हिंसा के बूचड़खाने में सत्य का बीफ : कनक तिवारी 

30.01.2018

यह तीस जनवरी की तारीख तवारीख की परतों पर बार बार आंख की किरकिरी बनकर हमारी कौम की यादों से निकलती नहीं है। हर तीस जनवरी की शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर गांधी मरते हैं। वे एक सौ पच्चीस वर्ष जीने वाले थे लेकिन उन्हें हत्यारा बल्कि हत्यारे हर वर्ष अस्सी पार नहीं करने देते। यह बूढ़ा आदमी मुकम्मिल तौर पर अहिंसक, कड़वी जबान से बचता, गाय के बदले बकरी का दूध पीता, अपनी कालजयी जिद की मुद्रा में ब्रिटिश हुकूमत की कौरव सेना से टकराने का जोखिम उठाता बेहद खौफनाक तरीके से धरती से तो उठा दिया गया।

नाथूराम गोडसे फकत हाथ का नाम है। हत्यारे विचार का नाम तो पूरा संसार जानता है। गांधी उस विचार को असुविधाजनक लग रहे थे। वह विचार भारतीय जीवन के लिए असुविधाजनक माहौल बनाने की कुशल साजिश कर रहा था। गांधी ने नई इबारतें, मौलिक रवायतें और असहज राष्ट्रीय आदतें जनता के लिए गढ़ीं। विज्ञान के साथ संगति बिठाकर आध्यात्म की परिधि को क्षितिज तक फैलाया। वह मनुष्य था लेकिन फेनोमेना बनकर रह गया। धीरे धीरे मिथक पुरुष बना दिया जाएगा। यही सबसे बड़े वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने कटाक्ष में कहा है। दीवानखानों और कहवाघरों से लेकर निठल्ले बौद्धिक क्लबों में उसे हर विरोधी तर्क का मुंह बंद करने इस्तेमाल किया जाता है.

गांधी का जीवन एक औसत व्यक्ति की तरह था। देहधरे के दोष की तरह बुराइयों के मकड़जाल उस पर लिपटते भी रहे। वेश्या, चोरी, सिगरेट, शराब, मांसाहार, ब्रम्हचर्य बनाम यौन परस्त्री का आकर्षण वगैरह अच्छे बुरे अनुभवों और आमंत्रण की औसत जिंदगियों की तरह गांधी में भी आवक जावक का लेखा जोखा रहा है। यह सरासर गलतबयानी है कि गांधी पढ़ाई में तृतीय श्रेणी और एक गाल में थप्पड़ खाकर दूसरा गाल सामने करने के हिमायती थे। उनकी अहिंसा में अभय था। उसका स्त्रोत महाभारत की गीता में है। उन्होंने कृष्ण और अर्जुन दोनों भूमिकाओं को अपने तईं गड्डमगड्ड भी किया। महाभारत की भौतिक हिंसा में उन्होंने और विनोबा ने अहिंसा की विजय ढूंढ़ ली। वे वांगमय में अकेले हैं जिसका मर्म यदि हर भारतीय समझे तो पूरब का यह देश रोशन रहने के लिए विचारों में बांझ नहीं रहेगा।

हिंदू धर्म को हिंदुत्व का समानार्थी बनाने वाले भाषा विन्यास के लाल बुझक्कड़ और बहुरूपिए मंदबुद्धि नहीं हैं। वे गांधी के अंधे भक्तों से कहीं ज्यादा उनकी इबारत की धार को समझते हैं। वे नहीं चाहते लोग गांधी को पढ़ें और उनके पास जाएं। उनसे संवाद करें। जिरह करें। उनकी कालजयी मुस्कराहट में भी उस वेदना को देखें जो पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति की जीवन की सांस थी। क्या जरूरत है सरकारी सब्सिडी लेकर मक्का मदीना जाने या नहीं जाने का वितंडावाद बनाने की। क्यों जरूरी है कि वोट बैंक पुख्ता करने के लिए चुक गए बुजुर्गों को विचार अनाथालय बनाते तीर्थ यात्रा में रेवड़ बनाकर भेज दिया जाए। क्या जरूरत है अय्याश मंत्रियों को करोड़ों रुपयों की खर्चीली जिंदगी में फबते रहने की।

 

