विज्ञान कथायें : ” मस्तिष्क की सत्ता” से एक अंश। : वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है ? / हम पैदा ही नहीं होते तो क्या होता ? – शरद कोकास

विज्ञान कथायें : ” मस्तिष्क की सत्ता” से एक अंश। :  वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है ?  / हम पैदा ही नहीं  होते तो क्या होता ?   – शरद कोकास

विज्ञान कथायें : ” मस्तिष्क की सत्ता” से एक अंश। : वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है ? / हम पैदा ही नहीं होते तो क्या होता ? – शरद कोकास

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ज़रा सोचकर देखिये अगर आप पैदा ही नहीं होते तो क्या होता ? कुछ नहीं होता , यह दुनिया जैसे चल रही है वैसे ही चलती , आपकी पत्नी का कोई और पति होता या आपके पति की कोई और पत्नी होती ,आपके बच्चों का बाप भी कोई और होता । हंसिये मत जब आप ही नहीं होते तो उनके लिए ‘आपके’ शब्द कैसे प्रयोग कर सकते हैं ।

हम इस सन्दर्भ में ग़ालिब साहब की बात करते हैं , इसलिए कि सबसे पहले उन्हीने सोचा था , ” न होता मैं तो क्या होता” । मिर्ज़ा असदुल्ला खां ‘ग़ालिब’ अपने समय के महत्वपूर्ण शायर रहे हैं । ‘ इश्क़ वो आतिश है ग़ालिब ‘ इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया ‘ ग़ालिब छुटी शराब ‘ जैसी उनकी पंक्तियाँ मुहावरों और कहावतों की तरह उपयोग में लाई जाती हैं । ग़ालिब साहब का एक मशहूर शेर है “ न था कुछ तो ख़ुदा था ,कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझको होने ने ,ना होता मैं तो क्या होता । ” इस शेर में एक प्रश्न छुपा हुआ है । यह स्पष्ट है कि हमारा अस्तित्व ही हमारे जीवन के समस्त क्रियाकलापों के लिए उत्तरदायी है ।मस्तिष्क की सत्ता”से एक अंश*

*अध्याय -1*

*वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है?*

*1.हम पैदा ही नहीं होते तो क्या होता ?* *हम हैं इसलिए हमारे लिए यह दुनिया है, इस दुनिया के सारे प्रपंच हैं, सुख – दुख हैं, रिश्ते- नाते हैं, दोस्त-यार हैं, घर – परिवार है, समाज है,बाज़ार है ,फेसबुक है,व्हाट्स एप है यानि सब कुछ हैं ।*

संसार में उपस्थित सब कुछ उन्हीं के लिए है जो इस धरती पर जन्म ले चुके हैं। जो लोग इस दुनिया से विदा ले चुके हैं उनके लिए भी यह दुनिया उसी समय तक थी जब तक उनका अस्तित्व था। हमारे लिए केवल उनसे जुड़ी हुई चीजें, उनके द्वारा किए गए कार्य और उनकी स्मृतियाँ हैं, और वे भी हमारे लिए तभी तक हैं जब तक हम इस दुनिया में हैं ।

वस्तुत: गालिब ने यह शेर लाक्षणिक अर्थ में उस मनुष्य जाति के बारे में कहा है जिसने इस धरती पर लाखों वर्ष पूर्व जन्म लिया है । एक धार्मिक और ईश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति मुसीबत आने पर न तो स्थितियों को स्वीकार करता है न ही उनका तार्किक समाधान खोजता है अपितु मुसीबतों से घबराकर वह सीधे ईश्वर से प्रश्न करता है “ हे भगवान ! तूने मुझे पैदा ही क्यों किया ? “ या कष्टों से घबराकर वह कहता है ,’ईश्वर मुझे उठा ले’ । जन्म और मरण की अवधारणाओं से परिचित होने के पश्चात यह मनुष्य केवल जन्म के बारे में ही नहीं अपितु मृत्यु के बारे में भी निरंतर विचार करता रहा है । सुख की स्थितियों में यह जीवन उसे इतना प्रिय लगता है कि वह सामान्यत: मृत्यु के विषय में विचार नहीं करता। किसी ईश्वरीय सत्ता में विश्वास न करने वाले लोग भी दैनन्दिन व्यवहार में इस तरह के साधारण वाक्यों का प्रयोग करते हैं और जीवन – मरण जैसे शाश्वत प्रश्नों का समाधान अन्य क्रियाकलापों में ढूँढते हैं ।

