दंतेवाड़ा. दक्षिण बस्तर में पुलिस पर मानवाधिकार हनन, फर्जी मुठभेड़ व फर्जी सरेंडर के आरोप लगते आ रहे हैं. हाल ही में गोपमाड़ में मछली पकड़ने गई महिला को मुठभेड़ में गोली मारने का दावा सुकमा पुलिस ने किया था. इस मामले में पुलिस कार्रवाई की जमकर किरकिरी हुई थी. लेकिन इस बार एक और अनोखे मामले में सुकमा पुलिस की बौद्वधिक क्षमता पर ही सवाल उठने लगे हैं. सुकमा पुलिस ने अंधे आदिवासी को हत्या एवं विस्फोटक मामले में गवाह बनाया है.

यह मामला प्रकाश में तब आया जब वह दंतेवाड़ा सेशन कोर्ट में पेशी के लिए आया था. गवाह को यह भी नहीं पता था कि उसे किस मामले में कोर्ट बुलाया गया है. जब वह अपनी 9 वर्षीय बेटी के साथ लाठी पकड़कर पुहंचा तो कोर्ट में मौजूद सभी भौचक रह गये. पुलिस की कार्यवाही लोगें में चर्चा का विषय न बने इसलिए अभियोजन ने इसे ड्राप करने की सलाह दे डाली.

क्या है मामला

सुकमा जिले के बुरकापाल निवासी हेमला बंडी व अन्य के खिलाफ हत्या की कोशिश व विस्फोटक अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई थी. इस मामले में चिंतागुफा पुलिस ने माड़वी नंदा को चश्मदीद गवाह बनाया गया था. सेशन ट्रायल नंबर 54/17 पर समंस 30 नवंबर 2017 को जारी हुआ. जिसमें माडवी नंदा को 8 जनवरी को दंतेवाड़ा सेशन कोर्ट में उपस्थित होना है.

गवाह कैसे बनाया गया समझ से परे—पोंदी

आरोपी हेमला बंडी की पैरवी कर रहे ​अधिवक्ता बिचेम पेांदी ने बताया कि चिंतागुफा पुलिस ने माड़वी नंदा को हत्या की कोशिश व विस्फोटक अधिनियम में गवाह बनाया है. हालांकि अभियोजन ने इसकी गवाही नहीं होने दी है. पोंदी ने पुलिस की कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक अंधे व्यक्ति को किसी मामले में गवाह कैसे बनाया जा सकता है.