गांधी ने सौ बरस के पहले कहा था। ऐसे भी डाक्टर हैं और रहेंगे भी जो मरीज की लाश को वेंटिलेटर पर डालकर उसके गरीब परिवार का आर्थिक बालात्कार करेंगे। वे जानते थे कि अंगरेजी नस्ल की अदालतों, जजों और उनमें कार्यरत कारिंदे और दलाल बना दिये जाने वाले वकीलों की फौज गलतफहमियों में उलझे भाइयों और पक्षकारों को अपना पेट पालने की रसोई के किराने का पारचून समझेंगी। सब कुछ वैसा ही हो रहा है।

 

गांधी निर्भीक और साहसी थे लेकिन भाषा में सभ्यता और शाइस्तगी थी। वे नामालूम, लाचार और कुछ टुटपुंजिए कलमकारों की तरह नहीं थे जो सेठियों के चैनल और अखबारों में सच और ईमान की मिट्टी पलीद करते अट्टहास भी करते हैं। दक्षिण अफ्रीका में साधन नहीं होने पर भी और फिर हिंदुस्तान में उनके अखबारों ने जो सच लिखा उसकी मुस्कराहट के सामने बर्तानवी हुकूमत का गुस्सा अपनी हेकड़बाजी के बावजूद पानी भरता रहता था। गांधी ने मनुष्य की जिंदगी को कुदरत का करिश्मा बताया। वह गाय को गोमाता कहते अंगरेज के खिलाफ विद्रोह कर सकते थे। जाहिल जनता को बता सकते थे कि गोमाता वैतरणी पार कराती है। गाय की सेवा में अपना जीवन झोंक देने के बावजूद उन्होंने गाय को केवल पशु कहा।

 

वे हिन्दू मुस्लिम, हिन्दू ईसाई और सभी धर्मों और जातियों की एकाग्रता का प्रतीक थे। केवल मिलावट के नहीं। बस यही वह बिंदु था जो कुछ संकीर्ण विचारकों को पसंद नहीं आया। तिलिस्म यही है कि अब जो सौ करोड़ के पार हैं वे दूसरे मजहब के पंद्रह करोड़ से इतनी प्रतिहिंसात्मक स्थायी नफरत करें कि उससे परिणाममूलक वोट सत्ता में चिपके रहने के लिए बरसते रहें। गांधी ने हमारी कौम को प्यार, भाईचारा, कुर्बानी और पारस्परिकता का पाठ पढ़ाया। बहुमत उनके साथ था। फिर भी माचिस की एक साम्प्रदायिक तीली उनके विचार पुस्तकालय को जलाती रहती है। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी पराजय का बोध लिए लेकिन दृढ़ हनु के साथ वे आजादी के दिन नोआखाली में हिन्दू मुसलमान भाइयों के बीच फैली हिंसा के मुकाबिल इंसानी चट्टान के रूप में खड़े हो गये।

 

आज भी गांधी यादों की किरकिरी हैं। देश के करोड़ों नौजवान बेकार हैं। उनकी शिक्षा को मस्तिष्क से घुटनों की ओर यात्रा कराई जा रही है। समृद्ध परिवारों में कम से कम एक सदस्य को विदेश भगाया जा रहा है। नेता और उद्योगपति गंभीर बीमारियों में विदेश जाकर ही मरना चाहते हैं। झूठ, फरेब, झांसा, धोखा पीठ पर वार, चुगली, अफवाह सबका बाजार सेंसेक्स पर काॅरपोरेटिए उछलवा रहे हैं। वे ही देश के मालिक हैं। गांधी नहीं जानते थे नेता आगे चलकर उनकी कठपुतलियों की तरह अभिनय करेंगे। बुद्धिजीवी जीहुजूरी की धींगामस्ती करते वजीफा, पद और पद्म पुरस्कार पाएंगे। किसानों को आत्महत्या ब्रिगेड में बदला जाएगा। महिलाएं सड़कों से लेकर दफ्तरों और धर्म संस्थानों में भी देह बनाकर कुचली जाएंगी। अफसर खुद को गोरों की जगह गेहुंआ अंगरेज कहेंगे। सब मिलकर गांधी को कभी कभी मसलन साल में दो दिन जबरिया आए मेहमान की तरह बेमन से हाय हलो करेंगे। फिर अगले दिन इतिहास की गुमनामी की पगडंडी पर जाता देखते मुस्कराकर टाटा करते रहेंगे। त्रासद यही है कि वे जिन्न नहीं हमारी जिंदगी हैं। इसलिए मरते भी नहीं हैं।

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कनक तिवारी ,अधिवक्ता और विचारक 

 

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