13 जनवरी और 14 जनवरी 2018 को जाति उन्मूलन आंदोलन का चतुर्थ अखिल भारतीय सम्मेलन नागपुर में.

1 जनवरी 2018

जाति विहीन समाज निर्माण के लिए एकजुट हों
जाति उन्मूलन आंदोलन के चतुर्थ अखिल भारतीय सम्मेलन को सफल बनाएं
जाति व्यवस्था भारत में एक गंभीर बीमारी की तरह है, लेकिन भारत का शासक वर्ग, जाति को कोई समस्या नहीं मानता है। या ये कहें जान बूझकर समस्या मानने से इनकार करता है, इसके पीछे उसके वर्गीय हित छिपे हंै। इस कार्य में छद्म प्रगतिशील लोग भी लगे हैं। ’पद्मावती’ जैसे काल्पनिक विषय पर बनी फिल्म जैसे गैर जरूरी मुद्दों पर पूरा काॅर्पोरेट मीडिया केन्द्रित रहता है, और गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी जैसे सही मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश करता रहता है। भारत में भेदभाव की जननी जाति व्यवस्था को स्पर्श तक नहीं किया जाता है। इसके पीछे गहरी साजिश है। अब जरूरत इस बात की है कि इसका पर्दाफाश किया जाय। ऐसे नकाब पोश मनुवादी/ब्राम्हणवादी लोगों के नकाब उतारे जाएं जो जाति व्यवस्था को संस्कृति पुराणों के बहाने बनाये रखना चाहते हैं तो दूसरी ओर आधुनिक वैज्ञानिक सोच रखने का ढोंग रचते हैं।

साथियों, इसके मद्देनज़र वृहद रूप में जाति उन्मूलन आंदोलन विगत 6 सालों से सक्रिय है। इसका मुखपत्र हिन्दी में ’’जाति उन्मूलन’’ व अंग्रेजी में ’’Caste Annihilation’’ सफलतापूर्वक प्रकाशित की जा रही है। यदि आप जाति उन्मूलन आंदोलन में अपना सहयोग देना चाहते हंै तो हम आपका तहेदिल से इस्तेकबाल करते हैं। भारत में पिछले करीब दो दशकों से भी अधिक समय से नव-उदारवाद का राज चल रहा है और इस दौरान उत्पीड़ित वर्गों और समुदायों, विशेष रूप से दलितों की हालत बद से बदतर होते गई है। नयी परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढालते हुए जाति व्यवस्था नये रूपों में कायम है।

कई दशकों के कठोर संघर्षों से उत्पीड़ित तबकों ने जिन जनवादी, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को हासिल किया था उसे निष्ठुरता के साथ छीन लिया गया है। आरक्षण से मिले अधिकारों को लगातार हल्का बनाया जा रहा है, जबकि सभी क्षेत्रों में हो रहे निजीकरण के कारण इसमें पहले ही भारी कटौती हो चुकी है। शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है, श्रम बाजार में ’काम कराओ और निकाल दो’ की नीति के आधार पर ठेकेदारी प्रथा हावी हो गई है, देशी व विदेशी काॅरपोरेट घरानों और रीयल इस्टेट माफिया के लिए विस्थापन के चलते गरीब किसान अपने भूमि से वंचित होते जा रहे हैं। पुरूषवादी सत्ता और पूंजीवादी/ साम्राज्यवादी संस्कृति के कारण महिलाओं का समाज में जो थोड़ा-बहुत स्थान था वह भी खत्म होता जा रहा है। नवउदार आर्थिक नीतियों की मार सबसे ज्यादा मेहनतकशों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों पर पड़ रही है जो तेजी से दरिद्रता के गर्त में गिरते जा रहे हैं। साम्राज्यवाद और उसके अनुचरों द्वारा अपने प्रभुत्व को चिरायु बनाए रखने के लिए अंधविश्वास धार्मिक कट्टरपंथ को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

वर्तमान में साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों ने प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करने का प्रयास तेज कर दिया है। देशभर में सामाजिक रूप से उत्पीड़ित जातियों एवं वर्गांे पर जातिवादी हमला बढ़ा है। हाल के दिनों में सांप्रदायिक, जातिवादी ताकतों द्वारा गुजरात, राजस्थान बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा आदि स्थानों पर दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के ऊपर हमले की अनेक वीभत्स घटनाएं हुई हैं। काॅर्पोरेट लूट को बढ़ावा देने वाली कट्टर हिन्दुत्ववादी ताकतें एक तरफ तो बाबा साहब अम्बेडकर को हथियाने की कोशिश में हैं, तो दूसरी तरफ हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शोध छात्र रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या से लेकर जे.एन.यू., इलाहाबाद, कोलकाता, जादवपुर, बनारस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी समूहों पर प्रतिबंध लगाने जैसी दमनात्मक कार्यवाही भी करती है। काॅरपोरेट राज के तहत् समाज के उत्पीड़ित तबकों पर ही इसकी मार सबसे ज्यादा पड़ रही है।

ऐसे परिस्थिति में हम देश व्यापी ’’जाति उन्मूलन आंदोलन’’ खड़ा करने आगामी 13 जनवरी और 14 जनवरी 2018 को चतुर्थ अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन क्रांति ज्योति सावित्री मां फुले नगर (बैरिस्टर राजाभाऊ खोबरागड़े सभागृह), कामठी रोड, सिद्धार्थ नगर, नागपुर -17 (महाराष्ट्र) में करने जा रहे हंै। सम्मेलन का उद्घाटन 13 जनवरी (शनिवार) 2017 को सुबह 10 बजे से होगा। हम सभी मेहनतकश, धर्मनिरपेक्ष देशभक्त जनता एवं प्रगतिशील ताकतों से इस सम्मेलन को सफल बनाने का आव्हान करते हैं।

जाति उन्मूलन आंदोलन अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजन समिति नागपुर (महाराष्ट्र)

संपर्क – बंडु मेश्राम, जिंदा भगत मोबा नं. – 09890269435,09326608899,09820226713

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