?⚫? युवा रचना शिविर धमतरी और मैं … ( 5 से 8 अक्टूबर 2017 , छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन रायपुर का आयोजन ) रिपोर्ट : प्रियंका शुक्ला अधिवक्ता बिलासपुर

?⚫? युवा रचना शिविर धमतरी और मैं … ( 5 से 8 अक्टूबर 2017 , छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन रायपुर का आयोजन ) रिपोर्ट : प्रियंका शुक्ला अधिवक्ता बिलासपुर

?⚫? ** युवा रचना शिविर धमतरी और मैं …

( 5 से 8 अक्टूबर 2017 , छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन रायपुर का आयोजन )

युवा रचना शिविर का आयोजन धमतरी में आयोजित किया जा रहा है इसकी जानकारी और आवेदन पत्र बिलासपुर में शाकिर अली भाई से अक्टूम्बर के दूसरे इतवार को मिली थी | आवेदन पत्र प्राप्त करने और कार्यक्रम की जानकारी से मन बहुत उत्साहित हुआ | हर दिन काम के बाद सोचती कि तैयारी करूंगी और एक गद्य की शुरुआत भी पर समय के अभाव व काम की व्यस्तता ने कार्यक्रम के लिए तैयार नहीं होने दिया |
कार्यक्रम 05 से 08 अक्टूबर को था किंतु न जाने क्यों मेरे दिमाग में यह 3 से 6 फिट हो गया | हर दिन एक कशमकश थी कि जा पाउंगी या नहीं क्यूंकि 3 से 5 को मेरे कुछ जरुरी केस कोर्ट में गवाही के लिए लगे थे|

अपने अधिवक्ता साथियों से मदद भी मांगी कि केस की तैयारी मैं कर दूंगी केस के दिन वो देख लें ,पर कार्यक्रम जैसे जैस पास आ रहा था उसमे अड़चने भी बढ़ती जा रही थी |अचानक से पता चला कि मेरी एक अधिवक्ता साथी जो बाहर गयी हुई थी उसकी तबियत ठीक नहीं है जिसके कारण वह उस दिनांक को कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सकेगी | तब मैंने सोचा की केस का काम ज्यादा जरुरी है इसलिए मन मारते हुए ही सही पर सोच लिया था कि रचना शिविर में नहीं जा जाउगी |

ठीक 1 तारीख को पता चला कि कार्यक्रम 5 से शुरू होना है जिसके लिए 4 तारीख की शाम को पहुंचना है तब थोड़ी राहत हुई की चलो अब पहुँच सकुंगी | फिर भी 5 तारीख के लगे केस की चिंता थी कि उस दिन कैसे संभलेगा पर 4 को कोर्ट जाने से ये भी चिंता खत्म हुई और पता चला कि 5 को मेरी कुछ खास जरुरत नहीं है|

बड़ी ख़ुशी से शाकिर भाई से बात कर के सारी जानकारी ली और किसी तरह धमतरी पहुंच गयी |इतनी खींचतान ने मुझे थका दिया और चाहकर भी उत्साह नज़र नहीं आ रहा था | पर पहला उत्साह जागा जब बिलासपुर के कवि और लेखक रामकुमार दादा को भी स्टेशन पर पाया |अब थोड़ी थकावट तो कम हुई थी, पर अब भूख और चाय की तलब लगी हुई थी |

भूख और चाय की तलब के साथ स्टेशन से जैसे ही अजीम प्रेम जी फाउंडेशन की बिल्डिंग पहुंची , बहुत लंबी सांस ली जैसे कितनी बड़ी राहत पायी हो |
बिल्डिंग में घुसते ही जो उत्साह मेरे अन्दर कहीं थकावट से खो गया था वह अति उत्साही होकर मुझे खुद से दिख गया | उसका सबसे बड़ा कारण था बिल्डिंग की दीवारों पर लिखे हुए विचार | थोड़ा आगे जैसे ही डायनिंग हाल की तरफ आगे बड़ी तो फिर से एक कविता चित्र पाया जैसे वो मेरी ही कहानी कह रहा हो, मेरी बात बोल रहा हो |
पिंजरा खोलकर बाहर निकले हुए पंक्षी में मैं खुद को साफ तौर पर देख पा रही थी | उस पर लिखी हुई लाइन “हम पंक्षी उनमुक्त गगन के ” मानों जैसे वो मेरी ही बात कर रहा हो |
थोड़ी ही समय में अच्छा नाश्ता –चाय के साथ ही दो प्यारी महिला मित्र से मुलाकात हो गयी और कुछ ही देर में हमारा एक दूसरे से ऐसे बात करना जैसे न जाने कब से जानते हैं |

