गोहत्या के मुद्दे पर आरएसएस और भाजपा का पाखंड स्वत: स्पष्ट है ; प्रकाश करात

गोहत्या के मुद्दे पर आरएसएस और भाजपा का पाखंड स्वत: स्पष्ट है ; प्रकाश करात 



गाय के नाम पर
0 प्रकाश कारात
दादरी में जो कुछ हुआ था, न तो महज एक विचलन था और एक अलग-थलग घटना। गाय का मांस खाने का झूठा आरोप लगाकर, दादरी के एक गांव में मोहम्मद अखलाक की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दिए जाने के बाद से, गोहत्या के बहाने से किए जा रहे ऐसे हमलों की बाढ़ ही आ गयी है। इसी सिलसिले की एक कड़ी के तौर पर हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में मवेशियों को ले जा रहे एक ट्रक पर हमला कर, 20 वर्षीय नोमान की हत्या कर दी गयी। इसके फौरन बाद ऊधमपुर में, कश्मीर घाटी से कोयला ले जा रहे एक ट्रक पर आग के जरिए हमला किया गया। इस हमले में जलने के चलते 23 वर्षीय जाहिद खान की मौत हो गयी। यह हमला भी इस दुर्भावनापूर्ण अफवाह के फैलाए जाने के चलते हुआ था कि उसने दो गायें मारी थीं।

इन हत्याओं के अलावा मैनपुरी में गोहत्या के ही आरोप में उग्र भीड़ ने दो मुसलमानों को पीट-पीटकर, मौत के दरवाजे पर पहुंचा दिया। बाद में यह सचाई सामने आयी कि उन्हें एक हिंदू परिवार ने अपनी मरी गाय, खाल उतारकर ठिकाने लगाने का काम सौंपा था। उसके बाद उत्तर प्रदेश के ही बहराइच जिले में एक मुस्लिम नौजवान, अफसर को एक भीड़ ने पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। उसका कसूर इतना था उसके पास बैल की खाल थी, जो उसने ढोल की मरम्मत के लिए खरीदी थी। विडंबना यह है कि अफसर और उसके चचेरे भाई को गोहत्या निरोधक कानून के तहत जेल भेज दिया गयाजबकि उस पर हमला करने वालों को गिरफ्तार तक नहीं किया गया है।
                ये सिर्फ बढ़ती असहिष्णुता के उदाहरण नहीं हैं बल्कि मुस्लिम समुदाय को निशानाबनाकर पिछले कुछ अर्से से लगातार चलाए जा रहे कथित गोहत्या-विरोधी अभियान के कुफल हैं। पीछे हमने जितनी  भी घटनाओं का जिक्र किया है उन सभी में, गोहत्या के विरोध के नाम पर जिन लोगों को मारा गया है या घायल किया गया है, सब के सब मुसलमान हैं। ये घटनाएं वर्षों से जारी आरएसएस प्रायोजित प्रचार अभियान का ही नतीजा हैं। तरह-तरह की ‘‘गोरक्षा’’ कमेटियों तथा संगठनों का कुकुरमुत्ते की तरह फैल जाना, इसी घृणा मुहिम की अभिव्यक्ति है। विश्व हिंदू परिषद ने पिछले साल अपने स्वर्णजयंती वर्ष में एक देशव्यापी अभियान का एलान किया था, जिसमें गोहत्या के मुद्दे को भी प्रमुखता से रखा गया था।

                गोहत्याविरोधी अभियान उस सांप्रदायिक विचारधारा का ही हिस्सा है, जिसे मुसलमानों को हिंदुओं तथा उनके धार्मिक विश्वासों का दुश्मन बनाकर पेश करने के लिए ही गढ़ा गया है।

माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश कारात का स्तंभ "लोक लहर"

माकपा के पूर्व महासचिव प्रकाश कारात का स्तंभ “लोक लहर”
 पांजचन्य में हाल ही में प्रकाशित लेख में जो यह कहा गया है कि वेदों में गोहत्या करने वाले के प्राण लिए जाने का प्रावधान है, आरएसएस की विचारधारा के ही तर्क का विस्तार है।
इसी प्रकार, जब हरियाणा के भाजपायी मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टïर सार्वजनिक रूप से यह एलान करते हैं कि मुसलमान इस देश में तभी रह सकते हैं, जब गोमांस खाना छोड़ दें, तो वह इसी का सबूत पेश कर रहे होते हैं कि हिंदुत्ववादी नजरिए से मुसलमानों के साथ बराबर के नागरिकों वाला बर्ताव किया ही नहीं जाता है।

