अराधनालयों और मसीही संस्थाओं में जनतंत्र की रक्षा औऱ अहिंसा के अनुसरण के अभियान में शामिल होने का आव्हान : 26 से 30 जनवरी, 2018

(बाबा साहेब अम्बेडकर और महात्मा गांधी
के सपनों के भारत को साकार करने)

26 से 30 जनवरी, 2018

**

भारतीय लोकतंत्र पर मंडराने वाले खतरे आज पहले से कहीं अधिक वास्तविक और भयावह हो गए हैं; और पूरे देश में हिंसक हमलों में बढोतरी आई है, ख़ास कर अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, मीडिया कर्मियों, कलाकारों, छात्रों और समुदाय विशेष के उन मुखियाओं पर जो सत्ताधारियों और उनके ललाट संगठनों के खिलाफ इमानदारी से असंतोष की आवाज़ उठाते हैं |

सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट शक्तियों द्वारा भारतीय संविधान की समीक्षा की बढती मांग भारत में एकतंत्र / निरंकुश राज्यशासन कायम करने के एजेंडा का एक हिस्सा है; ख़ास कर संविधान की उद्देशिका में निहित “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” के सिद्धांतों को निकाल देने की मांग के पीछे भारतीय संविधान और प्रभुत्वसंपन्न गणराज्य के मौलिक चरित्र को ही बदल डालने का इरादा है, और उसकी जगह “हिन्दू राष्ट्र” के निर्माण का रास्ता साफ़ करना ही है |

जनतंत्र की स्थापित संस्थानों और प्रथाओं को कमज़ोर और अधिभावी करने वाली अभी हाल में ही घटित तमाम घटनाओं से यह स्पष्ट हो गया है कि जनतंत्र को नष्ट करना ही इनका एकमात्र उद्देश्य है | इनमें सबसे ताज़ा चेतावनी सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्टतम न्यायाधीशों द्वारा 12 जनवरी 2018 को प्रेस सम्मेलन बुलाकर यह कहना कि भारत की शीर्ष अदालत में परिस्थिति “सही तौर पर व्यवस्थित नहीं है ” (‘not in order’), और कि कई “वांछनीय से कम ” (‘less than desirable’) घटनाएं घटित हुई हैं. इन चार न्यायाधीशों ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस संस्था को संरक्षित न किया गया तो “इस देश में जनतंत्र सुरक्षित नहीं रहेगा” .

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और
शहादत दिवस (30 जनवरी) को पर्व के रूप में मनाते हुए :
भारतीय संविधान में निहित मौलिक सिद्धांतों की परिपुष्टि और संपोषण करें.

देश के सेक्युलर-जनतांत्रिक ढांचे को मज़बूती देने, अहिंसक और शांतिपूर्ण तौर-तरीकों को अपनाते हुए अपनी कलीसियाओं, और साथ ही अन्य देशभक्त व्यक्तियों और संस्थानों को जागरूक और संवेदनशील बनाने का काम करें, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने के उपाय खोजें |
सामाजिक सक्रियता और सामाजिक न्याय से जोड़ कर विकास की दिशा में हम सभी एकजुट होकर काम करें और, इसके साथ ही समानता, आज़ादी और मानव गरिमा पर आधारित नए समाज की संरचना की दिशा में सामाजिक सक्रियता दर्शायें |

अपने संसाधनों – वैचारिक और संस्थागत – का सही इस्तेमाल कर एक व्यापक जन-आधरित गठबंधन तैयार कर सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट शक्तियों को परास्त करने, जनतंत्र को मज़बूत करने और संसदीय और अहिंसक तौर-तरीकों के माध्यम से शांति और न्याय को स्थापित करने की दिशा में कारगर कदम उठाएं |

 

जब मैं निराश होता हूं, तो मैं याद करता हूं कि इतिहास में हमेशा ही सत्य और प्रेम की विजय हुई है. तानाशाह और हत्यारे भी रहे, और कुछ समय के लिए वे अपराजेय लगते हैं. लेकिन अंत में वे हमेशा ही धराशाही हुए हैं. इसके बारे में ज़रा सोचो – हमेशा!”-

