✍?  रेखा चमोली की कवितायें ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

✍?  रेखा चमोली की कवितायें  ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

✍?  रेखा चमोली की कवितायें ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

 

*||अघोषित युद्ध ||*

आत्महत्या करने वाला
अपने पीछे छोड़ जाता है कई सवाल
जो बहुत कुछ मेल खाते हैं उन सवालों से
जो किसी निर्दोष की हत्या होते हुए उसकी चीखों से उपजे थे

हम इन सवालों से चुराते हैं आंखें
पलटते हैं पन्ने
लिखते हैं पंक्तियां
मचाते हैं शोर
करते हैं रोज़मर्रा के काम
देखते हैं फूहड़ टी वी चैनल
प्रायोजित समाचारों में ढूंढते हैं हल
और धीरे-धीरे करते हैं खुद को तैयार
आत्मघाती हमलों के लिए
हत्यारे का शिकार होने के लिए

हम इस गलतफहमी में काटते हैं दिन कि बचा ही लेगा
कोई धर्म, जाति या भीड़ का हिस्सा
हमें शिकार होने से

हम एक अघोषित युद्ध लड़ रहे हैं।

*|| हत्यारे ||*

वे चाहते हैं
अव्यवस्थताएं इतनी फैलें
कि हम इन्हें मान लें अपनी दिनचर्या

इतना शोर मचे
कि हमें लगे शोर है तो चल रही हैं सांसे

सडकों पर इतना खून बहे
कि हम लाल रंग को लेकर तटस्थ हो जाएं

इतनी अफवाहें हों हवा में कि
असल बात कहीं दफ्न हो जाए

आत्महत्याएं इतनी आम हों कि
इन्हें स्वाभाविक मान लिया जाए,

वे हमारी सामूहिक हत्याओं की तैयारी में हैं।

*|| आत्महत्या माय फुट ||*

बहुत बार मन करता है तेज स्कूटर चलाते हुए
किसी पहाड़ी मोड पर कर लूँ आँखें बंद
कुछेक मिनट की बात होगी और किस्सा खत्म

या फिर कूद जाऊँ छप से
नदी के गहरे हरे नीले ठंडे पानी में
जब भरेगा फेफड़ों में पानी
तड़फकर बाहर निकलने का होगा मन
कुछ दिनों बाद फूला भद्दा शरीर फँसा मिलेगा
किन्हीं पत्थरों की ओट में आधा मछलियों का खाया हुआ

कभी सोचती हूँ अनमनी बैठी रहूँ देर तक
पाला बरसाते आसमान के नीचे
जब तक जमकर लुढ़क न जाऊँ एक ओर

पर पलक झपकते ही झटके से खुल जाती हैं बोझिल आँखें
पानी पर उभरती है एक छाया
आसमान में टिमटिमाता है कोई तारा
इंतजार करती दिखती हैं दो जोड़ी आँखें

आना होता है बार-बार लौटकर वहीं
जहाँ से उठती हैं मन में ये ख्वाहिशें
मरना इतना आसान होता तो कब की ख़त्म हो जाती ये दुनिया
मरना अपने हाथ में नहीं पर आत्महत्या तो है
क्या फायदा ऐसे जीवन का जिसमें जीने की कोई लय न हो
अंतहीन चलना हो थकान कभी उतरती न हो

पिछले साल मरने की सोची तो याद आया बिटिया की बोर्ड परीक्षा है
कैसे सँभालेगी वो अपने आप को
इस साल सोचती हूँ अभी छोटा है बेटा
थोड़ा बड़ा हो जाए कर सके अपनी देखभाल

बार-बार यही होता है
मरने से ठीक पहले याद आ जाता है कोई न कोई जरूरी काम
मन के चोर कोने से झाँकता है कोई बहाना
कोई नया अर्थ खुलता है अपने होने का

माँ का जानबूझ कर मरना कोई आसान बात नहीं
फिर भी हर सेंकड मर जाती या मार डाली जाती है कोई न कोई माँ

मरना स्थगित करने के बाद
शीशे में मुस्कुराता है आँसुओं से भीगा चेहरा

जानी ! जीना कितना भी दुश्वार क्यों न हो
मरने से थोड़ा सा हसीन तो होता ही है।

*|| क्यों न हो इनसे प्रेम ||*

एक नन्हां पौधा अपनी नयी कोमल पत्ती को हवा में लहराता है
अपने नन्हें से वजूद को स्वीकारता सूरज से आँखें लड़ाता है
तेज हवा के झौकों का सामना करता है डटकर
बारिशें उस पर टूट पड़ती हैं
वो अपने हिस्से का ताप, नमी, सांसें ले
अगले दिन थोड़ा और बड़ा थोड़ा और चमकीला दिखता है

मेंढक के बच्चे सीना ताने निकल पडे़ हैं दुनिया देखने
तमाम खतरों के बाबजूद उत्साह से भरेे
यह जानते हुए भी कि किसी सुरक्षित तालाब किनारे नहीं है उनका घर
सडक के व्यस्त कोने पर टूटी नाली के पास है
इनकी मां ने भी इन्हें जाने दिया है यह कहकर कि
जाओ और खुद को आजमाओ

