कौन सुनेगा दलितों की आवाज ?  जानबूझकर दलितों की अस्मिता की लड़ाई को देशद्रोह के रूप में पेश किया गया : संजीव खुदशाह

देशबंधु में प्रकाशित

**

वर्तमान में हुए संघर्ष को जिस प्रकार से अंग्रेजों की जीत के जश्न के रूप में प्रसारित किया गया है। उससे लगता है कि दलित और वंचित समाज की आवाज सुनने वाला आज भी कोई नहीं है। उनका पक्ष कोई सुनना नहीं चाहता, ना ही बताना चाहता है । मीडिया में मानों आज भी पेशवा तंत्र का शासन जारी है। जानबूझकर दलितों की अस्मिता की लड़ाई को, गुलामी से निजात पाने के संघर्ष को देशद्रोह के रूप में पेश किया गया। मानों उन्होंने अंग्रेजों से के साथ लड़कर बहुत बड़ा गुनाह किया है। जाति या समुदाय को आधार बनाकार रेजिमेंट बनाना कोई नया नहीं है। राजपूत रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट आदि तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। महार रेजिमेंट भी यहां प्रतिवर्ष एक जनवरी को शौर्य दिवस मनाने के लिए आती है । जिसे पहले कभी भी देशद्रोह के रूप में नहीं देखा गया।

आज भीमा कोरेगांव चर्चा में है। बताना चाहूंगा कोरेगांव नाम का यह गांव पुणे से करीब 28 किलोमीटर दूरी पर है और भीमा नदी के किनारे बसे होने के कारण इसका नाम ‘भीमा कोरेगांव’ पड़ा। आज इस स्थल को दलित बड़ी शिद्दत के साथ पूजते हैं और महार रेजिमेंट (जिसका मुख्यालय आज मध्य प्रदेश के सागर में है)  हर साल 1 जनवरी को शौर्य दिवस के रूप में मनाती है। इसके पीछे इतिहास है कि यह समय था आज से लगभग 200 साल पहले 1818 का जब कहने को तो शिवाजी के उत्तराधिकारियों का शासन था, पर दरअसल हुक़ूमत पेशवाओं (चितपावन ब्राम्हणों)  की चलती थी। कहा जाता है कि पेशवाओं ने मनु स्मृति के कानून को लागू कर रखा था। वहां पिछड़ी जाति के लोगों को संपत्ति, वस्र , गहने आदि खरीेदने के अधिकार नही था। दुकानदार नये वस्त्र  बेचते समय दलितों के बेचे गये वस्त्र  बीच से फाड़ दिया करते थे। उनका कहना था ऐसा पेशवा का फरमान है। वे अन्त्यजों ( दलितों) के परछाई से भी परहेज करना था। पेशवओं ने दलितों को अपने पीठ में झाड़ू एवं गले में गड़गा बांधने के लिए मजबूर कर दिया था। मकसद था चलते समय उनके पद चिन्हं मिट जाये और उनकी थूक सड़क पर न गिरे। । दलितों को अपमान भरी जिन्दगी बितानी पड़ती थी।

इस वक्त  अंग्रेज पूर्वी और उत्तर भारत जीत चुके थे। पुणे का कुछ हिस्सा उनके कब्जे में आ चुका था। शनीवारवाड़ा समेत महत्वपूर्ण हिस्सा अब भी पेशवाओं के हक में ही था। अंग्रेजो ने महार रेजिमेंट का गठन किया जिसमें अन्य दलित जातियों के साथ साथ ज्यादातर महार जाति के भी लोग थे। दलितों को अपनी गुलामी से निजात पानी थी। लड़ाई में अंग्रेजो का मकसद तो जगजाहिर था लेकिन दलितों ने इस लड़ाई को अपनी अस्मिता का प्रश्न बना दिया। 1 जनवरी 1818 को संसाधनों की कमी के बावजूद वे पूर दमखम के साथ लड़े। यह निर्णायक भीमा कोरेगांव के पास हुई। दस्तावेजी तथ्य  के मुताबिक महार रेजिमेन्ट की ओर से करीब 800 सैनिक एवं पेशवाओं की 28000 फौज आपने सामने लड़ी। जिसमें पेशवाओं की बुरी तरह हार हुई। इस लड़ाई ने पेशवा राज को हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर दिया। जो एक इन्सान की गुलामी का प्रतीक था। बाद में यहां पर एक स्मारक बनाया गया है। यह स्मारक आज भी महार रेजिमेंट के बैच की पहचान के रूप में अंकित है।  

