हिंसा-नफरत की राजनीति के बीच तोगडिया के अश्रुपात : दीपक पारचोर

 

प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ‘नवभारत’ (छत्तीसगढ़-ओडिशा संस्करण) में  प्रकाशित  लेख।

विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव और आक्रामक हिंदू नेता डॉ. प्रवीण तोगडिया द्वारा यह आरोप लगाना कि उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है औऱ उनके खिलाफ एनकाउंटर की साजिश रची जा रही है, भले ही कुछ लोगों को स्तब्ध कर गया हो, परंतु जिनमें सामान्य बुद्धि भी है, उनके लिए यह कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हिंसा और घृणा पर आधारित व्यक्तिगत या संस्थागत राजनीति का जिन्होंने अध्ययन किया हो, वे जानते हैं कि यह रणनीति बूमरेंग की तरह पलटकर इन हथियारों के चलाने वालों पर ही अंततः वार करती है। यह एक बार पुनः सिद्ध हो गया है। उम्मीद है कि तोगडिया के ये अश्रु उन सब लोगों को सोचने पर मजबूर करेंगे, जिनका विश्वास हिंसा, बदले की भावना, नफरत और समाज को तोड़ने की नीति में है।

सामाजिक और राजनैतिक स्तरों पर देश में नफरत और हिंसा के उत्स ढ़ूंढ़ने के लिए बहुत पीछे जाने की बजाय हाल की कुछ घटनाओं पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। यह पुनर्विचार से अधिक आत्ममंथन का अवसर है। फिर भी, 1990 के दशक की शुरूआत भारत में जहां एक ओर विज्ञान व टेक्नालॉजी के विकास के साथ नईं अर्थव्यवस्था के रूप में हुई, वहीं दूसरी ओर हमारी राजनीति ने साम्प्रदायिकता, जातीय, मतभेद, नफरत और हिंसा के अनेक दृष्टांतों के साथ इस कालखंड में प्रवेश किया। मंडल आयोग से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने और कई दंगों से लेकर गोधरा कांड तक पहुंचते-पहुंचते देश की राजनीति के रथ के पहिए हिंसा और घृणा के दलदल में गहरे धंस चुके हैं। लगभग सभी राजनैतिक दल इन दो तत्वों के सहारे मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर सत्ता पाना चाहते हैं और जिन्हें मिल गई है वे उसे इन्हीं भावनाओं को बढ़ाते हुए बचाए हुए हैं। व्यवहारिक स्तर पर जहां इस हिंसा आधारित विचारधारा का इस्तेमाल चुनावी सफलता के लिए किया गया, उससे कहीं अधिक इसके घातक प्रयोग हमारी राजनीति ने वैचारिक स्तर पर किए हैं। जीवन और समाज से अहिंसा, भाई-चारे तथा सामुदायिक सौहार्द्रता का महत्व लगातार घटाया जाता रहा है। इसके लिए महात्मा गांधी प्रवर्तित शांति-अहिंसा के सूत्रों का मजाक उड़ाया गया, अंबेडकर अनुस्यूत सामाजिक समरसता के सिद्धांतों को मटियामेट करने के प्रयास किये जाते रहे और देश की आधुनिक वैज्ञानिक चेतना व नवाचारों को तो जैसे पूरी तरह नेस्तनाबूद करने का बीड़ा ही उठाया गया। किसी भी सभ्य समाज में एक-दूसरे के प्रति आदर और प्रेम के बुनियादी सिद्धांतों को खत्म करने के प्रयास लगभग हर राजनैतिक संगठन द्वारा संस्थागत और सामूहिक तौर पर पिछले करीब तीन दशकों से व्यापक तौर पर किये जा रहे हैं। इसके दोषी लगभग सभी हैं।

1998 से लेकर 2003 तक चली सरकार एक विशाल गठजोड़ का परिणाम थी, जिसमें सभी को स्वअस्तित्व बचाये रखने और सत्ता में भागीदार बने रहने के लिए अपना काफी कुछ विसर्जित कर देना पड़ा था। लेकिन 2014 में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने उसके छोटे-बड़े सहयोगी संगठनों को मानों उत्साह से लबरेज़ कर दिया। सांस्थानिक प्रश्रय प्राप्त कर हिंसा, वैमनस्यता और घृणा का उच्चांक हमें इस दौरान देखने को मिला है। जातीय और साम्प्रदायिक मुठभेड़ें खुलकर सामने आ गईं, एक घटना का प्रतिकार दूसरी घटना के रूप में सामने आता रहा, स्वाभाविक प्रतिक्रिया के नाम पर होने वाली हिंसक घटनाओं से समाज लगातार टूटता और बिखरता जा रहा है। सत्ता का वरदहस्त आक्रामक विचारधाराओं को और भी जहरीला तथा समाज के लिए मारक बनाता जा रहा है। इस हिंसा और नफरत के भाव के लक्ष्य जहां एक ओर सत्ता बनाये रखने के हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक शक्ति बटोरकर जाति विशेष या खास सम्प्रदाय को ताकतवर बनाना है, जो अन्य समूहों को दबा सकें। लोकतंत्र की भावना के सर्वथा विपरीत और लोकतंत्र की हदों को तोड़ती यह विचारधारा हमारे समाज पर इस कदर हावी हो चुकी है कि उससे न केवल सम्पूर्ण ताने-बाने के लिए अस्तित्व का खतरा बन गया है बल्कि हमारी सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को भी बट्टा लग रहा है।

