असग़र वजाहत  की चिट्ठी जलेस के साथियों के नाम .

जनवादी लेखक संघ के मित्रो,

यह खुशी की बात है कि आप लोगों ने मेरे ऊपर इतना विश्वास किया कि मुझे संगठन का अध्यक्ष बना कर सम्मान दिया।आप सब का बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे इस योग्य समझा। हालांकि मैं अपने मुंहफट विचारों के लिए और यहाँ तक कि वामपंथ की आलोचनाएं करने के लिए कुख्यात हूं। लेकिन मेरा मानना है कि “जिनको मतलब नहीं होता वो सताते भी नहीं” । मतलब वामपंथ की आलोचना वही करते हैं जिनको वामपंथ से लगाव है । तो मैंने यही किया है और आशा है कि आगे भी करता रहूंगा।

यह दुःख की बात है कि कुछ गंभीर कारणों से मैं सम्मेलन में शामिल न हो सका। लेकिन मित्रों के माध्यम से जानकारियां मिलती रहती थीं ।यह खुशी की बात है जलेस ने इस माहौल में भी सक्रियता दिखाई है और संगठन को नया रूप दिया है।

देश किधर जा रहा है और क्यों जा रहा है, आप लोग मुझसे ज्यादा जानते हैं ।उसके बारे में कहकर मैं आपका समय नहीं लेना चाहता हूं। मैं तो केवल यह सोचता हूं कि अब हमें करना क्या है? यह दौर एक तरह से निराशा का दौर है लेकिन निराशा से तो काम नहीं चलता ‘नासिर’ काज़मी का शेर है-

बैठे हो क्यों हार के, साए में दीवार के
शायरों, सूरतगरों कुछ तो किया चाहिए

मैं समझता हूं कि वैसा बहुत कुछ किया जा सकता है जो हमें बहुत कठिन लगता है। सिर्फ काम करने की इच्छा होनी चाहिए। यह केवल मेरा ही मानना नहीं है मेरे कई मित्र ऐसा मानते हैं और हमने इसे करके भी देखा है। इच्छा है तो वह हो सकता है जिसकी इच्छा है और अगर इच्छा नहीं है तो वह काम नहीं हो सकता जो हम करना चाहते हैं, जो हमको करना है, चाहे जितने साधन हों। एक और जरूरी बात यह है कि जो व्यक्ति काम करने के बारे में कह रहा है, काम करने की प्रेरणा दे रहा है अगर उसी को अपने ऊपर विश्वास नहीं होगा तो दूसरे क्यों विश्वास करेंगे? इसलिए सबसे पहले तो हमें अपने ऊपर पक्का विश्वास होना चाहिए कि ‘हां’ जो काम हम चाहते हैं जरूर होगा।

मिलजुल कर लिए गए निर्णयों पर मुझे पक्का विश्वास है और काम करने का यही तरीका है कि हम एक नियम और पद्धति के अनुसार मिलजुल कर काम करें ।लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हम कोई नया काम न करें। हम चुनौती भरा काम न करें। हम ऐसा काम न करें जो जब तक नहीं किया। हम नए प्रस्तावों के लिए अपना दिमाग खुला रखें, सलाह जरूर दें, कुछ नया करने की बात जरूर करें। इसलिए कि गति बनी रहना जरूरी है और नया काम और नई दिशाएं गति देते हैं।

देश के नेताओं ने इतनी बड़ी बड़ी बातें कर ली हैं कि अब बड़ी बातें करने से डर लगने लगा है। लेकिन आगे के लिए कुछ सोचना जरूरी है ।मैं आपके साथ अपनी व्यक्तिगत और निजी राय साझा कर रहा हूं। यह हो सकता है संगठन की भी राय हो या हो सकता है इससे अलग हो।

मेरा यह मानना है की सभी प्रगतिशील जनवादी संगठनों को साथ मिलकर कुछ बड़े कार्यक्रम, जिसमें बड़े स्तर पर लोग शामिल हो सके, विशेष तौर पर युवा शामिल हो सकें, करने चाहिए। युवा लेखकों के संकलन भी निकाले जाने चाहिए । लेखक संगठनों का यह पहला कर्तव्य होना चाहिए कि वे युवा पीढ़ी की भागीदारी को सुनिश्चित करें।

साहित्य को अन्य कलाओं के साथ जोड़ना बहुत आवश्यक है। उदाहरण के लिए नाटक, संगीत, चित्रकला और फिल्म जैसे माध्यमों से साहित्य का जुड़ाव बहुत जरूरी है। बहुत से मित्र हो सकता है ‘उत्सवधर्मिता’ के खिलाफ हों। लेकिन मेरा मानना है के हमारे कार्यक्रमों में कहीं-कहीं उत्सवधर्मिता को भी शामिल किया जाना चाहिए। मतलब यह है कि साहित्य और समाज की गंभीर व्याख्या, आलोचना करने के लिए सेमिनार, संगोष्ठी, वाद विवाद,परिचर्चा और लोकार्पनों के साथ साथ साथ-साथ कुछ ऐसा भी होना चाहिए जिससे बड़े स्तर पर लोगों को जोड़ा जा सके। इस तरह का काम मराठी साहित्य के कुछ संगठन बड़ी सफलता से करते हैं।

मेरा यह भी मानना है की साहित्यिक कार्यक्रमों के स्वरूप पर बातचीत करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों का स्वरूप बहुत पुराना, उबाऊ, जड़ और व्यक्ति केंद्रित बन गया है जिसमें जाने वालों, सुनने वालों की भागीदारी लगभग शून्य होती है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि साहित्यिक कार्यक्रमों के स्वरूप पर बात की जाए और उन्हें रोचक और जीवंत मनाया जाए।

मुख्य बात यह है कि आज के हालात में सांस्कृतिक हस्तक्षेप जितना जरूरी हो गया है उतना शायद पहले कभी नहीं था। इसलिए बड़े स्तर पर जनवादी सांस्कृतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है

आमतौर से साधनों की कमी की चर्चा बहुत की जाती है। आशा की जाती है कि पहले साधन हों उसके बाद कार्यक्रम शुरू किए जाएं। मुझे लगता है कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे तो साधन जुटेंगे और यदि कार्यक्रम शुरु ही नहीं होंगे तो साधनों का जुटना बहुत मुश्किल है।अच्छे कार्यक्रमों के लिए बिना शर्त सहयोग भी मिलता है और मिल सकता है। लेकिन निश्चित रूप से ऐसा सहयोग लेते समय पूरी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। दूसरी समानधर्मा संस्थाओं के साथ भी कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। इस संदर्भ में व्यापक नजरिया है अपनाने के बारे में सोचना चाहिए।

हो सकता है, और जरूर होगा कि बहुत सी जरूरी बातें कहने से रह गयी होंगी।पर जैसा कि मैंने पहले लिखा है यह तो मेरे कुछ विचार हैं। पर पत्र मुख्य रुप से संगठन के सदस्यों और पदाधिकारियों के प्रति आभार और धन्यवाद ज्ञापन है।

असग़र वजाहत

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