न ब्राह्मण पैदा हुआ मुख से
न क्षत्रिय पैदा हुआ भुजाओं से
वैश्य और शूद्र के
जंघा और पांवों से पैदा होने का
तो सवाल ही पैदा नहीं होता
हम अब इतने अज्ञानी भी नहीं
कि जान न सकें
कोई कहाँ से पैदा होता है

एक समय था जब मनुष्य इस बात को नहीं जानता था कि मनुष्य का जन्म कैसे होता है । वह अपनी अज्ञानता में हवा , बादल, पानी को इसका ज़िम्मेदार मानता था । हमारी पुराण कथाओं में ही नहीं विश्व के तमाम मिथकीय साहित्य में मनुष्य के जन्म लेने के ऐसे ही किस्से हैं । कहीं कोई पेड़ से पैदा हुआ तो कोई समुद्र से, कोई किसी यज्ञ से , कोई फल खाने से । महाभारत नामक महाकाव्य में ध्रतराष्ट्र के सौ पुत्र घड़े से पैदा हुए । ग्रीक माइथोलॉजी में अपने पिता ज्यूस द्वारा गर्भवती माता मेटिस को निगल लिए जाने के बाद ग्रीक देवी एथीना अपने पिता का सर फाड़कर पैदा हुई वहीं ग्रीक देवता डायनोसिस का जन्म अपने पिता ज्यूस की जांघ से हुआ ।

यद्यपि यह बहुत बाद की बात है लेकिन यौनिकता की ठीक से समझ न होने के कारण तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण न होने के कारण और जन्म मृत्यु का वैज्ञानिक कारण न जानने के कारण ऐसे किस्से -कहानियों में जन्म के ऐसे ही कारणों का उल्लेख होता रहा ।

धार्मिक और पौराणिक ग्रंथों के लेखन के समय जो तत्कालीन समाज व्यवस्था थी उसकी पड़ताल न करते हुए हम सिर्फ चमत्कारों और लिखे जा चुके शब्दों में विश्वास करते रहे । इसके अलावा कुछ दृष्टांत सामाजिक व्यवस्था में जानबूझकर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए भी गढ़े गए जैसे ऋग्वेद में ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण , भुजाओं से क्षत्रिय , जंघा से वैश्य तथा पांवों से शूद्र के जन्म लेने का दृष्टांत ।

इस वर्ण व्यवस्था का प्रभाव यह हुआ कि जातियों का निर्माण हुआ उनके अनुसार समाज में ऊँच -नीच जैसी अवधारणायें बनीं । सदियों तक समाज में निम्न वर्ग को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता रहा और उनका शोषण व उत्पीड़न जारी रहा । इसकी वज़ह केवल यही रही कि हमने सामाजिक नियामकों की अवैज्ञानिक सोच को समाज के मस्तिष्क पर हावी होने दिया ।

आज भी हम लोग धर्म में आस्था के कारण ऐसे किस्सों और धारणाओं पर सहज विश्वास कर लेते हैं और यही नहीं अतार्किक रूप से उन्हें छद्म वैज्ञानिकता से जोड़ने का प्रयास भी करते हैं ।

आज विज्ञान का युग है , *आज स्कूल जाने वाले बच्चों तक को यह ज्ञात है कि उनका जन्म कैसे हुआ है।* आप उन्हें फुसला नहीं सकते कि आप उन्हें अस्पताल से लाये हैं या कोई परी आकर दे गई है , झूठ कहेंगे तो उल्टे वे आपको समझा देंगे ।

लेकिन आप अपनी अंध आस्था के कारण बच्चों को भी उन झूठे किस्सों में जबरिया विश्वास करने के लिए बाध्य करते हैं । उनके सवालों के सही सही जवाब नहीं देते । यद्यपि एक ओर पढ़ा लिखा मनुष्य प्रजनन सम्बन्धी वैज्ञानिक कारणों को भी जानता है वहीं दूसरी ओर उन पौराणिक किस्से -कहानियों में भी विश्वास करता है । *इस दोहरी मानसिकता की वज़ह यही है कि धर्म और ईश्वर का भय उसे भयभीत करता है ।*

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*क्या हमारे भीतर अमर हो जाने की सुप्त इच्छा नहीं है ?*

जौक साहब ने फ़रमाया है

*लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली चले,*
*अपनी ख़ुशी न आये, न अपनी ख़ुशी चले.*

