युवा कवि अस्मुरारी नंदन मिश्र की कविताएँ.: दस्तक़  के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

आज प्रस्तुत हैं समूह के साथी युवा कवि अस्मुरारी नंदन मिश्र की कविताएँ.
कविताओं पर चर्चा करें तो अच्छा लगेगा., अनिल करमेले .

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✍? अस्मुरारी नंदन मिश्र

दस्तक़  के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

*|| झूठ-मूठ की कविता ||*

हवा  चलती है झूठ मूठ के
बेमतलब की भटकन है यह
झूठ मूठ के ही साथ हो लेता है सौरभ
कहाँ जाना है उसे?
साँझ पड़े दरख्तों पर लौट
झूठ मूठ के ही चहकती है चिड़ियाँ
कुछ भी नहीं अर्थ चहचहाहट का
झूठ मूठ के रँभाती है घर लौटती बंध्या गाय
कोई भी इंतेजार नहीं कर  रहा होता उसका
झूठ मूठ के फेरती रहती है माँ
सो चुके शिशु के बदन पर हाथ
झूठ मूठ के ही घबरा जाती है बच्चे के जुकाम भर से…

आखिर क्यों रख रखे हैं किसान ने
सात मट्टी चल चुके अब बूढ़े बैल
क्यों लटका रखी हैं धान की पहली पाँच बालियाँ
गौरैयों के  नाम
क्यों घिसटता रहा है कलम
कवि अच्छे संसार के सपनों से भर
जबकि संसार चलाती रही हैं हिटलरी नीतियाँ

यूँ  ही रोता है सद्यजात शिशु
यूँ ही हँसता किलकता है पालने में
बिल्कुल नासमझ वह
कहाँ समझता है भाषा
कहाँ पता उसे चाँद तारों के खिलौनों के बारे  में
यूँ ही गुजर  रहा है समय
यूँ ही कट जायेगा जीवन
झूठ मूठ के हैं टिकने के प्रयास

बहुत बड़ा धोखा है डॉक्टर का वह आश्वासन
जो इलाज से हारे मरीज को दे रहा
आखिर वक्त में
भ्रम है चाँद में बुढ़िया का दिखना
धोखा है काम के साथ
कुदाल चलाते सौखी माँझी का
हाथ रोक अँगड़ाई लेना
धोखा है बीस आने का होरी का गोदान

धोखा है अंधेरे में दिखना रक्त-स्नात पुरुष का
धोखा है पैसे का होरी का गोदान
धोखा ही हैं कहीं और ब्याही जा रही प्रेमिका के आँसू
जिससे दे रही होती है दाग प्रेयस की धुली कमीज पर…

बेकार है बाबा की डायरी
उनका चश्मा
इतिहास की किताब
बेकार है पिता की लाठी
घर का नक्शा
लिये दिये का हिसाब
झूठ मूठ के ही संग्रह कर रखा है माँ ने
बेकार है बेकार चीजों के पीछे दिया गया
अवधान और समय
दुनिया होती ही जाती है हरपल नयी…

बेमतलब है किसी बहसतलब मुद्दे के बीच
लोगों का बेवजह का हँसी मजाक
बेमतलब है भाषा का व्याकरण पढ़ाते- पढ़ाते
टी.जी.टी. हिंदी अस्मुरारी का
समाज के व्याकरण पर उतरना
आह्वान करना अर्थशास्त्र के प्रवक्ता का
स्वतंत्रता, समता और भाईचारे का…
झूठ मूठ के ही हैं सारे रीति-नीति-नियम
संसार चलता है अपनी ही शर्तों पर….