महात्मा गांधी
*
इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए, हमें प्रयास करना होगा कि
शांति और न्याय स्थापित करने के लिए जन-मंच तैयार कर हमारे समाज के सेक्युलर-समाजवादी-जनतांत्रिक ताने-बाने पर मंडराने वाले खतरों और चुनौतियों को चिन्हित करे; राष्ट्रीय, सामजिक और धार्मिक पर्वों का सामूहिक उत्सव मनाने के लिए स्वस्थ्य एवं अनुकूल वातावरण निर्मित करें; और महान समाज सुधारकों के अभूतपूर्व योगदान को मान्यता देते हुए स्मरण करें, इनमें इस अवसर पर प्रासंगिक नेताओं जैसे कि बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर (जिन्हें भारतीय गणतंत्र का पिता की संज्ञा दी गयी है, क्योंकि भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने में उनकी विशेष भूमिका रही) और राष्ट्र पिता महात्मा गांधी (जिनके अहिंसा के सिद्धांत ने पूरे विश्व को प्रेरित किया)|

सामाजिक तौर पर सुधारवादी आन्दोलन / अभियान को ढोस रूप प्रदान करते हुए उन अभिशाप से देश को आज़ाद करने का काम करें जैसे की गरीबी, निरक्षरता, भूख और भुखमरी, बीमारी और कुपोषण, बेरोज़गारी, हर तरह का भेद-भाव, सांप्रदायिक, जातिगत और जेंडर हिंसा और नफरत से, सामाजिक कुरीतियों से समाज और देश को मुक्ति दिलाने का काम करें जैसे कि नशा / शराब, बाल-विवाह, बाल-श्रम, महिला हिंसा, दहेज़ प्रथा, छुआ-छूत, पुलिस अत्याचार और दमन, भ्रष्टाचार और भेद-भाव, अंधविश्वास, और सांप्रदायिक, जातिगत और लिंग आधारित हिंसा और नफरत आदि |

“हम जीवन में विरोधाभासों के दौर से होकर गुज़रने वाले हैं. हमारे पास राजनीति में तो समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक अधिकारों में हमें असामनता मिलेगी……हमें इस विरोधाभास को मिटा देना होगा अन्यथा जो इस असामनता से पीड़ित हैं, वे इस संरचना को ही उखाड़ फेकेंगे.” –

* डॉ. भीमराव आंबेडकर

भारतीय लोकतंत्र पर मंडराने वाले खतरे आज पहले से कहीं अधिक वास्तविक और भयावह हो गए हैं; और पूरे देश में हिंसक हमलों में बढोतरी आई है, ख़ास कर अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, मीडिया कर्मियों, कलाकारों, छात्रों और समुदाय विशेष के उन मुखियाओं पर जो सत्ताधारियों और उनके ललाट संगठनों के खिलाफ इमानदारी से असंतोष की आवाज़ उठाते हैं | सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट शक्तियों द्वारा भारतीय संविधान की समीक्षा की बढती मांग भारत में एकतंत्र / निरंकुश राज्यशासन कायम करने के एजेंडा का एक हिस्सा है; ख़ास कर संविधान की उद्देशिका में निहित “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” के सिद्धांतों को निकाल देने की मांग के पीछे भारतीय संविधान और प्रभुत्वसंपन्न गणराज्य के मौलिक चरित्र को ही बदल डालने का इरादा है, और उसकी जगह “हिन्दू राष्ट्र” के निर्माण का रास्ता साफ़ करना ही है |