लोकसभाई चुनाव के अपने प्रचार अभियान के दौरान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथाकथित ‘‘गुलाबी क्रांति’’ का शोर मचाया था और जान-बूझकर भैंस के मांस को गोमांस से गड्डïमड्डï करते हुए, देश से मांस के बढ़ते निर्यात को हमले का निशाना बनाया था।
                केंद्र में मोदी का राज कायम होने के बाद से ही देश भर में आरएसएस तथा उसके अनेकानेक बाजू, हमारे समाज का संप्रदायीकरण करने तथा सांप्रदायिक आधार पर उसका पुनर्गठन करने में जुटे हुए हैं। इस सांप्रदायिक परियोजना के सतत रूप से चल रहे होने तथा गहराई तक पहुंचा दिए जाने का पता, इस मामले में पुलिस, प्रशासन और यहां तक कि न्यायपालिका तक का जिस तरह का व्यवहार देखने को मिल रहा है, उससे लग जाता है। मिसाल के तौर पर मैनपुरी में मरी गाय की खाल उतारने वाले मुसलमानों को, सांप्रदायिक भावनाएं भडक़ाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उधर हिमाचल प्रदेश का हाई कोर्ट तो केंद्र सरकार से तीन महीने के अंदर इस पर विचार करने के लिए कहने की हद तक चला गया है कि देश के पैमाने पर गोकशी और गोमांस या गोमांस उत्पादों की बिक्री पर पाबंदी लगाने का कानून बनाया जाए।

                बहरहाल, सबसे खतरनाक यह है कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर इस तरह के सोचे-समझे हमलों के सामने, नागरिकों के रूप में उनके अधिकारों की रक्षा करने में और उनके साथ बराबर के नागरिकों जैसा सलूक करने में शासन विफल हो जाता है। इन हमलों के पीछे इसकी सोची-समझी कोशिश है कि परांपरागत रूप से मवेशियों के व्यापार तथा चमड़े के कारोबार में लगे, दसियों हजार मुसलमानों की रोजी-रोटी पर कुठाराघात किया जाए। इस मुहिम की अगली चोट, पशुओं की खाल उतारने और चमड़ा कमाने के काम में लगे दलितों पर पड़ेगी।
                गोहत्या के मुद्दे पर आरएसएस और भाजपा का पाखंड स्वत: स्पष्ट है। इसका मुसलमानों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में उन्हें न तो किसानों की परेशानियों से कोई फर्क पड़ता है और न आवारा मवेशियों की बेहिसाब बढ़ती संख्या से। 2012 की मवेशी जनगणना के अनुसार, देश में अनुमानत: 53 लाख आवारा मवेशी हैं जिनमें गाय, भेंस तथा सांड़ शामिल हैं। भाजपा-शासित राज्यों में दूध देना बंद कर चुकी गायों को काटने पर प्रतिबंध लगा होने का नतीजा यह हुआ है कि वहां के किसानों को इस तरह के अनुपयोगी मवेशियों को बेचने जो भी थोड़ी-बहुत आय हो सकती थी, उससे वंचित कर दिया गया है और उन्हें इन मवेशियों को आवारा बनाकर छोडऩा पड़ रहा है, जिससे ये मवेशी भूखों मरते हैं। लेकिन, गोभक्ति का दिखावा करने वालों को इस सबकी कोई परवाह ही नहीं है, क्योंकि इतने आवारा मवेशियों का पेट भरने पर 100 रु0 प्रति मवेशी प्रतिदिन का खर्चा आए तब भी, इस पर साल में कम से कम 20,000 करोड़ रु0 का खर्चा करना होगा।
                गाय तथा अन्य मवेशियों को काटने पर देश के पैमाने पर प्रतिबंध किसी तरह से नहीं लगाया जा सकता है। गाय को हथियार बनाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने में लगे सांप्रदायिक विष-वमन करने वालों की काट करने के लिएएक कारगर अभियान छेड़ऩा जरूरी है
इस विघटनकारी हिंदुत्ववादी एजेंडा के जरिए जनता की ज्वलंत समस्याओं की ओर से ध्यान बंटाने की कोशिश की जा रही है, जैसे दाल के अनाप-शनाप तरीके से बढ़े हुए दाम, खेती का संकट और रोजगार के घटते हुए अवसर। जनता केा गोलबंद करना होगा ताकि इन विघटनकारी हरकतों को रुकवाया जा सके और जनता अपने जीवन की वास्तविक समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर सके।

0

Leave a Reply