उद्घाटन सत्र शुरू होने ही वाला था | हमें अपने कमरे मिल गए जहां वही दोनों सहेलिया और में रुकने वाले थे | कमरों में सामान रखकर नीचे आई और नाश्ते के बाद मैं वापस पूरे कैम्पस को देख रही थी | तभी देखा कि थोड़ी दूर पर एक लाइब्रेरी भी है | मैं अपनी नयी महिला साथी के साथ अन्दर घुस गयी और अन्दर बैठे स्टाफ से आग्रह किया कि हमें भी लाइब्रेरी देखने दे | उस स्टाफ ने बहुत प्यार से मुस्कुराते हुए अनुमति दे दी | वहाँ पर किताबों को देखते हुए मेरी नजर सच्चिदानंद सिन्हा जी की किताब “जातिव्यवस्था” पर पड़ी और हाथ में ले ली फिर मैंने लाइब्रेरी में बैठे स्टाफ से निवेदन करते हुए पूछा की क्या में इसे पढने के लिए ले सकती हूँ ? उन्होंने बहुत प्यार से मुस्कुरा कर कहा “yeah you can read here”, मैंने बोला कि अभी सफ़र कर के आई हूँ, तो क्या इसे कमरे में ले जाकर पढ़ सकती हूँ ? उन्होंने फिर से थोड़ा असमंजस में पढ़कर जवाब दिया कि “yeah” ,तभी अचानक से उन्होंने बोला कि“you can take membership and it’s free of cost” मैंने तुरंत हाँ बोला और फार्म भर के किताब ले ली | बातों बातों में ही मैंने उस स्टाफ से उसके बारे में भी पूछ डाला उन्होंने बताया की वो मणिपुर से है | अब समय हो गया था सत्र शुरू होने का इसलिए जल्दी से किताब ली और कार्यक्रम वाले हॉल के तरफ बढ़ी.

पहले दिन उद्घाटन में सबने अपना अपना परिचय दिया | शहर के शोर से दूर इस कार्यक्रम में अलग-अलग जगहों से कुल मिलाकर 32 के आस पास युवा प्रतिभागी शामिल हुए | मैं पहले दिन परिचय के समय यही सोच रही थी कि यहाँ से सबसे महत्वपूर्ण कुछ लेकर जाने वाली हूँ तो वो है इतने सारे नए युवा रचनाकारों का साथ |

पहले दिन दो कहानियां पढ़ी गयी | एक “गुल्ली डंडा” और दूसरी थी “बाप-बेटा” ,दोनों ही कहानियां मेरे पसंदीदा लेखकों की कहानियाँ थी | एक दिन में दो कहानियां वो भी इतनी महत्वपूर्ण , मैं समय के अभाव से शायद कभी न पढ़ पाती पर ऐसा होने से मेरे हफ्ते भर का समय बचाया इस संगने | अगर मुझे बोला जाता कि पढ़ कर आओ तो कम से कम 7 दिन लगते पढने में क्योंकि काम ऐसा है कि लॉ को भी पढ़ो तो इसके लिए वक्त कम मिल पाता है पर शौक बहुत है |

दूसरा यह कि लगातार 3 दिन के इस साहित्यक माहौल ने ज्यादा पढने की तलब जगा दी है | पहले दिन की दोनों ही कहानियों ने मन में काफी छाप छोड़ी |जब अंत में रवि जी व ललित सूरजन जी द्वारा यह कहा गया की अपने कमरों में जाकर चार पांच पन्ने लिखकर भी कल लाना है तो बिलकुल ऐसा महसूस हुआ मानों स्कूल के खूबसूरत दिन वापस आ गए हों | पहले सत्र के समापन के बाद अपने-अपने कमरों में जाना और नए – नए दोस्तों के बारे में जानना बहुत ही उत्साहित था | सत्र शुरू होने का समय हो गया था | सभी ने अपना परिचय दिया | पहला दिन कहानी पर केन्द्रित रहा जिसमें भीष्म साहनी की “बाप-बेटा” और प्रेमचन्द्र जी की “गिल्ली-डंडा” कहानी का पाठ किया गया | इस सत्र के अंत में ललित सुरजन जी के द्वारा कहानी के विषय में कम से कम एक 5 पन्ने लिखकर लाने को कहा गया मानों स्कूल में होमवर्क मिला हो छुट्टी में | कार्यक्रम के सभी सत्रों में लगभग शाम को ग्रुप में चर्चा भी होती थी जो बेहद पसंद आई |

