नामदेव ढसाल के स्मृति दिवस पर: दिशा पिंकी शेख.: प्रस्तुती एवं अनुवाद हेमलता महिश्वर

16.01.2018

तिनके जैसा  जीवन  लेकर जब मैं खड़ी थी
लोकतंत्र से मिलवानेवाली लालबत्ती वाली गली में
और रूपए दो रूपयों में जब मैं अपनी चमड़ी बेच रही थी
यह उस वक़्त की बात है…

अस्तित्वहीन जीवन लेकर जब लिपस्टिक लगाकर
ख़ाली पेट बजाते ताली
जिन्हें तब भारतीय नागरिकता देने तक को
कोई तैयार नहीं था
यह बात उस समय की है…

वाम, दक्षिण, प्रगतिशील, साम्यवादी और पहले के तुम्हारे ही कुछ अधूरे आम्बेडकरवादी भी,
नाक में चिथड़ा लगाकर मेरी गली पार करते थे
मेरी गुदड़ी पर वीर्य से सनी पड़ी
तथाकथित सभ्यता की खट्टी बास उन्हें न आ जाए इसलिए
यह तब की बात है

पर तब मात्र तू …

कोई भी NGO फ़ंडिंग मिल जाए ऐसा सोचकर नहीं
कोई राजकीय एजेंडा पूर्ण हो जाए इसलिए नहीं
बल्कि हमारी भूख के लिए खड़ा रहा
यह बात उस समय की है ..

यहॉं की पितृसत्ता के बलात्कार से उपजी गाँव के बाहर
फेंक दिए गए हज़ारों हिजड़ों की, रांडों की आवाज़ बना तू…

पेट के गड्ढे के लिए व्यवस्था की छाती पर लात मारना सिखाया तूने
यह उस समय की बात है…

आज मुझे अपना कहने वाले बहुत हैं
बाज़ार में, संसद में, समाजसेवकों में, NGO और सरमायादारों में भी
जो मेरे हाथों में अपने एजेंडे का लौड़ा देकर देखते हैं

और मुझे खड़ाकर देखते हैं
ग्लोबलाइज़ेशन के नए गोलपीठा में
ये वही हैं, जिन्होंने तुझे तब रंडीबाज घोषित किया था,
और आज भी दबी हुई आवाज़ में तुझे रंडीबाज कहते देखे जाते हैं

पर नामा (नामदेव ढसाल) तू मेरे लिए, मेरे जैसे लाखों हिजड़ों का और लालबत्ती की औरतों का तब भी और आज भी मॉं- बाप ही है

  • दिशा पिंकी शेख
    अनुवाद- हेमलता महिश्वर

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