नाटक है जल –जंगल- जमीन का रोना
नाटक ही है बिरसा-सिद्धु-कान्हु को याद करना
नाटक था जालियाँवाला बाग
और मूर्खता सिरफिरों का फाँसी लटकना
नाटक है
कैण्डिल मार्च
विरोध प्रदर्शन
जन आंदोलन
किया जा रहा देश का चक्का  जाम
कोरी नासमझी है
विकास की गलत -सलत व्याख्या
साजिश है
कुचली दूब  का फिर से उग  आना…

छोटी लड़की की तरह घाघरा उठाये
नाचती फिर रही है पृथ्वी
गोल गोल परिधि में
झूठ मूठ के
कि पैदा हो  रहा समय का खेल..
और कपोल कल्पित समय को अच्छा देखने का स्वप्न है
झूठ मूठ का ही  …
कि समय किसकी मुट्ठी में रहा जो…

न जाने क्यों
लोग  देखना चाहते हैं
सुंदर सहज शुद्ध और वायुमण्डल सा विस्तृत
जबकि झूठ मूठ के ही है
पलभर का भंगुर जीवन…

लेकिन सबकुछ को झूठा साबित कर चुके ये लोग
क्यों चिल्लाने लगे हैं बीच चौराहे
जब एक कवि सुना रहा है अपनी कविता
झूठ
मूठ
के….

और कितना ठोस है स्वर
ठोस है जैसे चोट खाये माथे का टेटन
जैसे हथेलियों पर के घट्टे
करजा के कागज पर किसान का अंगुठा
वैसी ही ठोस है उनकी भाषा

सब कुछ को झूठलाती हुई ये जबानें
सच हैं
सच हैं दाँत
सच हैं नाखून
उतना ही सच है
किसी देह पर जंगलीपन की साधना के निशान
और सबके बीच सच है वह पागल

हमने देखा सच में गाता पागल सच है —

‘’झूठा है इतिहास , काव्य झूठा है
झूठे मेरे स्वप्न, कि सब सम्भाव्य झूठा है
ओ गाने वालो!
हर चौक चौराहे, गली – नुक्कड़ में
ढोल- ढोल पर बजने वालो!
बातुनी नारों से
छाने वालो!
झूठी है ये कुर्सी, फिर क्यों बैठे हो?
झूठी
सारी धन दौलत झूठी
तब क्यों ऐंठे हो?
झूठी हैं ये आँखें, फिर दहक रही क्यों ?
झूठी ज्वाला चिता की? लहक रही क्यों?’’

गड़गड़ कर जो घुमड़ रहा वह बादल सच है…
हमने देखा सच में गाता पागल सच है

‘’भैया! मेरे झूठ भी सच हैं
जैसे तेरी लूट भी सच है
एका तेरा एक हकीकत
और ये अपनी फूट भी सच है
सच सच है सच के ही जैसा
लेकिन सच भी बदल रहेगा
जिसके गले पड़ी विफलता
वह रण में अब सँभल उठेगा
सफल रहेगा सफल रहेगा
अपना जीवन सफल रहेगा….’’

जंगल जंगल गूँज उठा जो
जोर से बजता माँदल सच है …
हमने देखा सच में गाता पागल सच है
सच पागल है
पागल सच है…

पागल सच है
जैसे सच है बासमती के बीच कंकड़ का आना
शराब की कड़वाहट
सुपारी का कसैलापन
जैसे सच है बबूर का बबूर होना
खेतों की दरारें
जेठ की धूप
और पानी के बिना
आँखों में खून का उतरना
सब सच है
और मतलब भरा भी

बेमतलब नहीं होता कुछ भी
बेमतलब कहने में भी छिपा होता है
एक मतलब
बेमतलब नहीं उनका सच को झूठ बतलाना
और हमारा सच को सच कहना …

बताना जरुरी है
खून में लोहे का अनुपात
पसीने का स्वाद
आँसू की हरारत
सबका सच्चा लेखा जरुरी है

बताना जरुरी है झूठ का सच
सच को सच की तरह बताना जरुरी है
सच
वे तमाम सच
जो झूठलाये जाते रहे सदियों से

उन पर ऐतबार जताना जरुरी है
जरुरी है ये सब
इसके पहले कि
उनके हक में टूटे कलम की नोक….