बहुत साधारण सा वाक्य है कि न हम अपनी मर्ज़ी से दुनिया में आते हैं न अपनी मर्ज़ी से दुनिया से जाते हैं बल्कि सच्चाई तो यह है कि दुनिया में एक बार आ जाने के बाद दुनिया के निन्यानबे प्रतिशत लोग मरना ही नहीं चाहते । इसका सरल सा कारण है । यद्यपि स्वयं का जन्म मनुष्य के वश में नहीं है न ही वह इसके लिए उत्तरदायी है लेकिन जन्म लेने के पश्चात यह जीवन और यह शरीर उसे इतना प्रिय लगने लगता है कि लाख कष्टों के बावज़ूद वह इसे जीवित रखने का भरसक प्रयास करता है ।

यह स्वाभाविक भी है । वह उन समस्त सुख-सुविधाओं का उपभोग करना चाहता है जो उसके पूर्वजों द्वारा अनवरत परिश्रम से जुटाई गई हैं । वह स्वयं भी इस मनुष्य जाति के विकास हेतु कटिबद्ध है , आनेवाली पीढ़ी के लिए वह अधिक से अधिक सुविधाएँ जुटाने की इच्छा रखता है और उसके लिए नित नये आविष्क़ार कर भविष्य के मनुष्य की बेहतरी के लिए कुछ करना चाहता है । मनुष्य के भीतर सारी सुख – सुविधाओं के साथ जीते हुए अमर होने की एक सुप्त इच्छा भी होती है ।

हालाँकि वह इस बात को बेहतर जानता है कि न कोई अमर हो सकता है न कोई इस जन्म में सुख पाने के विचार को स्थगित कर अगले जन्म में सुख पाने की अभिलाषा कर सकता है । हमें जो चाहिए वह इसी एकमात्र जन्म में चाहिए क्योंकि मनुष्य या किसी भी प्राणी का सिर्फ एक ही जन्म होता है ।

लेकिन यहीं कहीं कुछ चालाक लोग उसकी इस सुप्त इच्छा को भुनाते हुए उसे पाप – पुण्य , मोक्ष , पुनर्जन्म आदि के जाल में फंसाते हैं । वे उन्हें बरगलाते हुए कहते हैं कि भाइयों इस जन्म में आपको सुख मिले न मिले अगले जन्म में जरूर मिलेगा , बस जरा दान – पुण्य करें ।

यह वे लोग हैं जो आपको कर्म से विमुख करते हैं और भाग्यवादी बनाते हैं । यह लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर आपका भावनात्मक शोषण करते हैं ।

इस दिशा में विचार करने की आवश्यकता है कि यह स्थितियाँ किन कारणों की वज़ह से हैं । वैसे भी हम विचारवान मनुष्य हैं ,अपने पूर्वजों की तरह इस दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं और मनुष्य होने के कर्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं । एक मनुष्य के रूप में हर व्यक्ति एक चेतना संपन्न व्यक्ति है और एक सुदृढ़ मस्तिष्क का मालिक है । बेहतर होगा हमें परलोक का लालच या भय दिखाकर हमारा शोषण करने वाले इन पाखंडियों का हम विरोध करें । ध्यान रखिये …आपका नाम अमर हो सकता है शरीर नही और अमर अगर आप होंगे तो अपने कर्मों से होंगे अपने शरीर से नहीं ।

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*चेतना और पदार्थ*

एक मनुष्य के रूप में हर व्यक्ति एक चेतना संपन्न व्यक्ति है और एक सुदृढ़ मस्तिष्क का मालिक है चेतना का अर्थ आप जानते होंगे ,चेतना अर्थात हमें उद्वेलित करने वाली गर्व ,लज्जा,क्रोध,हर्ष, प्रेम, घृणा आदि भावनाएं ,हमारे नेत्र,नाक,कान, जिव्हा,स्पर्श आदि ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त अनुभूतियाँ ,और अंततः हमारे मस्तिष्क को सदा व्यस्त रखने वाले विचार यह सब चेतना है ।

चेतना से बाहर जो कुछ भी है वह सब पदार्थ है । पदार्थ मतलब हमारे चारों ओर उपस्थित वस्तुएं या पिंड जिनमें भौतिकीय ,यांत्रिकीय रासायनिक तथा शरीर क्रियात्मक प्रक्रियाएं घटती रहती है उन्हें ही भौतिकीय परिघटनाएं अथवा पदार्थ या भूतद्रव्य कहा जाता है ।

