|| एक लड़की के बिखरे नोट || सोच बदलनी चाहिये \\ सहने की ताकत \\ ज़हीन सिंह

|| सोच बदलनी चाहिए ||

कहा किसी ने मेरे घर के पास
कुछ दिन में होंगे लड़के घर मे ,रोटियां बनाएंगे और लड़कियां करेंगी बाहर के काम .

क्या हर्ज है इसमे सदियों से महिला कर रही है बाहर के काम ,और उठा रही है घर की जिमेदारियाँ बखूबी से .

फिर उसे क्यों ताना मारा जाता है, आज के युग में ,यह ताना कोई पुरूष नहीं मारता ,केवल महिला ही महिला को मारती हैं ,.
सुनो मेरी बहनो मेरे पडोसी .

स्त्री के बिना सुना है संसार
स्त्री लाती है घर मे खुशियों की बहार
स्त्री से ही है दुनियाँ की चकाचोंध
स्त्री बिना अधूरा है हर एक मकान
अपने नाम को खोकर बनती है किसी के घर की बहू .
अपने आप को मारके सजाती हैं बच्चों के लिये सपने .
दिन रात घर की सजावट और खाने मैं बीतता है दिन .
त्योहारों में होता है जी जान की मेहनत
इस सबके अलावा करती हैं खुद को तैयार इस दुनिया से लड़ने के लिए …
बाहर की दुनिया को सम्हालते हुये भी थकती नहीं है वो .

लडक़ी होना खुद के लिये गर्व की बात है
शुक्र है कि में एक लडक़ी हूँ
सारी खूबियां है मेरे अंदर जो होनी चाहिये किसी भी इंसान में .

?⚫? || सहने की ताक़त ||

एक छोटा बच्चा जब चलना सीखता है तब बार बार ज़मीन पर गिरता है फिर उठता है,फिर गिरता है फिर गिरता है फिर उठता है .

और कुछ महीनों में चलना सीख ही जाता है , ..बच्चे को नहीं याद पुराना गिरने की दर्द ..

उसे नहीं याद कब चलने की कोशिश में गिरता था ,

वैसे ही हम जब अपनी जिंदगी के किसी मोड़ पर गिरते है ,तो दिल में बैठा लेते है ,

,बार बार सोचते है कि मुझे चोट लगी ,में गिरी मुझे दर्द हुआ ,

औऱ उसी दर्द को दिन रात सोच सोच के आगे के कदम के बारे में भी सोचते ,

और जब हमारा दिमाग वो दर्द को याद करते करते भर जाता है ,
तब हम एक कदम भी आगे बढ़ने से पीछे हटते है,
बच्चों से सीखो मत रखो याद ,
पुराना दर्द ,पुरानी गलती ,पुराना रोना ,
आगे बढो …… बस बढते जाओ ….

जैसे पत्थर पर बार बार ठोकने से या तो वो टूट जाता है या फिर मजबूत हो जाता है ,कि कोई उसे तोड़ न सके ,

एक नाज़ुक लकड़ी को कोई भी काट सकता है,तोड़ सकता है ,उखाड़ सकता है,

पर सालों धूप मौसम आंधी तूफान मैं .अकेले पडे लकडी को तोडना बडा मुश्किल है,

ऐसे ही बनो .. आती है तकलीफें तो आने दो , तुम्हें आगे के लिये बहुत मजबूत बनायेंगी ,

पर फैसला.आपका हैं ,परिस्थिति से हारना या परिस्थिति को अपने आपको मज़बूत करने का मौका देना ..

***

ज़हीन सिंह

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