2.12.2017

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने शिक्षाकर्मियों के आदोलन के दमन के खिलाफ बयान जारी करते हुये कहा है कि शांति पूर्वक तरीके से एकजुट होना सरकारी नीतियों का विरोध करना लोकतांत्रिक व संवैधानिक अधिकार हैं, परंतु राज्य सरकार तानाशाही तरीके से विरोध करने के अधिकार को ही खत्म कर रही हैं। आज राजधानी में शिक्षाकर्मियों के संविलियन की मांगों पर आयोजित होने वाली विशाल रैली की अनुमति न देकर प्रदर्शन के स्थान पर धारा 144 लगाई गई हैं तथा आधी रात से प्रदेश स्तरीय नेताओं की गिरफ्तारियाँ की जा रही हैं। रायपुर तक शिक्षाकर्मी पहुँच ही न पाए इसलिए जगह जगह नाकेबंदी कर गिरफ्तारियां जारी हैं।

ज्ञात हो कि कुछ दिन पूर्व ही ठीक इसी प्रकार राज्य सरकार ने 8 जिलों में धारा 144 लगाकर किसान संकल्प यात्रा को रोका था और बढे पैमाने पर किसानों पर दमनात्मक कार्यवाही की गईं थी । छत्तीसगढ़ बचाओ अंदोलन राज्य सरकार की इस दमनात्मक कार्यवाही की कड़ी निंदा करता हैं और यह आगाह करता हैं कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के कार्यवाहियों पर सरकार तत्काल अंकुश लगाए अन्यथा इसके खिलाफ पूरे प्रदेश में व्यापक जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन मानता हैं शिक्षाकर्मियों के संविलियन के अधिकार की मांग जायज हैं,क्योंकि शिक्षा कर्मी या संविदा नियुक्ति समाजिक विकास की जरूरी प्रक्रिया का मज़ाक है । इससे शिक्षा का सिर्फ व्यावसायिकरण ही हो रहा है और सरकार सबको समान शिक्षा देने के संवैधानिक अधिकार का उल्लघंन कर रही है । शिक्षा कर्मियों की मांगें संवैधानिक है उसका दमन समान शिक्षा पाने के नागरिक अधिकारों का भी उल्लघंन है ।

राज्य सरकार की वादाखिलाफी से आज पूरे प्रदेश में व्यापक असंतोष व्याप्त हैं। सरकार ने जनता के बीच अपना विश्वास खो दिया हैं। राज्य सरकार जनपक्षीय नीतियों के बजाए कारपोरेट हितेषी नीतियों पर चल रही हैं। यही कारण है कि एक तरफ प्राकृतिक संपदा जंगल, जमीन व खनिज की लूट लगातार बढ़ रही हैं वही दूसरी और बेरोजगारी, पलायन और किसान आत्महत्याओं के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। चाहे मजदूर, किसान, आदिवासी हो या राज्य सरकार के ही कर्मचारी सरकारी नीतियों और वादाखिलाफी के विरुद्ध अपना आक्रोश प्रकट करते हुए आंदोलनरत हैं जिससे घबराकर रमन सरकार पूर्णतः दमन पर उतारू हो चुकी हैं।

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संयोजक ,
आलोक शुक्ला नंदकुमार कश्यप रामकांत बंजारे