को नागपुर में रहस्यमय हालात में दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। लोया वहां अपने एक साथी की बेटी की शादी में शामिल होने गए थे। उस समय जज लोया बेहद संवेदनशील मामले, सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ कांड के मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे। इस मुकदमे में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी आरोपी थे।

जज बीएच लोया की मौत पर सवालिया निशान लगते रहे हैं। इस बात पर भी सवाल उठे थे कि कथित तौर पर सीने में दर्द की शिकायत पर जब जज लोया को 1 दिसंबर को सबसे पहले नागपुर के जिस डांडे अस्पताल ले जाया गया था, वहां के ईसीजी की रिपोर्ट पर 30 नवंबर, 2014 की तारीख क्यों लिखी है?

 

अब खुलासा हुआ है कि नागपुर के जिस सीताबुल्डी थाने में जज लोया की मौत का मामला दर्ज हुआ था, वहां के 2014 के सारे रिकॉर्ड गायब हैं। इन रिकॉर्ड में जज लोया की मौत की केस डायरी भी शामिल है। पहली दिसंबर 2014 को ही इस मामले को सीताबुल्डी थाने से नागपुर के सदर थाने में स्थानांतरित कर दिया गया था। जज लोया की मौत की मूल रिपोर्ट (मराठी में इसे मर्ग खबरी कहते हैं), को सदर थाने के दस्तावेजों के साथ महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया है।

कारवां पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक, “जमा कराए गए दस्तावेजों में नागपुर के सीताबुल्डी थाने में दर्ज दुर्घटनावश हुई मौत की रिपोर्ट भी शामिल है। मेडिट्रिना अस्पताल, इसी थाने के कार्यक्षेत्र में आता है। इस रिपोर्ट में जज लोया की मौत की तारीख और समय 30 नवंबर, 2014 को सुबह 6.15 पर मिनट दिखाया गया है, जो कि जज लोया की मौत के एक दिन पहले की तारीख है।”

लेकिन, इस रिपोर्ट की जो कार्बन कॉपी सीताबुल्डी थाने में रह गई थी, उसमें दर्ज मौत की तारीख और समय अलग है। नेशनल हेरल्ड ने कैरावान पत्रिका में प्रकाशित इस तथ्य को तो नहीं देखा है, लेकिन, नेशनल हेरल्ड के पास सीताबुल्डी थाने में मौजूदा मौत की रिपोर्ट की कार्बन कॉपी की प्रति है, जिस पर सीताबुल्डी थाने की मुहर भी लगी है। इस रिपोर्ट को गौर से देखने पर पता चलता है कि घटना की तारीख और मामला दर्ज करने की तारीख जानबूझकर पहले 30 नवंबर 2014 लिखी गई, बाद में इसे बदलकर 1, दिसंबर, 2014 कर दिया गया। थाने में मौजूद कार्बन कॉपी में घटना का समय सुबह 4 बजे दर्ज किया गया है, जबकि मौत का समय कार्बन कॉपी में पहले सुबह 6.30 बजे लिखा गया, जिसे बाद में बदलकर सुबह 8.30 बजे कर दिया गया। वैसे मौत का समय 6.15 बजे रिकॉर्ड किया गया है।

इस रिपोर्ट की कार्बन कॉपी के पिछली तरफ, हाथ से मराठी में एक नोट लिखा गया है। इसे सीताबुल्डी थाने के सीनियर इंस्पेक्टर हेमंत कुमार खराबे ने लिखा है। इस नोट में उन्होंने कार्बन कॉपी में क्रमांक 5,6 और 7 में ओवर राइटिंग यानी फिर से लिखने की बात को माना है। क्रमांक 5,6 और 7 में ही रिपोर्ट दर्ज करने के समय और तारीख को दिखाया गया है। सीताबुल्डी थाने की मुहर के साथ लिखे गए सीनियर इंस्पेक्टर खराबे के नोट का अंग्रेजी अनुवाद बताता है कि, “जब असली दस्तावेजों की जांच की गई तो सामने आया कि मर्ग खबरी यानी डेथ रिपोर्ट के क्रमांक 5,6 और 7 में ओवर राइटिंग की गई है। असली कॉपी को जीरॉक्स (फोटोकॉपी) किया गया है और यह सत्य है।”