प्रवीण तोगडिया इसी विचारधारा के अग्रदूतों में से एक रहे हैं। कहने को तो वे मुस्लिमों की बढ़ती कथित दादागिरी को थामने के लिए त्रिशूल लेकर मैदान में उतरे थे, लेकिन उनका अपना प्रभाव इतना बढ़ता चला गया कि वे स्वयं ही उस राजनीति के लिए खतरा बन गये, जिसका परिपोषण खुद वे करते रहे। ऐसा ही होता है। आधुनिक काल की सर्वमान्य राजनैतिक व्यवस्था यानी लोकतंत्र की बजाय जब कोई व्यक्ति या संगठन समांतर शक्ति बटोरता है, तो वह सभी के लिए खतरा बन जाता है। सत्ता को तब तक ऐसे लोगों से खतरा नहीं होता जब तक कि वे उनका काम करते रहें। राजनैतिक दल के रूप में लोकतंत्र की मर्यादाओं और सामाजिक लिहाज का पालन करते हुए कोई भी दल हिंसा और नफरत का सीधा प्रचार नहीं कर पाता। ऐसी राजनीति के लिए तोगडिया, अशोक सिंघल, बाल-उद्धव-राज ठाकरे, असदुद्दीन ओवैसी, बुखारी, हार्दिक पटेल जैसे लोगों के अलावा अलगाववादी-विभाजनकारी नेतागण-संगठन बेहद उपयोगी होते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से वे ऐसी ही ताकतों-विचारों की समाज में प्राणप्रतिष्ठा करते जाते हैं। अपनी जातीय अस्मिता, सामुदायिक पहचान के साथ आंशिक तौर पर आर्थिक विकास के झुनझुने बजाते हुए ये लोग समाज को बहकाते हैं। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति और शठे शाठ्यं समाचरेत् जैसे लोकप्रिय जुमलों से वे लोगों की मानसिकता को भी आक्रामक और हिंसक बनाने का कार्य करते चलते हैं।
तोगडिया हमारी राजनीतिक समझ को बढ़ाने के लिहाज से बहुत ही उम्दा केस स्टडी है। हिंसा के ऐसे सभी कारोबारी बेहद डरपोक और असुरक्षित होते हैं। अपने सम्प्रदाय और समाज की शक्ति बढ़ाने के नाम पर वे मारकाट के तो पैरोकार होते हैं, पर जब बात अपनी जान-माल पर आ जाए तो उनकी सारी बहादुरी हवा हो जाती है। 60 लाख यहूदियों, करोड़ों सिपाहियों और लाखों नागरिकों को मौत देने वाले हिटलर ने जब खुद की मौत सिर पर देखी तो लड़ने की बजाय कायराना आत्महत्या कर ली। बाबरी मस्जिद गिराने का बाहर श्रेय लेने वाले नेता फैजाबाद की कोर्ट में खुद को बेकसूर साबित करते फिर रहे हैं। कश्मीर में कथित आजादी का आंदोलन करने वाले अलगाववादी नेता अपने बच्चों को विदेशों में सुरक्षित और ऊंची नौकरियों पर बिठाते हैं। खालिस्तानी कमांडरों के बच्चे कनाडा और अमेरिका में सुखी जीवन बिताते हैं। ये सारे विरोधियों के साथ अपने लोगों को मौत के मुंह में ढकेलने में पारंगत होते हैं।

तोगडिया भी हमारे लिए इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण हैं कि हम यह अच्छे से समझ लें कि हिंसा और नफरत का दावानल अंततः हमें भी अपनी चपेट में ले लेता है। हिंसा की हिमायत करने वाले वैसे पराक्रमी नहीं होते, जैसे वे आपको और हमें बरगलाने के लिए खुद को प्रस्तुत करते हैं। तोगडिया के झर-झर बहते आंसू हमारी राजनीति के प्रासाद में फैले खून को तो साफ नहीं कर पाएंगे, पर उम्मीद है कि स्वयं डॉ. तोगडिया इस विश्वास के साथ बचा जीवन गुजारेंगे कि समाज में फैली हिंसा और घृणा जैसे कैंसर का इलाज प्रतिकार नहीं वरन अहिंसा और सहिष्णुता है। प्रवीण तोगडिया भारतीय राजनीति के खेत के ऐसे किसान कहे जा सकते हैं जिन्होंने हिंसा और नफरत के बीज बोये थे। उन बीजों से फूटी कोंपलों से लहलहाती फसल के रूप में भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सहित जगह-जगह सरकारें देखकर वे उत्साहित भी होते रहे और इस फसल का विस्तार वे लगातार करना चाहते थे। पर ऐसे ही बीजों से उगे किसी पेड़ की छाया में बैठने का जब मौका आया, तो पता चला कि उसी दरख्त की लकड़ी से उन्हीं के खिलाफ हथियार बनाये जा रहे हैं। इसकी हैप्पी एंडिंग यही होनी चाहिए कि उनके विचारों की चिता भी उसी वृक्ष को काटकर प्राप्त हुई लकड़ी से बने।

**

Leave a Reply