उद्घाटन सत्र के अंत में ,पहले दिन की शाम की चर्चा में मुझे अजय चंद्रवंशी सर व अन्य प्रतिभागियों का साथ मिला था जिसमें सभी ने व्यक्तिगत परिचय के साथ अपने बारे में पूरी तरह से बताया | विचारों की असहमतियों ने बहस का रूप भी लिया , जिसमें मुझे अपनी बात और बहस को करने का पूरा अच्छा मौक़ा सभी ने दिया | अजय चंद्र वंशी सर के सरल स्वभाव ने मुझे ज़रा भी हेकड़ी में नहीं लिया और बराबर असहमति का जवाब सुन्दर ढंग से देने की अच्छी कोशिश की थी | चर्चा समाप्ति के पश्चात खाना तैयार था और हमारा इंतज़ार कर रहा था |

फिर देर रात तक कमरों में दोनों महिला मित्रों के साथ काफी बात हुई , एक दूसरे की व्यक्तिगत जिन्दगी से लेकर महिलाओं के अन्य विषयों पर हमारे बीच बातें हुई, कविताओं का पाठ और तेज आवाज में गाने गाकर हम खूब देर रात तक मस्ती करते रहे| देर रात मस्ती के बीच में मुझे चाय की तलब जागी, जिसके लिए इधर-उधर नीचे पूछा तो कुछ नहीं मिल सका पर डिनर हाल में एक इलेक्ट्रोनिक चाय केतली और बगल में रखी काफी पाउडर और चीनी भी मिल गय |दूध नहीं मिल सका था बस, फिर भी अब तो चाय की तलब को मिटाना था ब्लैक कॉफ़ी से, दोनों महिला साथियों के साथ फिर से गयी और हमने चुपके से ब्लैक कॉफ़ी बनायी, उस वक्त ऐसा लग रहा था, मानों में कॉलेज के हॉस्टल में वार्डन से छुप कर ये काम कर रहीं हूँ| उस रात कॉफ़ी को रूम में जल्दी से लाकर बैठ कर पीते हुए हम खूब हँसे थे, पर हंसी के बीच ही अचानक बातों से ललित सर का गुस्सा वाला चेहरा यह कहते हुए याद आर हा होता था कि “4-5 पन्ने लिखने भी है कब लिखोगी ?” और वैसे ही तुरंत मैं और दूसरी मित्र प्रिया अपने–अपने लिखने में लग जाते हैं| साथी पुनीता ने हम तीनो में से सबसे पहले अपना लिखने का कार्य कर लिया था इसलिए वो आकर मस्त सो रही थी| काफी रात हो चुकी थी और सोना भी था, सुबह 7 बजे उठना भी था वरना नाश्ता और चाय नहीं मिलेगी, ऐसा सोचते हुए जल्दी से अपना लेखन कार्य खत्म किया और सोने की तैयारी, बिस्तर पर लेटते ही सुकून की लम्बी सांस ली,मानों स्कूल का पिछड़ा हुआ काम पूरा किया हो|

अगली सुबह होते ही नीचे 7 बजे चाय पीने के लिए डायनिंग हाल में जाते ही पाया की ललित जी कुछ प्रतिभागियों से घिरे हुए उनसे बात कर रहे थे , उनके बारे में जान रहे थे और अपने बारे में बता रहे थे | मेरे लिए यह काफी अच्छा नजारा था, जहां कोई तो था जोकि हमारे बारे में जानना चाह रहा था और कुछ ज्ञानवर्धक चीजें भी बता रहा था |

दूसरे दिन का पहला सेशन कहानी और कविता पर केन्द्रित था| दुसरे दिन दोनों कहानी बहुत जमीनी स्तर और आम भाषा में लिखी गयी थी| पहली थी “हमसफ़र” और दूसरी “धरती पर रहते हुए” | पहली कहानी बहुत ही पसंद आई थी क्योंकि सीधा संवाद कर रही थी हमारी उम्र के युवाओं से, ऊपर से जया जादवानी जी के द्वारा इतने अच्छे से पढ़ते जाना और भी खूबसूरत बना रहा था उनकी कहानी को |
दूसरी कहानी रामकुमार तिवारी दादा द्वारा पढ़ी गयी थी, जिनको में सिर्फ यही कहूँगी की यदि किसी भी चीज में अपने शब्ददे दे, तो खुद अपने आप खूबसूरत हो जाती है | रामकुमार जी द्वारा मटके में रखे पानी का विवरण जिस प्रकार उन्होंने किया है इसमें, उसको सुनकर ही अगर प्यास नहीं भी लगी हो तो भी उस मीठे और ठन्डे पानी को पीना चाहेंगे | उसी वक्त और हो सकता है कि फ्रीज़ हटाकर मटका वाले स्वाद का लालच आपको मटका रखने पर मजबूर कर दे | कहानी बेहद संवेदनशील विषय पर है और उस दर्द को महसूस कर के लिखी गयी हो, ऐसी थी कहानी |