इसके कुछ दिन पहले, 9 जनवरी 2018 को हज़ारों की संख्या में देश भर से युवा और छात्र देश की राजधानी दिल्ली में “युवा हुंकार रैली” में एकजुट हुए | इसका नेत्रत्व दलित मुक्ति आन्दोलन के मुखिया और गुजरात में नव-निर्वाचित विधायक, जिग्नेश मेवानी, और जवाहर लाल विश्वविद्यालय के पूर्व व् वर्तमान छात्र नेतागण कन्हैया कुमार, शेहला रशीद और उमर खालिद आदि थे| इस रैली में ऐलान किया गया कि “हमारे संविधान पर खतरे मंडरा रहे हैं | हम केवल अपने संविधान की सुरक्षा करना चाहते हैं” | रैली में असली मुद्दों के महत्त्व पर ज़ोर दिया गया जैसे कि भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोज़गारी, शिक्षा के अधिकार, जीविकोपार्जन और लिंग आधारित न्याय आदि, न कि फौरी मुद्दे जैसे कि ‘घर वापसी’, ‘लव जेहाद’ और ‘गाय’; जो जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाने का काम करते हैं| जे.एन.यू. के छात्र संगठन के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने कहा कि “चाहें वे आपको कितना भी गुस्सा क्यों न दिलाएं, हिंसा का सहारा कतई ने लें | जब वे लाठी लेकर आप के पास आयें, तो अपनी पीठ को मज़बूत कर लें, एकजुट होकर खड़े हों लें यह न भूलें कि यह हिंसा का चक्र केवल प्रेम से ही पराजित किया जा सकता है|”

फासीवादी और कॉर्पोरेट एजेंडा के खिलाफ इस विद्रोह को देश भर में जनतांत्रिक और शांतिपूर्ण जन-आंदोलनों के परिवेश में भी देखने-समझने की ज़रुरत है, जो मेहनतकश मजदूर-किसानों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और छात्रों द्वारा अपने जीने, आज़ादी और जीविकोपार्जन के मौलिक अधिकारों को हासिल करने के लिए चलाये जा रहे हैं |

वर्तमान में जो हिंसा और दमन का दौर राज्य और गैर-राज्य के अधिनायकों और खलनायकों द्वारा आम नागरिकों पर आम तौर पर, और ख़ास कर पीड़ित और संघर्षशील जनता पर चलाया जा रहा है, उससे एक ऐसी परिस्थिति निर्मित हुई है जिसे भारत में अघोषित आपातकाल की संज्ञा दी जा रही है |

ऐसे परिवेश में, प्रतिरोध में जनता की एकजुट आवाज़ और शांतिपूर्ण संघर्ष ही फासीवादी और कॉर्पोरेट ताकतों के अपराधिक गठबंधन के खतरनाक और बेरहम राज के खात्मेकी दिशा में कारगर कदम है; केवल जन-शक्ति ही ऐसी शक्तियां के मंसूबों को परास्त कर सकती है जो भारत में सेक्युलर-समाजवादी-जनतांत्रिक समाज के ताने-बाने को तहस-नहस करने पर तुली हुई हैं| इतिहास और अनुभव ने हमें सिखाया है कि खतरों और चुनौतियों के ऐसे दौर में जन-विद्रोह और जन-आंदोलनों ने ही मौत और विनाश की शक्तियों को ललकारा है, और अन्ततोगत्वा पराजित किया है|

 

राष्ट्र-निर्माण में कलीसिया के योगदान की परंपरा को जारी रखते हुए, जिसके लिए हमें प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा से प्रेरणा प्राप्त होती है, और भारत के संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतो के प्रति अपनी निष्ठा दर्शाते हुए हम,
भारतीय गणराज्य के स्वंतंत्र नागरिक होने के नाते गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और
शहादत दिवस (30 जनवरी) को पर्व के रूप में मनाते हुए : भारतीय संविधान में निहित मौलिक सिद्धांतों की परिपुष्टि और संपोषण करें.

देश के सेक्युलर-जनतांत्रिक ढांचे को मज़बूती देने, अहिंसक और शांतिपूर्ण तौर-तरीकों को अपनाते हुए अपनी कलीसियाओं, और साथ ही अन्य देशभक्त व्यक्तियों और संस्थानों को जागरूक और संवेदनशील बनाने का काम करें, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने के उपाय खोजें .

