क्या आदमी चूहे से भी बदतर है ?- हरिशंकर परसाई की कहानी ” चूहा और मैं ” का बीच चौराहे पर बच्चों के साथ पाठ और चर्चा : कहानी के माध्यम से दी अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा .

रिपोर्ट कुलदीप सिंह

16.12.2017
बिलासपुर
“सफलता पाने के लिए शिक्षा की जरुरत होती है डिग्री की नहीं’’-मुंशी प्रेमचंद की कही गयी ये बात आज के समय में भी उतनी ही सार्थक है जितनी उनके जमाने में हुआ करती थी | मुंशी प्रेमचंद ने जिन्दगी भर व्यवहारिक ज्ञान को किताबी ज्ञान से अधिक महत्व दिया और वो हमेशा चाहते थे कि छात्र साहित्य के माध्यम से समाज को समझने और उसकी समस्याओं को खत्म करने का कार्य करें | मुंशी प्रेमचंद जी के इसी सपने को साकार करने का संकल्प लिया है छत्तीसगढ़ के मुंशी प्रेमचंद पाठक संघ ने जिसके सदस्य लगातार बच्चों को साहित्य से जोड़ने के लिए गली-मोहल्लों में जाकर उनके बीच कहानी-कविताओं का पाठन और अन्य साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित कर रहें हैं |

इसी कड़ी में संगठन के सदस्यों ने कल शनिवार को बंधुआ पारा के बच्चों के बीच जाकर हरिशंकर परसाई की कहानी “चूहा और मैं” के पाठन के माध्यम से बच्चों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा दी जिसमें उनके अभिवावकों और अन्य बस्ती वालों ने भी भाग लिया |

तकरीबन शाम के 6:00 बजे संगठन के सदस्यों को गली में प्रवेश करते देख बच्चों के चेहरे खिल गए और अपने अन्य साथियों को घर से यह कहकर बुलाने लगे कि “दीदी-भैया लोग कहानी सुनाने आये हैं” | सभी ने आकर कायदे से चबूतरे के पास चटाई बिछाई और कहानी सुनाने आये अपने दीदी-भैया लोगों को उत्सुकता से देखने लगे | कहानी पाठन के लिए आये सदस्यों में प्रियंका शुक्ला और डॉ लाखन सिंह मौजूद थे | प्रियंका जी ने कहानी को पहले बच्चों से पढ़वाया और फिर अपने शब्दों में पढ़कर समझाया कि “हरिशंकर परसाई द्वारा लिखी गयी ये काहानी हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है और इस कहानी में आज की सामाजिक स्थिति को बहुत ख़ूबसूरती से दर्शाया है |

आज हम अपने ऊपर होते जुल्मों को देखने के बावजूद भी उन्हें सहते रहते हैं और कभी विद्रोह नहीं करते जो बहुत ही दुखद है| इस कहानी के माध्यम से लेखक हमसे सवाल पूछता है की क्या हम चूहे से भी बदतर हैं जो अपने अधिकारों के लिए कभी खड़े नहीं होते और मूकदर्शक बनके अन्याय होते हुए देखते रहते हैं| चाहे घरेलु हिंसा से तड़पती महिलाओं की चीखें हों या गरीबों, दलितों, महिलाओं सहित समाज के अन्य वर्गों के साथ होते भेदभाव हों, हम कभी इन सामाजिक बुराइयों को खत्म करने का प्रयास नहीं करते |”

प्रियंका जी ने सभी बच्चों को यह सन्देश दिया कि जब भी अपने आस-पास हमें कुछ गलत होता हुआ दिखे हम सभी को उसके खिलाफ खड़े होने की जरुरत है और आगे चलकर अहिंसक तरीके से लड़ना है | इसके लिए उन्होंने बच्चों को बाबासाहब आंबेडकर, भगत सिंह और राजा राम मोहन रॉय जैसे समाज सुधारकों के बारे में पढने की सलाह दी | जब बच्चों से पूछा गया की उन्होंने इस कहानी से क्या सीखा तो उन्होंने उत्तर दिया की लेखक हमें ठीक वेसे ही निरंतर अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने का सन्देश देता है जैसे घर में एक चूहा अपने खाने,पीने से लेकर जिन्दगी की अन्य जरुरतों को लेकर रहता है |

इसी दौरान लाखन सिंह जी ने बच्चों को बताया कि “हरिशंकर परसाईं पाठकों के बीच अपनी व्यंगात्मक रचनाओं के माध्यम से जाने जाते हैं और वो अपनी कहानियों में हँसी-ठिठोली और मनोरंजन के माध्यम से समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करते थे | इस कहानी का नायक एक छोटा चूहा अपने भोजन के स्वाद के प्रति भी इतना सजग रहता है कि लेखक के द्वारा चावल फेंकने पर वो उन्हें नहीं खाता और सिर्फ गेंहू से बने व्यंजनों को उसके लिए डालने को मजबूर कर देता है, क्या हम इंसानों की नस्ल एक छोटे जानवर से भी बदतर है जो गूंगा-बहरा बनकर सब कुछ हाथ पे हाथ धरे देखते रहते है और अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते |” लाखन जी ने बताया कि “इस कहानी में घर का मालिक कोई और नहीं बल्कि हमारी सरकार है जो काफी बलशाली है और हमारे अधिकारों की रक्षा करना सरकार का कर्त्तव्य है | ना सिर्फ संविधान में दिए हुए मौलिक अधिकार हमारे पास हैं बल्कि उन अधिकारों के लिए लड़ने का भी अधिकार हमारे पास है | इसलिए चाहे बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हो या स्वच्छ-सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार, हम सभी को इनके बारे में पढने और आगे चलकर उनकी रक्षा करने की जरुरत है | कहानी पाठन के साथ ही बच्चों ने गीतों और कविताओं के माध्यम से भी अपने विचार प्रस्तुत किये जिनमें सामाजिक एकता, सांप्रदायिक सौहार्द्र का संदेश देने वाली कविताओं से लेकर हलके-फुल्के मनोरंजन से जुड़े गीत भी शामिल थी |

पूरे कार्यक्रम के दौरान बच्चों के चेहरे पर ख़ुशी और उत्सुकता देखी जा सकती थी | इसी दौरान प्रियंका जी ने निर्भया सामूहिक बलात्कार की वर्षी पर छात्रों और सामाजिक संगठन के आन्दोलन को याद किया और बच्चों को घटना की जानकारी दी जिसके पश्चात सरकार को बलात्कार विरोधी क़ानून लाघू करने पर मजबूर होना पड़ा | अंत में बच्चों ने हाथ उठाकर वादा किया कि इस प्रकार के साहित्यिक कार्यक्रम मे वो आगे भी सहयोग देते रहेंगे |
अंत मैं हिदायतलल्ला लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र कुलदीप सिंह ने भी कहानी पर चर्चा की

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