मेरे अखरोट तोड़ते ही जाने कैसे पता लग जाता है चींटियों को
मेरी गाड़ी का हार्न सुन बाहर निकलता है किसी कोने में दुबककर सोया कुत्ता
मैं हटाती हूँ मकड़ी का जाला एक जगह से
दूसरी सुबह उसे नयी जगह बना पाती हूॅ

ऐसी ही बहुत सी चीजें हैं आसपास
उकसाती, खुश करतीं , मन में उमंगें जगातीं
मुझे क्यों न हो इनसे प्रेम।

*|| महिला मित्र ||*

आपके साथ इनकोे हमेशा संदेह से देखा जाता है
हमउम्र या छोटी हो तो शंका और भी गहराती है
आपके जीवन में नाटक के उस पात्र जैसा होता है इनका रोल
जिसे जरूरत पड़ने पर कोई भी निभा सकता है
ये आम दोस्तों की तरह नहीं जा सकतीं आपके स्कूटर के पीछे बैठकर
इनके साथ किसी सड़क किनारे ढाबे पर
नहीं पी जा सकती एक कप चाय
पारिवारिक समाराहों में इन्हें नहीं मिलता मौका मांगलिक गीत गाने का
जबकि ये यह सब करना चाहती हैं
ये आपकी पीठ पर एक धप्पा मारकर चैंकाना चाहती हैं
देर शाम फोन पर अपनी कविता सुनाना चाहती हैं
किसी बहस में उलझे-उलझे सड़क पर घूमना चाहती हैं
कठिन समय में हाथ पकड़कर साथ होने का भरोसा देना चाहती हैं
पहाड़ की ऊंची चोटी पर चढ़कर जोर से आपका नाम पुकारना चाहती हैं
लांग ड्राइव पर आपके साथ किशोर लता के गाने सुनना चाहती हैं
ये आपकी हर बात को धैर्य से सुनती हैं
इनसे बात करके आप थोड़ा और जीना चाहते हैं
दुनिया पर आपका भरोसा थोड़ा और ज्यादा बढ़ जाता है
ये आपके लिए दरवाजे के पीछे लगे हैंगर सी जरूरी होती हैं

इनकी भूमिका हमेशा परदे के पीछे की होती है
इनकी फोन काल्स और मैसैजस को आप तुरंत डिलीट कर देते हैं
आपके आसपास के लोगों को ये क्यारी में उगे अनचाहे पौधे सी खटकती हैं
इनके आने पर शुरू हुयी खुशफुसाहट अर्थभरी मुस्कानों पर रूकती हैं

आप इनको कभी नहीं देख पाते घर के कपड़ों में
बर्तन साफ करते या कपड़े धोते
ना ही आपका सामना इनसे कभी सिलेण्डर की लाइन में होता है
आप कई बार नहीं जान पाते
पिछले दिनों किस कदर बुखार से तप रहीं थीं ये
ये भी कहाँ पूछ पाती हैं समय पर आपकी खैर खबर
ये ऐसा कुछ भी नहीं कर पातीं हैं
ये आपकी महिला मित्र जो होती हैं।

*|| श्रीमती क ख ग की मौत ||*

वो
सारी उम्र समझता रहा उसे
आज्ञाकारी दासी

वो समझता रहा
बहुत डरती है वो उससे
उसके इशारे पर नाचती है
रोकने पर रुकती चलाने पर चलती
उतना और वैसा ही कहती
जितना और जैसा वो सुनना चाहता

उसके डपटने से सिमट जाती वो घोंघे सी
मारने पीटने पर सिल लेती अपने होंठ
खुद ही उधेड़ लेती सारी सिलाई तन और मन की

उसके बताए और ना बताए सारे काम
बिना ऊब व थकान के कुशलतापूर्वक करती

उसके निर्णय बिना किसी प्रतिप्रश्न के उसे स्वीकार होते

जब वो कहता
तेज हवा चल रही है
वो बन्द कर देती सारे घर के खिड़की दरवाजे़
वो कहता बसन्त आ गया
वो मुस्कुराती डोलती दिनभर सारे घर में

आज जब उसने
मुक्त कर लिया है खुद को
सारे सांसारिक बंधनों
व उससे

समझ आया है उसे कि
जब वह अपने भीतर समेट लेती थी सारी धरती
आसमान मुँह ताकता रह जाता था

उन स्थितियों में भी जब
पर्वत भीगने लगते थे और हवाएँ
हो जाती थीं भारी
रुंधे गले से भीगे शब्द अटक अटककर निकलते थे
वो तब भी गा सकती थी
खुशियों और आशाओं भरा सबसे सुरीला गीत

वो अब जान पाया है
वो सारी उम्र करती रही
दया

उसकी कमजोरियों पर
उसकी कुंठाओं पर
मानसिक विकृतियों पर

वो उम्रभर उसेे
उसके झूठे दंभों, स्वाभिमानों, अभिमानों के साथ
स्वीकार करती रही

वो उम्रभर उसकी दया पर पलता आया

वो एक शानदार पारी खेल कर गयी

उसे छोड़ गयी अकेला
उसके ही पिंजरे में ।

✍? *रेखा चमोली*

*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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