इन कहानियों के बाद समीक्षा के तौर पर सियाराम शर्मा जी की समीक्षा ने बहुत आकर्षित किया था अब फिर से समय हो गया था चाय का और उसके बाद फिर से 6-6 साथियों व एक लेखक के साथ ग्रुप में चर्चा का जिसमें बाकी साथियों सहित , लेखक व सिक्षक जयप्रकाश साव जी रहे | यह दूसरे दिन की समूह चर्चा थी, जिसमें गद्य-पद्य दोनों पर अच्छी चर्चा हुयी| जयप्रकाश जी के द्वारा उपनयास “गोदान” का जो बातों में चित्रण किया वह बहुत ही अद्भुद था |

थोड़ी देर से मेरी भी हिचक खुली और मेरे द्वारा लिखी गयी कहानी “सांझ का सफरनामा” उनके समक्ष पढ़कर उस पर आगे लिखने के सुझाव मांगे, क्यूंकि कहानी कही जाकर अटक गयी थी | कई बार सोचने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी | उस पर जयप्रकाश जी के द्वारा कुछ सुझाव भी दिए और बोले कि लिखते जाओ बाद में देखना और टिक करना कि क्या हटाना है और क्या रखना है| चर्चा समाप्ति के बाद पुनः खाने का समय हो गया और हम रात के खाने की तरफ चल दिए| खाने के दौरान भी सबसे बातों का सिलसिला चलता रहा क्योंकि शायद सबसे और कुछ भी ज्यादा जानना और सीख ना था|
खाने के बाद सब प्रतिभागियों से कुछ बातचीत के पश्चात मैं अपनी महिला मित्रों के साथ कमरे के तरफ चल दी|

कार्यक्रम के अंत में जीतराम मांझी जी के द्वारा बोला गया कि यहाँ से फ्री कर अब बैठेंगे बतियांगे, मेरा क्या था मैं बड़ी खुश, और झट से हाँ बोल दी पर समय पर भूल गयी| देर रात 11 बजे याद आया कि आज साथ बैठना था ,मंझी जी को पूछते हुए बगल के कमरे मेंअपनी महिला मित्र पुनीता के साथ पहुंची तो पाया की मांझी जी जा चुके थे| फिर वहां बैठे साथियों के साथ वहीं बैठ गयी और हम चर्चा करते रहे| फेसबुक लाइव चला दिया और नये साथियों से निवेदन कि या कि कविता पाठ करें| हम सब कविता पाठ में खूब मग्न हो गए और रात के 12:30 कब बज गए हमको पता ही न चला| साथ की महिला मित्र को नींद आने के चलते वो जाकर कमरे में सो गयी पर मैं और बाकी पुरुष साथी खूब मग्न थे कविता पाठ में, की तभी पीछे से एक गुस्से भरी आवाज आई “चलो उठो यहाँ से निकालिए और जाईय सोयिये “मुड़ कर देखा तो ललित सुरजन जी थे मैंने उन से रिक्वेस्ट किया की सर दो सेकंड बस जा रही , पर उन्होंने गुस्से में जवाब देते हुए बोला “तुरंत अभी उठिए यहाँ से”| मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की शायद उनको हमारा साथ बैठ कर देर रात चर्चा व कविता पाठ पसंद न आया था | मैं बिना किसी जवाब सवाल के उठ कर चली गयी | काफी बुरा सा महसूस हुआ था उस वक्त, ऐसा लगा था जैसे मैंने कुछ गलत किया हो , पर मुझे उसके बारे में जानकारी नही | आखिर क्या गलत था ? क्यूँ उनको गुस्सा आया ? ऐसा सोचते हुए आँखों में नींद जैसे उड़ गयी थी| उस रात काफी बैचेनी थी | जिसके कारण में पूरी रात ठीक से सो नहीं सकी |