जज लोया की मौत के मूल मृत्यु प्रमाण पत्र की कार्बन कॉपी के पिछले भाग में हाथ से लिखी टिप्पणी  को रेखांकित किया गया है। यह टिप्पणी नागपुर के सीताबुल्डी थाने के सीनियर इंस्पेक्टर हेमंत कुमार खराबे ने लिखी है और माना है कि क्रमांक 5,6 और 7 में ओवर राइटिंग (पहले से लिखे के साथ छेड़छाड़) की गई है

नेशनल हेरल्ड को 26 जनवरी, 2018 का एक और दस्तावेज मिला है। इस दस्तावेज पर सीताबुल्डी, नागपुर के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की मुहर लगी है। इस दस्तावेज में कहा गया है कि चूंकि यह केस सदर थाने को स्थानांतरित कर दिया गया था, इसलिए सीताबुल्डी थाने के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि उन्होंने नागपुर मेडिकल कॉलेज में पोस्टमार्टम के बाद जज लोया का शव अपनी सुपुर्दगी में लेने वाले डॉ प्रशांत राठी की पहचान की पुष्टि की थी या नहीं। राठी ने शव अपनी सुपुर्दगी में लेते समय बताया था कि ‘जज लोया उसके अंकल के रिश्तेदार थे।’

नेशनल हेरल्ड ने शव सुपुर्दगी, जिसे मराठी में वरस पावती कहते हैं, के कागज को देखा है, जिस पर साफ लिखा है कि डॉ प्रशांत राठी के परिचय के रूप में लोया के अंकल का कज़न (चचेरा भाई) बताया गया है। इस रसीद पर सीताबुल्डी थाने की तरफ से हस्ताक्षर किए गए हैं।
वारिस पावती यानी शव सुपुर्दगी की रसीद से स्पष्ट है कि जज लोया के पार्थिव शरीर को डॉ. प्रशांत राठी (नाम रेखांकित) को सौंपा गया था। उनके परिचय के रूप में उन्हें जज लोया के अंकल का कजन यानी चचेरा भाई बताया गया था। इस पर सीताबुल्डी थाने की तरफ से हस्ताक्षर किए गए हैं।

 

सीताबुल्डी, नागपुर के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की मुहर वाले 26 जनवरी, 2018 के इस दस्तावेज से ही यह भी सामने आया है कि जज लोया के शव को नागपुर से लातूर जिले के गातेगांव में उनके पैतृक घर जो गाड़ी और चालक लेकर गए थे, उसका भी कोई विवरण सीताबुल्डी थाने की डायरी में उपलब्ध नहीं है।

26 जनवरी, 2018 का वह दस्तावेज जिसे नागपुर के सीताबुल्डी के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की तरफ से जारी किया गया है। इसमें साफ कहा गया है कि सीताबुल्डी थाने में 2014 की स्टेशन डायरी गायब है, जज लोया का शव ले जाने वाले वाहन और उसके चालक का विवरण उपलब्ध नहीं है और डॉ प्रशांत राठी की पहचान की पुष्टि हुई थी या नहीं, इसका भी विवरण नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में जज लोया की रहस्यमय मौत और उनकी मौत के हालात की जांच की मांग करने वाली याचिकाओं की सुनवाई हो रही है। इसी 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर दोबारा सुनवाई की। इस केस में अब अगली सुनवाई 5 फरवरी यानी सोमवार को होगी।

(विश्वदीपक की रिपोर्ट, नवजीवन से साभार)

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