*|| फैंसी ड्रेस ||*

संसार की समस्त अच्छाइयों की निर्मलता का लिबास पहन
आई हैं कई कई परियाँ
कुछ तो बहुत चहक कर बताती हैं
‘’मैं परी हूँ’’
मानो संगीत की सार्वभौम मोहकता
गा उठी हो
दिखाती है जादुई छड़ी
कि बना देगी पूरी दुनिया
अपने भोले मन सी स्वच्छ और निर्मल….

कोई सिपाही बना है
कोई डॉक्टर
कोई किसान के रूप में देता है आश्वासन
कि उसके रहते भूख नहीं रह सकती
कि धरती उछाह से
हो जायेगी हरपल उर्वर
वार देगी अपनी समस्त निधियाँ

छोटे मन की सीमाहीन उन्मुक्तता को
भाषा में समाते नहीं देख
बन के आये हैं
स्वतंत्रता के सेनानी
अपने नारों में आजाद-ख्याली भर

ये आये हैं
ज्यों नृत्य कर रही हो पहाड़ी नदी
लहरा कर चली हो वसंती हवा
सागर की तरंगों पर उछल रहा हो बाल रवि
लाल गेंद सा
सब मिल फोटो खिंचाते ये
दे रहे इंद्रधनुष को खुली चुनौती
लाये कहाँ से लाता है
इतने इतने रंग

यह रहा खुले आसमान का परिंदा
यह झील की जलपरी
नेता भी, अभिनेता भी
सब्जी -फलों का विक्रेता भी
लक्ष्य भ्रष्ट संसार के सामने लाते
उसके आदर्श
आये हैं कई कई रूपों में
कई कई रंगों में
फैंसी ड्रेस के ये प्रतियोगी सहर्ष…

ये जो डाकिया है
जोड़ देगा घर घर
इस पार के दर्द
पहुँचायेगा उस पार
अक्षर – अक्षर …
और भाषा की समाई से परे
फूलों की गंध तितलियों तक
मोर की कुहक मोरनियों तक पहुँचायेगा
शहरी मील के गँवई पसीने की महक को
लायेगा गाँव तक
छोटी छोटी खुशियों में रुपांतरित कर…

और तो और
एक बन कर आया है पेड़ छतनार
हरी डाल और हरी-हरी पत्तियाँ
धरती भर की हरियाली ले
लगा रहा है गुहार
“हमें बचाओ!”

बचाओ इन्हें
कि हरियाली कम हो रही है
कि सूख रही है नदी
कि आसमान नहीं रहा नीला अब
इन्हें बचाओ
कि सपने मिटने नहीं चाहिये
कि बचा रहे मन में भोलापन
कि उन्मुक्तता की चाह कम न हो कभी
बचाना जरुरी है
कि कई रंग हैं जीवन के
और अभी शेष है आना
रंगों के लहराने के मौसम का … .

*|| चांदमारी -1 ||*

उस अनाम अनचीन्हे
पुतले पर
गोली चलाते-चलाते जवान
चीन्हना ही भूल गया है
वह नहीं देखता पुतला या और कुछ
वह चीन्हता है केवल एक शब्द ‘शूट’
और चलाता चला जाता है गोली
दनादन
सामने फिर बुद्ध या गाँधी ही क्यों न हों

*|| चांदमारी – 2 ||*

भारत
पाकिस्तान
या दूर देश अमेरिका- इंगलैंड
हर जगह होते हैं
एक ही पुतले
जिस पर निशाना साध कर सीखते हैं
अलग-अलग देशों के अलग-अलग जवान
अपने कौशल

गोली खाने वाला पुतला एक ही होता है
हर जगह

 

*|| चांदमारी – 3 ||*

मेजर के कहे पर
थामता तो है रायफल
चलाता भी है गोली
पर निशाना साध नहीं पाता
कांप कांप जाते हैं हाथ
उंगलियाँ सिहर-सिहर जाती है
रेंगने लगता है कुछ रीढ़ पर

गोली निकलती चली जाती है
पुतलों के अगल- बगल से

वह अब तक
पुतले बनाने का काम करता रहा है….

✍? *अस्मुरारी नंदन मिश्र*

*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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