हीरा निकालने के लिए ग्रामीणों को मारने की साज़िश! : जन चौक से तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट

01.02.2018

एक नज़र इधर भी , रायपुर, बुधवार , 31-01-2018

जनचौक से आभार सहित 

तामेश्वर सिन्हा 


तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। 2010 में त्रिविक्रम श्रीनिवास के प्रोडक्शन में बनी साउथ की फ़िल्म ‘कलेजा’ आई थी। इसमे अमूल्य खनिज संपदा यूरेनियम निकालने के लिए एक गांव के हवा, पानी में जहर मिला दिया जाता है, ताकि पूरा गांव खाली कराया जा सके और आसानी से खनिज को बाहर निकाला जा सके। इसके बाद गांव के लोग बीमारियों से मरने लगते हैं। यह एक फ़िल्म की काल्पनिक कहानी है, लेकिन आज यही छत्तीसगढ़ के एक गांव सुपेबेड़ा में सही बैठ रही है।

सुपेबेड़ा में पेयजल की समस्या से होने वाली मौतों का सिलसिला जारी है। अब तो ग्रामीणों का कहना है कि हीरा खदान क्षेत्र से लोगों को निकालने के लिए उन्हें साजिशन मारा जा रहा है। 

 

सुपेबेड़ा, गरियाबंद। साभार : गूगल

सुपेबेड़ा गरियाबंद जिले के देवभोग विकास खंड अंतर्गत आता है। यहां के पानी और मिट्टी में हैवी मैटल पाए गए हैं, जिसके वजह से सालों से लगातार मौतें हो रही हैं। पिछले साल 2017 में 11 मौतें होने से ये गांव एक बार फिर सुर्खियों में आया। ग्रामीणों के मुताबिक किडनी और लीवर खराब होने से अब तक 109 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि सरकार करीब 58 मौतों की बात स्वीकार करती है। इस समय गांव की आबादी 1,135 है और करीब 235 लोग इस रोग से ग्रसित बताए जाते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक बीमारों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

29 जनवरी को सुपेबेड़ा के दर्जन भर ग्रामीण आम आदमी पार्टी के नेताओं के साथ राजभवन पहुंचे और रीडर को राज्यपाल के नाम ज्ञापन दिया। इसके बाद मीडिया से बात करते हुए ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि उनका गांव हीरा खदान क्षेत्र में होने की वजह से सरकार उन्हें यहां से बाहर निकालना चाहती है। यही वजह है कि उन्हें इलाज बिना मारा जा रहा है। हालांकि सरकार ने रायपुर के सबसे बड़े अंबेडकर अस्पताल में इस गांव के लिए अलग से एक वार्ड बनाया है जहां किडनी पीड़ितों का इलाज किया जाता है। सरकार यहां इलाज का पूरा खर्च उठाने का भी दावा करती है।

आम आदमी पार्टी के प्रदेश संयोजक डॉ. संकेत ठाकुर ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि हीरा और एलेक्जेंडराइट खदानों से भरपूर ग्राम सुपेबेड़ा के ग्रामीणों को वहां से विस्थापित करने का अंतराष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है। यह सिर्फ संयोग मात्र नहीं है कि अवैध उत्खनन के बाद से ही पानी प्रदूषित हुआ हो।

सुपेबेड़ा से एक किमी की दूरी पर हीरा खदान स्थित है। 1996-97 में यह सर्वे हुआ था। सरकार ने 2004-05 में पूरे इलाके को संरक्षण में ले लिया। खदान को मुरुम कंक्रीट डालकर बन्द कर दिया गया, उसके बाद ही सुपेबेड़ा और आस-पास खदान क्षेत्र में किडनी की बीमारी शुरू हो गई। 

डॉ. संकेत ठाकुर ने सवाल उठाया कि सरकार की जांच में जब पानी प्रदूषित होने का खुलासा हो चुका है तो सरकार पेयजल स्वच्छ करने का कोई उपाय क्यों नहीं कर रही है? सरकार की यह उदासीनता स्वाभाविक रूप से एक बड़े षड्यंत्र का इशारा करती है।

आप पदाधिकारियों के साथ सुपेबेड़ा गांव के रहवासी ने पत्रकार वार्ता में बताया कि शासकीय अधिकारियों के कथन के आधार पर 58 मौत हो चुकी है, लेकिन आज सुपेबेड़ा में करीब 235 लोग किडनी, लीवर की बीमारी से ग्रसित हैं। छोटे बच्चों, महिलाओं के चेहरों व पैरो में सूजन दिखाई दे रही है। कम उम्र की माता, बहन, बहू विधवा हो गई हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव में जो एक बार बिस्तर पर लेट गया उसकी मौत निश्चित है। ग्रामीणों के मुताबिक वर्ष 2005 से किडनी ग्रसित मौतों का सिलसिला चल पड़ा है। कुछ साल पहले ही देवभोग विकासखंड क्षेत्र में काफी लोग कि मृत्यु मलेरिया से भी हुई थी।

  • इस सब समस्या को लेकर मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक से गुहार लगाई जा चुकी है। लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अजय चन्द्राकर ने मृतक आश्रितों को 20-20 लाख रुपये मुआवजा देने का भी एलान किया था  लेकिन ये मुआवज़ा आज तक नहीं मिला। इसका अलावा मौतों का सिलसिला कैसे रुके इसके लिए कोई ठोस प्रयास भी नज़र नहीं आ रहे।

बीच-बीच में गांव वालों को दूसरी जगह बसाने की बात कही जाती है लेकिन गांव वाले इसका विरोध करते हैं। उनके मुताबिक वे अपनी ज़मीन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।

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