जैसे जैसे मनुष्य के शरीर का विकास होता है वह अन्य मनुष्यों के संपर्क में आकर विभिन्न कार्य सीखता है , रंग, ध्वनि व गंध में भेद करने लगता है इस तरह उसकी भावनाएं परिष्कृत होती हैं । जब उसका शरीर दुर्बल पड़ने लगता है ,अनुभूतियों और विचार करने की क्षमता पर भी उसका प्रभाव पड़ता है । । यद्यपि मस्तिष्क में अवचेतन की क्षमता बढ़ जाती है ,वहाँ भंडारण भी अधिक हो जाता है लेकिन उसे रिकाल करना मुश्किल होता है । इन सब बातों का सम्बन्ध हमारी चेतना से है । इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य का यह भौतिक शरीर ही उसकी चेतना का वाहक होता है । सीधी सी बात है भौतिक शरीर के बाहर चेतना का अस्तित्व कैसे हो सकता है ?

अन्य प्राणियों से इतर मनुष्य के भीतर यह क्षमता है कि वह कुछ करने से पहले उसके बारे में सोच सकता है । मनुष्य की मुक्ति की आकांक्षा और समाज में व्याप्त शोषण और अन्याय के खिलाफ विचार करने की क्षमता और फलस्वरूप उपजे क्षोभ ने ही उसे शोषकों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया । इतिहास गवाह है कि मेहनत कश इंसान और प्रभुत्व संपन्न वर्ग के बीच हमेशा से संघर्ष रहा है, उसकी भौतिक स्थितियों ने ही हमेशा उसे संघर्ष के लिए प्रेरित किया है । इस संघर्ष में उसकी चेतना की प्रमुख भूमिका है ।

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*भौतिकवाद और भाववाद*

यदि हम बीती सदियों के पन्ने पलटकर देखें तो हमें ज्ञात होगा कि इस बात पर दार्शनिकों में सदा विवाद होता रहा है कि चेतना प्रमुख है या पदार्थ । इस आधार पर दार्शनिक दो खेमों में बंट गए , विश्व को चेतना की उपज मानने वाले प्रत्ययवादी और चेतना को भौतिक विश्व या प्रकृति की उपज मानने वाले भौतिक वादी । जब तक समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास नहीं हुआ और भौतिकवाद की महत्ता स्थापित नहीं हुई यह विवाद चलता रहा ।

हम आज भी दार्शनिक बहसों में नहीं उलझना चाहते । ऐसा हम दर्शन की ठीक- ठाक समझ न होने के कारण करते हैं । दर्शन को सामान्यतः अध्यात्म से जोड़ कर देखा जाता है । *बिना सिर पैर की बातें करने वाले के लिए भी हम कहते हैं देखो वह फिलोसफ़र टाइप की बातें करता है ।* वास्तव में दर्शन का अर्थ होता है जीवन और स्थितियों के प्रति आपकी समझ और विश्व को जानने के प्रति आपका दृष्टिकोण । दर्शन आपसे सवाल करता है , आप अपनी परिस्थितियों को समाज की उपज मानते हैं या भाग्य की उपज ? आप अपनी समस्याओं का समाधान इसी जगत में ढूँढते हैं या पारलौकिक जगत में ? यह प्रश्न आपके दर्शन से सम्बन्ध रखता है ।

दर्शन की अवधारणा को लेकर यह समाज आध्यात्मिक या भाववादी दर्शन तथा भौतिक वादी दर्शन में बंट गया । भौतिकवादी दर्शन के अनुसार यह प्रकृति ही सब कुछ है लेकिन भाववादियों ने आत्मा की महत्ता प्रकृति से ऊपर स्थापित की और हर समस्या का समाधान पारलौकिकता में ढूँढा । *मनुष्य की नियति को लेकर उनके प्रिय वाक्य रहे .. ‘यह तो सब पहले से ही लिखा है’ ,’यह तो होना ही था’ आदि* ,जबकि भौतिकवादी जानता है कि उसकी समस्या का समाधान इसी जगत में है ।

अब आपकी आमदनी नहीं बढ़ रही तो आप उसके लिए प्रयास करते हैं या उसे किस्मत के भरोसे छोड़ देते हैं ? बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं या भगवान भरोसे छोड़ देते हैं ? किसी अपराधी को दण्ड दिलाने के लिए प्रयास करते हैं या सोचते हैं कि उसके भाग्य में जो लिखा है वही होगा ? इस तरह हम इन लौकिक सवालों के जवाब इसी लोक में ढूँढते हैं , यही भौतिकवाद है ।