सामाजिक सक्रियता और सामाजिक न्याय से जोड़ कर विकास की दिशा में हम सभी एकजुट होकर काम करें और, इसके साथ ही समानता, आज़ादी और मानव गरिमा पर आधारित नए समाज की संरचना की दिशा में सामाजिक सक्रियता दर्शायें .

अपने संसाधनों – वैचारिक और संस्थागत – का सही इस्तेमाल कर एक व्यापक जन-आधरित गठबंधन तैयार कर सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट शक्तियों को परास्त करने, जनतंत्र को मज़बूत करने और संसदीय और अहिंसक तौर-तरीकों के माध्यम से शांति और न्याय को स्थापित करने की दिशा में कारगर कदम उठाएं .

इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए, हमें प्रयास करना होगा कि शांति और न्याय स्थापित करने के लिए जन-मंच तैयार कर हमारे समाज के सेक्युलर-समाजवादी-जनतांत्रिक ताने-बाने पर मंडराने वाले खतरों और चुनौतियों को चिन्हित करे; राष्ट्रीय, सामजिक और धार्मिक पर्वों का सामूहिक उत्सव मनाने के लिए स्वस्थ्य एवं अनुकूल वातावरण निर्मित करें; और महान समाज सुधारकों के अभूतपूर्व योगदान को मान्यता देते हुए स्मरण करें, इनमें इस अवसर पर प्रासंगिक नेताओं जैसे कि बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर (जिन्हें भारतीय गणतंत्र का पिता की संज्ञा दी गयी है, क्योंकि भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने में उनकी विशेष भूमिका रही) और राष्ट्र पिता महात्मा गांधी (जिनके अहिंसा के सिद्धांत ने पूरे विश्व को प्रेरित किया).

सामाजिक तौर पर सुधारवादी आन्दोलन / अभियान को ठ़स रूप प्रदान करते हुए उन अभिशाप से देश को आज़ाद करने का काम करें जैसे की गरीबी, निरक्षरता, भूख और भुखमरी, बीमारी और कुपोषण, बेरोज़गारी, हर तरह का भेद-भाव, सांप्रदायिक, जातिगत और जेंडर हिंसा और नफरत से, सामाजिक कुरीतियों से समाज और देश को मुक्ति दिलाने का काम करें जैसे कि नशा / शराब, बाल-विवाह, बाल-श्रम, महिला हिंसा, दहेज़ प्रथा, छुआ-छूत, पुलिस अत्याचार और दमन, भ्रष्टाचार और भेद-भाव, अंधविश्वास, और सांप्रदायिक, जातिगत और लिंग आधारित हिंसा और नफरत आदि.

कार्यक्रम के लिए कुछ सुझाव

भारतीय संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों को कायम रखने 26 जनवरी, 2018 को सभी आराधनालयों और मसीही संस्थानों में विशेष रूप से गणतंत्र दिवस मनाएं.

जनतंत्र की सुरक्षा और अहिंसा के अनुसरण में 28 जनवरी, 2018 (रविवार) को विशेष रविवारीय आराधना रखें.

अहिंसा के अध्यात्मिक पहलू को सशक्त करने के लिए शहादत दिवस 30 जनवरी 2018 को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को श्रदांजलि देते हुए किसी सार्वजानिक स्थल पर सामूहिक उपवास रखें.

जवानों, छात्रों और सन्डे-स्कूल के बालक-बालिकाओं के लिए वाद-विवाद / निबंध/ पहेली प्रतियोग्यता का आयोजन करें, जिसमें भारत के संविधान में निहित सिद्धांतों और खासकर मौलिक अधिकारों की अहमियत पर और अहिंसा की जीवन शैली के रूप में प्रासंगिकता आदि विषयों को शामिल करें.