अगली फिर से वही नयी सुबह और कुछ सीखने के लिए आतुर मेरे लिए ऊर्जा से भरा नया दिन शुरू हो चुका था | आँख खुली तो सूरज खिड़की से झांक रहा था | खिड़की के नजदीक गयी तो लहलहाते खेत की हरी भरी फसल मस्ती से नाच रही थी | कुछ देर उसको देख मस्तियाती रही और जब नहीं रहा गया तो फ़ोन उठाया और कुछ तस्वीरे खीचने में लग गयी | तभी पीछे से आवाज आई की “बहन जी नाश्ता खत्म हो जाएगा और तुम अभी तक तैयार तक नहीं हुई हो “ये आवाज थी पुनीता की जो हमारे रूम में तीनों में सबसे ज्यादा सीधी और जिन्दगी को जीने में भारी भी थी | इतना सुनते ही मैं घुस गयी बाथरूम में और तैयार होकर सीधा नीचे पहुंची जहा सब खा कर रेडी थे | जल्दी में नाश्ता खत्म कर के तीसरे दिन के सत्र के लिए कार्यक्रम कक्ष में जाकर बैठ गयी | सत्र की शुरुआत में ही मैं काफी उत्साही थी कि शायद हमको अपनी बात रखने का मौक़ा मिलेगा और जो लिख कर मंगाया था उसको पढ़ा जाएगा , परन्तु ऐसा नहीं हुआ | पूरा लिख कर ले जाया गया , नहीं पढ़ा गया | रवि सर ने संचालन का कार्य शुरू किया और शुरू में जितने बड़े लेखक और साहित्यकार आये थे उन्होंने दुसरे दिन की कहानियों पर अपनी टिप्पणी और विचार रखना शुरू किये | पहले सत्र के अंत में महेंद्र मिश्र जी के कहने पर जो प्रतिभागी आये हैं उनको भी बात रखने को बोलिए |जिस के बाद सब के बात रखने के दौरान मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला | तीसरे दिन का पहला सत्र खत्म होने को था और दूसरा सत्र शुरू होने में कुछ ही देर बाकी थी|

दूसरे सत्र में उपन्यासकार तेजिंदर जी का उपन्यास का अंश खुद तेजिंदर जी के द्वारा पढ़ा गया | उपन्यास का नाम में भूल रही हूँ, परन्तु उसका अंश मुझे अच्छे से याद है | उपन्यास में उनके द्वारा अपने बैंक में नौकरी करने के दिनों में हुए कुछ वाक्या को उपन्यास का रूप दिया था | जिसमें साफ़ दिखाया था कि धर्म के नाम पर राजनीति किस कदर हावी है |

सत्र के अंत में सबने अपने-अपने सवाल और जवाब तलब किये| फिर बाकी दिन की तरह ये दिन भी बीतने को था, पर आज ख़ास था की आज शाम के समय जगह जगह से आये प्रतिभागियों द्वारा कविता पाठ होना था, पर शाम हो कर कविता पाठ जिसमें मुझे भी अपनी एक कविता “ए कृषक” को पढने का मौक़ा मिल सके| सभी प्रतिभागियों द्वारा कविता का पाठ किया गय| अब चूंकि हम सब के साथ की आखरी रात थी इसलिए पिछले रात की डाट के बाद भी एक बार फिर से डाट का डर हटाकर सबके साथ बैठने को, बात करने को , एक दुसरे के बारे में जानने को दिल कर रहा था|
बस फिर क्या था सारे दोस्तों के साथ में छत पर चल दी ,ढेर सारी वो कविताएं जो हम शाम को सबके बीच पढ़ नहीं सके थे उन सभी कविताओं और किस्सों का जिक्र हम सभी साथियों ने एक दुसरे के साथ किया और बीच-बीच में छोटी छोटी बहसे भी होती रही | कभी आवाज तेज़ हो जाती तो कभी ललित सुर्जन जी के चेहरे को याद करके धीमी हो जाती थी|

फिर से अगली चोथे दिन की और हमारे साथ की सुबह हुई और एक आखरी बातचीत और प्रोत्साहन हेतु कुछ प्रमाणपत्र आयोजको व लेखको द्वारा सभी प्रतिभागियों को इस वादे के साथ दिए गए कि अगले 6 माह के भीतर एक और शिविर किया जाएगा | जिसके लिए आप सब को कुछ काम करना है जिसमें से एक था मुंशी प्रेमचंद जी के नाम से एक स्टडी ग्रुप का निर्माण करना , जो की मेरे द्वारा अभी किया जा चुका है | दूसरा था पूरे शिविर के बारे में लिख कर सुरजन जी को मेल करना ,कहानियों के बारे में लिखकर भेजना आदि| साथ ही उस आखरी बातचीत में सब से दिलचस्प था नीचे हॉल में बोर्ड पर लिखे कुछ सवाल, जिसके बारे में हमारे विचार मांगे गए थे| इस तरह इस रचना शिविर का समापन हुआ और हम वापस अपने अपने घरों के लिए बस व अन्य साधन से निकल चुके थे|

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प्रियंका, अधिवक्ता

बिलासपुर

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