“ऐसे नहीं जाना था, लेकिन तुम चले गए ” : प्रताप को कुछ इस तरह याद किया नथमल शर्मा ने .

 

25.01.2018

अपनी भूमिका निभा कर चले गए प्रताप ठाकुर। ख़ूब जिया जीवन। वैसे ही जीते रहे जैसे चाहते थे जीना । बहुत सारे लोग अनचाहा जीते हैं। अपनी चाहतों को जिम्मेदारी और मज़बूरी की चट्टान के नीचे दबाए हुए। पर कम लोग होते हैं जो मनचाहा जी लेते हैं। प्रताप ऐसा ही था । मनचाहा जीवन ज़िया।

पांचवे छठवें दशक का मध्य वर्ग । आज़ादी के आंदोलन की बुझती सी ताप बची थी समाज में। राजनीति में भी थोड़े से मूल्य और नेहरू का नायकत्व भी । हां, नेहरू की नीतियों से उपजे विकास और भयावह विस्थापन की पीड़ा भी भोग रहे थे हमारी हम उम्र के लोग। तेज़ी से घूम रहा था विकास का पहिया और उतनी ही तेज़ी से समाज में असमानता बढ़ रही थी । इस असंतुलन को साधने की किसी ने कोशिश नहीं की । पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था की चाशनी में लपेट कर विकास और समाज के हवाले कर दिया गया। ऐसे ही माहौल में एक बहुत ही सुन्दर बच्चे का जन्म हुआ। बहुत गोरा रंग और नीलापन लिए चमकती आंखें। खुशियाँ मना पाते कि पिता साथ छोड़ गए और फिर मां भी । नाना नानी के पास और फिर बड़े पिता के पास रहकर बड़े हुए प्रताप ठाकुर।

बहुत गरीबी, अभाव सब देखा। जो उस समय का हर तबका भुगत रहा था। जिस समय मुक्तिबोध अंधेरे में लिख रहे थे उस समय प्रताप और हम जैसे बहुत सारे किशोर वय के लोग गहरे अंधेरे को जी रहे थे जिसमें भूख से अंतड़ियां कुलबुलाती थीं फिर भी आंखों में एक सपना पलता था । खुद को इससे उबार लेना है। परिवार को कुछ बेहतर हालात देना है। कुछ ऐसा ही सोचते हुए प्रताप ने फोटोग्राफी थामी और मैंने पत्रकारिता। अब तक हमारी मुलाकात नहीं हुई थी।

कोई चालीस बरस पहले का बिलासपुर। और उसमें भी जूना बिलासपुर । एक बहुत पुराना सा मकान। जिसकी पहली मंजिल पर भारत स्टुडियो। शाम के धुंधलके में वहां पहुंचा। एक गोरा और एक सांवला सा , ये दो युवक बैठे थे। अपना परिचय दिया तो दोनों ही बेहद गर्मजोशी से मिले। प्रताप भाई और रफ़ीक भाई से ये पहली मुलाकात थी जिसकी तपन आज तक महसूस करता हूँ। बिलासपुर आ रहा था तब ललित भैया ने जिन दो चार लोगों से मिल सकते हो कहा था उनमें से दो से थी ये पहली मुलाकात। फिर तो मुलाकातों का सिलसिला कभी नहीं थमा।

पत्रकारिता मैं ज्ञान भैया और हबीब भाई के साथ मिलकर करते रहा लेकिन बौद्धिक विमर्श इन्ही मित्रों के साथ। अनेक सहमति-असहमतियों के बावजूद साथ चलते रहे। ये दोनों मित्र सर (राजेश्वर सक्सेना ) के यहां अक्सर जाते और उतना ही मेरे घर मिश्रित दफ़्तर में आते। सब लड़ रहे थे भूख से तब भी लेकिन तब तक इस लड़ाई में दुनिया के गरीबों की भूख भी शामिल हो गई थी । प्रगतिशील आंदोलन के साथ दुनिया को बदलने का सपना भी। मेरी भावुकता या संवेदनशीलता पर तो पत्रकारिता की व्यवहारिकता और थोड़ी निर्ममता की परत थी लेकिन प्रताप भाई बहुत ही भावुक हो जाते। अन्याय और असमानता पर बहुत गुस्सा आता उन्हें। पतित हो रही राजनीति और जीवन मूल्यों पर भी। शायद ऐसी ही भावुकता या नई टेक्नालॉजी की खर्चीली फ़ोटोग्राफी को प्रताप भाई साध नही पाए और भारत स्टुडियो का डार्क रूम बंद हो गया।

जूडस और प्रामिथ्यूस नाम के दो बहुत ही सुन्दर बच्चे भी तब तक उनके घर से लेकर टूरी हटरी की गलियों तक धमा-चौकड़ी मचाने लगे थे और सत्य भाभी उन्हें संभालने में ,लेकिन प्रताप भाई के सामने तो काम – काज की चिंता थी । हालांकि इसे उन्होंने कभी भी बहुत साझा नहीं किया। ख़ुद को समाज के लिए समर्पित ही कर दिया हो जैसे ।प्रगतिशील लेखक संघ के सबसे उत्साही और सक्रिय साथी के रूप में काम करते रहे। हम लोगों की चर्चा में साहित्य, सिनेमा और समाज ही ज्यादातर रहा। कभी-कभी उनका वो डाक टिकट और सिक्कों का शौक भी । हां, पढ़ने की समझ और तमीज जो सर से मिली उसका भरपूर उपयोग किया। बहुत कुछ पढ़ना और उससे ज्यादा इकट्ठा करने का जुनून रहता। जो कुछ इकट्ठा करते उसे बच्चों की उत्सुकता से बताया भी करते प्रताप । और हां, याद बहुत रखते। तुरंत बता भी देते।

एक बार महाबलेश्वर में हम लोग एक फिल्मी गीत पर बात कर रहे थे । याद नहीं आ रहा था गाया किसने है। मैंने वहीं से प्रताप को फोन लगाया और उन्होंने तुरंत बता दिया कि आशा भोंसले ने गाया है। साथ ही फिल्म और संगीत कार का नाम भी बता दिया।

मेरी कई यादगार रिपोर्टिंग में भी वे साथ रहे। एक गांव बस्ती-बगरा । बहुत कठिन यात्रा। उसकी रिपोर्टिंग में भी वे साथ रहे। यह रिपोर्ट देश की सर्वश्रेष्ठ ग्रामीण रिपोर्ट के रूप में चुनी गई और राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार भी मिला । शहर की कई रिपोर्ट्स में उन्होंने तस्वीरें खींची या उपलब्ध कराई। हमारे परिवार के लगभग सभी सदस्यों की फोटो खींची। मैं चाहता था कि माँ की एक अच्छी सी फोटो प्रताप भाई खींचे। पर नहीं हो पाया । मेरी बेटियों का बचपन प्रताप की खींची तस्वीरों से मुस्कुराता है हमारे घर में।

बहुत सी बातें हैं । कवि सोमदत्त की कविता ” किस्से अरबों हैं ” की तरह बहुत सारे किस्से भी । बहुत अच्छा जीवन जिया तुमने प्रताप। अनचाहा नहीं मनचाहा। लेकिन तुम चले गए, ऐसे नहीं जाना था । जानता हूँ तुम अनचाहे ही गए हो । इसलिए साथ रहोगे हमारे सदा ।

(कैंसर का आघात और फिर वो दौर …उस बारे में फिलहाल कुछ लिखना कठिन है । बहुत कुछ लिख लेना कठिन होता है। )

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