बेबी हालदार ने अपने संघर्षों के भोगा हुआ यथार्थ लिखा ,समाज की रूढ़ियों के खिलाफ और संवेदना के साथ साहस का लेखन है ,ऐसी राइटिंग समाज मे एक्टविस्ट पैदा करती है : पाठक मंच में आज आलो अंघारी पर चर्चा .

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3.12.2017 बिलासपुर

आज पाठक मंच बिलासपुर मैं बेबी हालदार के उपन्यास आलो अंघारी पर चर्चा की गई .गोष्ठी की अध्यक्षता नमिता घोष ने की और मुख्य वक्तव्य प्रोफेसर शितेंद्र नाथ चौधरी ने प्रस्तुत किया , प्रमुख वक्तव्य शुक्ला चौधरी ने लिखित रूप से पढ़ा और अपनी कविताएँ भी सुनाई , कार्यक्रम का संचालन संयोजक शाकिर अली ने किया .गोष्टी में नन्द कश्यप ,डॉ. सत्यभामा अवस्थी ,कपूर वासनिक ,प्रथमेश मिश्रा ,सविता प्रथमेश , नीलोत्पल शुक्ला,रवि बेनर्जी निकिता और डॉ. लाखन सिंह आदि उपस्थित थे ,,.

साहित्यकार और कवि शुक्ला चौधरी ने अपने वक्तव्य में उन्होंने बेबी हालदार के उपन्यास के कोनो कोनो की छानबीन करते हुए अपने जीवन अनुभवों को मिलाकर एक श्रेष्ठ गद्ध पढ़ा ,जो समीक्षा से भी कहीं बढ़कर था .आग्रह पर उन्होने ‘बोलती आंखें ‘ ” सुर सरिता ” मकान ,” अनन्तकाल ” आदि कविताओं का पाठ भी किया .


डॉ. सत्यभामा अवस्थी ने कहा कि उपन्यास बहुत रोचक है ,अंधरे से निकलकर दुःख सुख वाले जीवन जो उन्होंने भोगा उसे बेहतर तरिके से अपनी स्वाभविक भाषा मे लिखा है ,उसके प्रभाव में हमने अपने आसपास के चरित्रो को भी समझने में सहायता मिली . बेबी ने जो साहस के साथ लिखा वो शायद हम लोग नहीं लिख सकते .यह उनकी मौलिक रचना है जो हमें भी लिखने की प्रेरणा देती है ,.

लाखन सिंह ने कहा कि 2013 के आसपास बेबी हालदार बिलासपुर आयीं थी तब आलोक पुतुल ने उनसे बातचीत की थी ,में भी उनसे मिला था , उनके चेहरे पर सब कुछ लिखा दिखता था ,उन्होंने जैसा जीवन जिया और जो भुगता ऐसी कहानियों और लोग हमारे आसपास बिखरे पडे है लेकिन कोई ही बेबी जैसी होती है जो अपनी व्यथा को इतनी विपरीत स्थितियों में इतने सहज तरीके से लिखता और हम तक पहुचा पाता हो .यह किताब हमे लिखने को प्रेरित भी करती है कि हम भी अपना यथार्त सहज तरीके से लिखें .हमे उस बेटी के गर्व को समझना होगा जब बेबी की 11 साल की बिटिया कहती है “, मेरी माँ रायटर है ”

मार्क्सवादी विचारक नन्द कश्यप ने कहा कि पहले भी इस पुस्तक की खूब चर्चा हुई थी ,इस किताब ने बहुत सी लेखिकाओं को प्रेरित किया ,
बेबी हालदार ने अपने संघर्षों के भोगा हुआ यथार्थ लिखा ,समाज की रूढ़ियों के खिलाफ और संवेदना के साथ साहस का लेखन है ,ऐसी राइटिंग समाज मे एक्टविस्ट पैदा करती है ,लोगों में साहस पैदा करती हैं ,

निकिता ने कहा कि 14 साल की प्रैग्नेंट महिला की बात लेखिका करती है,हमारे घरों में जो कामकाजी महिलाएं है उन्हें उनके जीवन मे बहुत सताया गया है ,यह बहुत महत्वपूर्ण है कि महिलाओं के जीवन मैं इतने सारे अनुभव होते हैं ,इसीलिये यह जरूरी है कि सभी को थोड़ा थोड़ा लिखना चाहिये ,तो बहुत सामग्री हो जायेगी .
सविता प्रथमेश ने कहा कि मैने पुस्तक तो नहीं पढ़ी लेकिन समीक्षायें जरूर पढीं है ,यह पुस्तक आत्मसम्मान के लिए लिखी गई है यह हमें यह प्रेरणा भी देती है कि हम अपने व्यवहार के भी आत्ममंथन करें कि हम खुद कैसा व्यवहार करते हैं .

प्रमुख वक्तब्य प्रोफ़ेसर शितेंद्र नाथ चौधरी दिया और कहा कि यह नोट किया जाना चाहिए कि यह उपन्यास एनसीआरटी में भी है और सीबीएसई में पढाई जाती है और दूसरी बात यह कि इस उपन्यास को प्रकाशक रमेश गोस्वामी ने खुद मांग कर छापी थी जो एकदम असमान्य घटना थी ,प्रकाशक इसे छाप.कर धन्य हो गये थे .बेबी हालधार के जीवन मैं उसे दुखों का सामना तो बहुत करना पडा ,साथ ही.बीच बीच मैं सुख के क्षण भी आते है ,उसे आलो अंघारी इसलिए भी लिखा कि प्रकाश और अंधकार दोनो से बेबी गुजरती रही .भीषण संघर्ष करना पडा ,इस वर्ग की पीडा़ को उन्होंने वाणी दी समानांतर कहानी मे कहा गया कि ज़िंदगी ही कहानी है यह यहाँ सही बैठती हैं .

अंत मैं साहित्यकार ,रंगकर्मी नमिता घोष ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि में ख़ुद बेबी से भिलाई में मिलीं हूँ ,मेने उनके चेहरे में समाज के में अन्याय के प्रति नफ़रत और गुस्सा और भोगा हुआ यथार्थ परिलक्षित होता है . शोषण का प्रतीक है यह उपन्यास जिसमे उस नग्न शोषण को समझदारी और साहस के साथ उजागर किया है. सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक ढांचा कैसा चरमराया है इसका बेहतर चित्रण है यह उपन्यास .

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