इस लड़ाई में पश्चिम भारत पर भी अंग्रेजी सरकार का कब्जा हो गया और सभी के लिए शिक्षा, संपत्ति, सम्मान के द्वार खोल दिए गए। महात्मा फुले पढ़कर निकले सावित्री बाई फुले ने पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त किया। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। इसके बावजूद दलितों को पीने के पानी से लेकर पहनने के कपड़े तक के लिए संघर्ष करना पड़ा।

1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव वंचित समुदाय के लोग प्रतिवर्ष की तरह एकत्र होकर अपनी गुलामी से निजात पाने के उपलक्ष में उत्सव मना रहे थे। तभी कुछ कट्टरपंथियों के द्वारा हमला किये जाने के करण एक व्यक्ति की मौत हो गई और भीमा कोरेगांव राष्ट्र के मानचित्र में चर्चित हो गया।

कुछ लोगों का आरोप है कि वे (आशय दलित समुदाय से है) अंग्रेजों के जीत का जश्न मना रहे थे। घटना को इस रूप में देखना गलत है। क्योंकि अंग्रेज बहुत थोड़ी संख्या में थे। अंग्रेजों ने जितनी भी लड़ाई लड़ी यही कि सैनिकों के द्वारा लड़ी। टीपू सुल्तान के विरूद्ध जो लड़ाई लड़ी उसमें पेशवा साथ में थे। बंगाल में लखनऊ में जो लड़ाई हुई उसमें अंग्रेज के साथ राजपूत थे। इसलिए इस लड़ाई को अंग्रेजों की जीत के रुप में देखना, मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने जैसा है। वर्तमान में हुए संघर्ष को जिस प्रकार से अंग्रेजों की जीत के जश्न के रूप में प्रसारित किया गया है। उससे लगता है कि दलित और वंचित समाज की आवाज सुनने वाला आज भी कोई नहीं है। उनका पक्ष कोई सुनना नहीं चाहता, ना ही बताना चाहता है । मीडिया में मानों आज भी पेशवा तंत्र का शासन जारी है। जानबूझकर दलितों की अस्मिता की लड़ाई को, गुलामी से निजात पाने के संघर्ष को देशद्रोह के रूप में पेश किया गया। मानों उन्होंने अंग्रेजों से के साथ लड़कर बहुत बड़ा गुनाह किया है।

जाति आधार पर रेजिमेंट बनाना नया नही है या समुदाय को आधार बनाकार रेजिमेंट बनाना कोई नया नहीं है। राजपूत रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट आदि तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। महार रेजिमेंट भी यहां प्रतिवर्ष एक जनवरी को शौर्य दिवस मनाने के लिए आती है । जिसे पहले कभी भी देशद्रोह के रूप में नहीं देखा गया। इसी प्रकार तमाम और भी रेजिमेंट हैं जो अपने ऐतिहासिक लड़ाई को याद रखती हैं। अपनी जीत को याद रखने के लिए उत्सव मनाते हैं। चाहे यह लड़ाई अंग्रेज काल में ही क्यों ना लड़ी गई हो।

अंग्रेजो के पक्ष विपक्ष में देशी राजा लड़े और उनके राजनैतिक मकसद किसी से छिपे नहीं है। कोई अपनी राजसत्ता बचाने के लिए लड़ रहा था, तो कोई जमीन पर कब्जा बनाने के लिए और कुछ अंग्रेजों के साथ सिर्फ इसलिए लड़ रहे थे कि उनका सामाजिक वर्चस्व बना रहे। लेकिन कोरेगांव की लड़ाई इसलिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह लड़ाई मानवी अस्मिता के लिए लड़ी गई। इस लड़ाई को गुलामी से मुक्ति के रूप में देखा गया। इसलिए ये स्थान आज दलितों के लिए एक तीर्थ बन गया जिसका सम्मान होना चाहिए।

***

Leave a Reply

You may have missed