दरअसल हममें से कुछ लोग पूरी तरह भाग्य वादी है और कुछ थोड़े भाग्यवादी और थोड़े कर्म वादी । वे कहते हैं सिर्फ भाग्य में लिखे रहने से कुछ नहीं होता ,उसके लिए कर्म भी करना पड़ता है । अजीब दोगलापन है भाई ? जब कर्म ही करना है तो फिर भाग्य के भरोसे क्यों रहते हो ? कहो कि मैं जैसा कर्म करूँगा उसका परिणाम उस तरह से होगा । ऐसा नहीं होता कि असफलता के पीछे कोई कारण न हो दो व्यक्ति एक जैसा प्रयास करते हैं , एक जैसी टाइमिंग होती है फिर भी एक सफल होता है एक असफल इसके पीछे कुछ कुछ सूक्ष्म भौतिक कारण ही होता है लेकिन हम भाग्य पर भरोसा करने के कारण उस सूक्ष्म कारण को निगलेक्ट कर देते हैं ।

उदाहरण के लिए ,दो छात्र एक जैसी परीक्षा देते हैं लेकिन परिणाम इसीलिए अलग आता है । एक टाइम पर दो राकेट छोड़े जाते हैं लेकिन एक अन्तरिक्ष में जाता है एक ध्वस्त हो जाता है तो इसके पीछे भी कंप्यूटर या कोई तकनीकी गड़बड़ी होती है , भाग्य नहीं ।

इसीलिये शायर ने कहा है …..

*तुम सितारों के भरोसे पे न बैठे रहना*
*अपनी तदबीर से तक़दीर बनाते जाओ*

(सदा अम्बालवी)

*क्लिनिकल डेथ क्या है ?*

एक बार अपने छात्रों से मैंने जब यह सवाल पूछा तो एक छात्र ने जवाब दिया ” सर जो डेथ डॉक्टर की क्लिनिक में होती है उसे क्लिनिकल डेथ कहते हैं ” मैंने कहा ” इसका मतलब घर में डेथ होगी तो होम डेथ , सड़क पे होगी तो रोड डेथ कहेंगे क्या ? ”

दरअसल क्लिनिकल डेथ अथवा नैदानिक मृत्यु का अर्थ है हृदय का पूरी तरह से काम करना बंद कर देना , सांसों का रुक जाना और मस्तिष्क की कोशिकाओं का नष्ट हो जाना अर्थात मस्तिष्क की मृत्यु । यह आप बेहतर जानते हैं कि हमारे आसपास जो कुछ भी घटित होता है उसे हम अपने मस्तिष्क या दिमाग़ के द्वारा महसूस करते हैं ।

मानसिक गतिविधियों से लेकर शारीरिक गतिविधियों तक समस्त सम्बन्धित कार्य मनुष्य अपने मस्तिष्क से करता है । डेढ़ किलो औसत वज़न का, धूसर रंग का और मख्खन जैसा नर्म यह अंग जिसमें लाखों तंत्रिकाओं का जाल है , जिसकी गति किसी तेज़ कम्प्यूटर से भी अधिक तेज़ है मनुष्य के जन्म के साथ ही अस्तित्व में आ जाता है यहाँ तक कि गर्भावस्था में भी यह दिल धड़कने से चाँद सेकण्ड पहले काम करना शुरू कर देता है ।

इस दुनिया का और मानव जाति का अब तक का सम्पूर्ण विकास मनुष्य के मस्तिष्क में ही दर्ज़ है । यह बात वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध हो चुकी है कि मनुष्य के सारे अंग काम करना बन्द कर दें लेकिन जब तक मस्तिष्क काम करना बन्द नहीं करता उसे जीवित ही माना जाता है । डॉक्टर द्वारा ‘क्लीनिकल डेथ’ घोषित करने का अर्थ भी यही है ।

यह मनुष्य के मस्तिष्क का ही कमाल है कि जिस मनुष्य को अंग ढाँकना तक नहीं आता था,सीधे खड़े होना नहीं आता था,उंगलियों का उपयोग करना नहीं आता था, वह इसी मस्तिष्क की ताकत से आज मंगल ग्रह तक जा पहुंचा है । यह उसके मस्तिष्क की ही क्षमता है कि वह इसके द्वारा अपनी कल्पनाओं को साकार करने का प्रयास करता है ।

बहरहाल बात मौत से शुरू की थी तो एक शेर अर्ज है जनाब अहमद नदीम कासमी का

*कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा*
*मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा*

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*शरद कोकास*
8871665060

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