इलेक्ट्रॉनिक युग की गहमागहमी में आंदोलन पढें पढाये की अद्भुत रचनात्मक पहल .ओपन पुस्तकालय की दूसरी कड़ी आज प्रारम्भ .

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आज 31 दिसम्बर जब सारा शहर नये साल के समारोह की गहमागहमी में उत्तेजित है ,उस साल के आखरी आखरी दिन बिलासपुर के आर के रेजीडेंसी में आंदोलन पढें पढ़ाये के दूसरे पुस्तकालय की शुरुवात कुछ परिवारिक और कुछ औपचारिक रूप से हो रही है । सही में यह बड़ी रचनात्मक पहल हैं ,जिसने एक खुला पुस्तकालय प्रारम्भ हो रहा हैं ,बच्चे छोटे बड़े कभी भी आ जा सकते हैं न ताला है कहीं और न निर्धारित समय ,जब आइये तब आइये , पुस्तके पढ़िए ले जाइये और पढाईये भी दोस्तोँ को .
यह अद्भुत शरुआत सविता, प्रथमेश मिश्रा ,नन्द कध्यप और उनके दोस्तों ने पिछले साल की थी ,एक चलित पुस्तकालय के रूप में ,कुछ दिन चली भी किन्तु कुछ व्यवहारिक कठिनाई की वजह से आगे बढ़ नही पाई तो सोचा गया कि शहर के विभिन्न स्थल पर खुली लाइब्रेरी शुरु की जाये .

अभी पिछले दिनों एक पुस्तकालय में शुरू किया गया ऐसे पांच स्थानों पर शुरू करने की दूसरी कड़ी में यह आयोजन किया गया था. चारों तरफ बच्चे ही बच्चे बैठे थे ,इनके बीच प्रथमेश की माँ ने आलमारी को खोल के पुस्तकालय की शुरुआत की ,इसमे रखी थी 70,80 के दशक से आज तक की पत्रिकाएं धर्मयुग , पराग ,नन्दन ,चंदा मामा ,सारिका मनोरमा से लेकर मंजिल मंजिल , गांधी मार्ग, गीतांजली ,पहाड़ और आधुनिक पुस्तके तक .शहर के बहुत से दोस्तों ने पुस्तकें और पत्रिकाएं इस अभियान के लिये दीं हैं .

आज की इस शानदार शाम की शुरुआत
शुभांगी बाजपेयी ने अपनी कविता दीवारें पढी जिसमें कहा गया कि अगर दीवारें बोलती तो पूछती कि कहाँ से कहाँ पहुंच गये हम. शुभांगी 10 वीं की छात्रा है और गंभीर कविताएँ लिख रहीं हैं .
सविता प्रथमेश ने ” मां खादी की चादर ” गध पढ़कर सुनाया को गाँधी मार्ग के अगले अंक में छपने जा रहा है .नन्द कशयप ने 21 जून को देश का सर्वाधिक गर्म होते बिलासपुर के दिन पर लिखी कविता ” भूलना हिंसक होता है पढी जिसमें उन्होंने कहा कि वे जानते थे कि एक दिन हमारा शहर भट्टी बन जायेगा ,ख़राब होता पर्यावरण सोची समझी साजिश है यह मानवता के खिलाफ .
कपूर वासनिक ने अपनी कविता वे आये पूछते हालचाल देते दाना डाल सुनाई जो मूल मराठी में लिखी हैं ,इसका हिंदी अनुवाद पढ़ा ,.

दिव्या मिश्रा ने हर पेड़ यह कहता है और अगर तुम्हारी इज़ाज़त हो तो तुम्हारे कुछ कोरे ख़त उधार लिये है ,कविता सुनाई . जाते जाते वी कौशिक ने भी कविता का पाठ किया .नमिता घोष ने छोटी छोटी तीन कवितायें पढी.
चिडिय़ा के बिना समाज ,शब्दो मे रचती में और उस नए आकाश में सुनाई .
बिलासपुर में शायद पहली बार लोगों को शाकिर अली को कविता पाठ करते सुना ,उन्होंने कहा भी कि उन्हें कोई कवि मानता ही नही है क्यों कि वे स्थापित कवियों की परंपरा में आते ही नही है ,उन्होंने पहले निराला की कविता वीणा वादनी वर दे सुनाया फिर अपने बचपन में लिखी गूलर के फूल कविता पढी ,उन्होंने कहा कि गूलर के फल तो दिखते हैं लेकिन फूल कहीं नही दिखते यह माना जाता है कि गूलर के फूल कोई परी तोड़ ले जाती हैं ,ऐसा ही जीवन मे फूल का अदृश्य हो जाना हैं ।

मीनाक्षी मैडम न भी पढी कविता काश जिंदगी सचमुच किताब होती उसे पढ सकते कि आगे क्या क्या होता .सविता पथमेश ने रावण.तुम फिर आ गये सुनाई और नादान लडकियां का पाठ किया .अभिप्रीत बाजपेयी ने जगजीत सिंह की गज़ल चिठ्ठी आई है को बेहतरीन आवाज़ मे सुनाया .
लगभग अंत मे नथमल शर्मा ने पुस्तकालय का उदघाटन करते हुए कहा कि बहुत कठिन और विपरीत समय मे सविता और प्रथमेश किताबो की बात कर रहे है ,हम सबको इन सब पहल से बडी उम्मीद बनी हैं यह किताबें हमें बहुत उर्ज़ा देती हैं, इस गहमागहमी और इलेक्ट्रॉनिक मारामारी मे पुस्तकें ही हमे सुकून देती है .नथमल जी ने सुनो चिडिय़ा बहेलिया फिर आया ,सूरज को देखो और बेटीयाँ और नदी कविता सुनाई ,बेटियाँ होती हे नदी की तरह ,.
इस अनौपचारिक कविता पाठ मे लोग आते जाते कविताएँ सुनाते रहे.

2017 के अंतिम रचनात्मक संध्या में नथमल शर्मा ,कपूर वासनिक ,शाकिर अली ,श्रीमती नमिता घोष, माधुरी अग्रवाल, मिनाक्षी वझलवार, रानी, कविता पटवर्धन, सरिता शर्मा, उषा मिश्रा,एश्वर्य लक्ष्मी, दिव्या बाजपेई, शिवा मिश्रा, किरण मिश्रा,श्रीमती रेड्डी,कुमारी शुभांगी बाजपेयी, ममता,श्री हरदेवदत्त,द्वारिका अग्रवाल, राकेश तिवारी,शुभम बाजपेयी, सुनील चिंचोलकर, अनीश शर्मा, कुमार गौरव मिश्रा, अक्षय शर्मा पंकज पांडे,रोनित, डा. लाखन सिंह के अलावा बडी संख्या मे बच्चों की सक्रिय भागीदारी रही .
कार्यक्रम के अंत में नथमल शर्मा ने अपनी पुस्तक उसकी आँखों में समुद्र ढूंढता रहा को प्रथमेश और सविता को भेंट किया.
आभार प्रदर्शन प्रथमेश के आदरणीय पिता श्री ने किया ।

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