सुषमा सिन्हा की छ: कविताएँ : दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र

सुषमा सिन्हा की  छ: कविताएँ :  दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र

सुषमा सिन्हा की छ: कविताएँ : दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र

दोस्तों आज समूह की साथी *सुषमा सिन्हा* की कविताएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। स्त्री विमर्श को बजाय किसी शोरगुल के हमारे सामने रखती इन कविताओं को पढ़ें और इन पर बात जरूर कर

✍🏻 *सुषमा सिन्हा*

*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र*

*|| घबराहट ||*

बढ़ती जा रही है भीड़ रास्तों पर
घबराए हुए लोग भाग रहे हैं इधर-उधर
भाग रही हूँ मैं भी उनके साथ
रास्ता कभी घर की ओर का लगता है
कभी लगता कि जा रही हूँ काम पर

भागते-भागते पड़ी नज़र
एक बूढ़े व्यक्ति पर
जो झोला टाँगे, डंडा पकड़े
चला जा रहा था धीरे-धीरे
धक से हुआ मन
जा रहे हैं पिता कहाँ इस तरह ?
अब तो उनसे चला भी नहीं जाता
मुड़-मुड़ कर टिक रही उनपर नज़र
भागती हुई झट पहुँची उन तक
ओह !! नहीं… ये मेरे पिता नहीं….
पर किसी के तो पिता हैं  !

घबराई हुई वहाँ से भागी उस तरफ
जहाँ रास्ते के किनारे बैठी एक बूढ़ी औरत
हर आने-जाने वाले के आगे
फैला रही थी अपना कटोरा
देख रही हूँ गौर से जा कर उनके पास
कहीं यह मेरी माँ तो नहीं
नहीं- नहीं….यह मेरी माँ नहीं….
पर किसी की तो माँ हैं !

हड़बड़ाई हुई
भाग रही हूँ वहाँ से भी
रोक रहे हैं रास्ता छोटे-छोटे बच्चे
फैलाये हुए अपनी नन्ही नन्ही हथेलियाँ
देखने लगी हूँ बड़े ध्यान से उनका चेहरा
कहीं इनमें मेरे बच्चे तो नहीं
नहीं.. इनमें मेरे बच्चे नहीं…..
पर किन्हीं के तो बच्चे हैं !

बेचैन हो कर रो पड़ी हूँ बेसाख्ता
और फिर भागने लगी हूँ बेतहाशा…

‘क्या हुआ मम्मा ? ….आप डर गईं क्या ?’
झिंझोड़ कर उठा रही मुझे मेरी बिटिया !!

*|| दाँव ||*

आज फिर
एक आदमी ने जुए में
अपनी पत्नी को दाँव पर लगाया
और हार गया

उसकी पत्नी को
महाभारत की कहानी से
कुछ लेना-देना नहीं था
न ही वह द्रौपदी जैसी थी
और न ही उसे किसी कृष्ण का पता था

खुद के दाँव पर लगने की खबर सुन
थोड़ी देर कुछ सोचा उसने
फिर अपने घर के बाहर
खड़ी हो गई गड़ासा ले कर !!

*|| ईश्वर ||*

सुना है
छोटे बच्चे जो बोल नहीं पाते
मुस्कुराते हैं नींद में
तब ईश्वर उनसे बातें करता है
ऐसे छोटे बच्चे-बच्चियों के साथ
जब हो रहा होता है गलत
तब कहाँ रहता है ईश्वर ?

कहते हैं
हर एक इंसान के अंदर होता है ईश्वर
फिर इंसान जैसे दिखने वाले लोग
जब कर रहे होते हैं हैवानियत
तब कहाँ रहता है
उनके अंदर का ईश्वर ?

अब तो
ईश्वर का भ्रम भी नहीं बच रहा
फिर भी गहन निराशा के क्षणों में
ढूँढ़ती हूँ उसे ही, पुकारती हूँ बारम्बार
पूछना चाहती हूँ बस एक सवाल
कि हमारे बुरे वक्त पर
जब नहीं सुनते तुम हमारी चीख भी
तब किस बात के लिये
कहूँ तुम्हें ‘ईश्वर’ ??

*|| दुनिया का सच ||*

सौ कारण बताकर
हमारी बेटियाँ
इस दुनिया को बुरी बताती हैं
और दुखी हो जाती हैं

अगले ही पल
सिर झटक कर कहती हैं
जैसे कमर कस रही हों
‘आखिर रहना तो इसी दुनिया में है’
और अपने-आप में व्यस्त हो जाती हैं !

हजार कारण बताकर
हमारी माँएँ
इस दुनिया को खूबसूरत बताती हैं
जीवन के प्रति विश्वास दिलाती हैं
तसल्ली देती हैं हमें
और फिर देर तक
डरती, सहमती, सशंकित होतीं
स्वयं अंदर तक थरथराती हैं !!

*|| सफेद झूठ ||*

तस्वीर के इस तरफ खड़ी मैं
बताती रही उसे
कि यह बिल्कुल साफ और सफेद है
तस्वीर के उस तरफ खड़ा वह
मानने से करता रहा इंकार
कहता रहा
कि यह तो है खूबसूरत रंगों से सराबोर

मूक तस्वीर अपने हालात से जड़
खामोशी से तकती रही हमें
उसे मेरी नजरों से कभी न देख पाया वह
ना मैं उसकी आँखों पर
कर पाई भरोसा कभी

खड़े रहे हम
अपनी अपनी जगह
अपने अपने सच के साथ मजबूती से
यह जानते हुए भी
कि झक-साफ़-सफेद झूठ जैसा
नहीं होता है कहीं, कोई भी सच !!

*|| बेहतरीन सपने ||*

बेटी अपनी आँखों से
देखती है इंद्रधनुष के रंग
और तौलती है अपने हौसलों के पंख
फिर एक विश्वास से भरकर
अपनी माँ से कहती है-
‘मैं आपकी तरह नहीं जीऊँगी !’

मुस्कराती है माँ
और करती है याद
कि वह भी कहा करती थी अपनी माँ से
कि ‘नहीं जी सकती मैं आपकी तरह !’

माँ यह भी करती है याद
कि उनकी माँ ने भी बताया था उन्हें
कि वह भी कहती थीं अपनी माँ से
कि ‘वह उनकी तरह नहीं जी सकतीं !’

शायद इसी तरह
माँ की माँ ने भी कहा होगा अपनी माँ से
और उनकी माँ ने भी अपनी माँ से……
कि ‘वह उनकी तरह नहीं जीना चाहतीं !’

तभी तो
युगों-युगों से हमारी माँएँ
हमारे इंकार के हौसले पर मुस्कुराती हैं
और अपने जीवन के बेहतरीन सपने
अपनी बेटियों की आँखों से देखती हैं !!

✍🏻 *सुषमा सिन्हा*

*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र*

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