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संघर्ष में हम हैं आपके साथी और सहयोगी,

1. डॉ. सी. टी. कुरियन, अर्थशास्त्री, बंगुलुरु
2. डॉ. जॉन दयाल, लेखक अवं सक्रियवादी
3. क्रिस्टोफर राजकुमार, नेशनल कौंसिल ऑफ़ चर्चेस इन इंडिया, नागपुर
4. डॉ. जेसुदास एम्. अथ्याल, पूर्व. शिक्षक मंडल सदस्य, गुरुकुल लुदरण ,थिओलॉजिकल कॉलेज, तमिल नाडू.
5. डॉ. पॉल सिरोमणि, पूर्फ़ एन.सी.सी.आई. – यू.आर.एम्. सचिव, चेन्नई
6. डॉ. अरुणा ग्यानादासन, सलाहकार, चेन्नई
7. रेव्ह डॉ. याई. टी. विनायाराज, प्राध्यापक, एपिस्कोपल जुबली इंस्टिट्यूट, थिरुवल्ला.
8. रेव्ह डॉ. सतीश चन्द्र ज्ञान, पूर्व महासचिव, स्टूडेंट क्रिस्चियन मूवमेंट ऑफ़ इंडिया देहरादून, उत्तराखंड
9. रेव्ह. डॉ. पी. मोहन लारबीर, पूर्व सचिव, बोर्ड ऑफ़ ठोलोगिकल एजुकेशन ऑफ़
सीनेट ऑफ़ सेरामपुर कॉलेज (यूनिवर्सिटी)
10. स्टेन स्वामी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, रांची, झारखंड
11. बिशप डॉ. सी.के. दास, पूर्व बिशप, संबलपुर दिओसीस, चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया
12. मेट्रोपोलिटन जीवर्घीज़ मार कूर्लिओस, अध्यक्ष, केरल कौंसिल ऑफ़ चुर्चेस
13. कास्टा दीप, महानिदेशक, इंडिया पीस सेंटर, नागपुर
14. प्रोफ. जॉर्ज ज़कारियाह, धर्म्वैज्ञानिक एवं सामाजिक सक्रीय कार्यकर्ता, बंगुरुलू
15. रंजन सोलोमन, सलाहकार, मानव अधिकार और न्याय,बादायल, गोवा
16. शशि सायल, छत्तीसगढ़ महिला जाग्रति संगठन, रायपुर
17. डॉ. गोल्डी एम् जॉर्ज, छत्तीसगढ़ नागरिक साझा संघर्ष समिति, रायपुर
18. डॉ. बेनेट बेंजामिन, कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रैक्टिशनर एवं सलाहकार,तमिल नाडु
19. डॉ. संजय पत्रा, सदस्य, चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया
20. शमूएल जयकुमार, एकुमेनिकल सक्रिय कार्यकर्ता, नई दिल्ली
21. डॉ. विन्सेंट राजकुमार, सी.ई.एस. आर. एस., बंगुलुरु
22. विलियम स्टैनली, साझा संघर्ष कार्यदल, ओइकोत्री, कोरापुत, ओडिशा
23. रेव्ह. मधु कान्त मसीह, पास्टर, धमतरी, छत्तीसगढ़
24. रेव्ह. ओलिवर अल्फ्रेड, छेत्रीय समन्वयक, मिलाप कम्युनिटी चर्च, रायपुर, छग 25. विल्फ्रेड डी’कोस्टा, इंडियन सोशल एक्शन फोरम (इन्साफ), नई दिल्ली
26. फादर ए. पी. जोसी, समन्वयक, कमीशन फॉर जस्टिस, पीस एवं डेवलपमेंट, रायपुर आर्चडायोसीस,छग .
27. रेव्ह. अखिलेश एडगर, उपाध्यक्षस एवं राष्ट्रिय समन्वयक, नेशनल चर्च मिशन
एसोसिएशन (एन.एम्.सी.ए.), नई दिल्ली
28. रेव्ह. सुरेश शमूएल दीप, पास्टर, पिथोरा, महासमुंद, छग
29. राजेन्द्र सायल, मानव अधिकार कार्यकर्ता, छत्तीसगढ़

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संपर्क: राजेंद्र सायल, शशि कृषि फ़ार्म, तुमगांव, जिला महासमुंद: छत्तीसगढ़
(ईमेल: rajendrasail@gmail.com 

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