|| असद ज़ैदी || की कवितायेँ : दस्तक़ के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

|| कठिन प्रेम ||

सूत्रधार :

इसकी भी कई मंज़िलें होती होंगी
और अनेक अवकाश
चलिये चलकर पूछते हैं उस भली महिला से
जिसने किया था
एक अदद कठिन प्रेम
देखिए उस मानुस के जाने के इतने बरस बाद
वह कठिनाई
क्या अब भी जारी है
और कैसे हैं अब
उसके उतार चढ़ाव

००

: स्त्री :

एक बात तो यही है कि मैं अब
पहले से ज़्यादा मुक्त हूँ . उस
झाँय झाँय को पीछे छोड़कर
पर खुशी के क्षण भी मुझे याद हैं

००

एक छोटी सी जन्नत थी हमारी बरसाती
जिसको कुछ समझ में न आता कहाँ जाए
तो हमारे यहाँ आ धमकता था

००

झगड़े भी बाद में होने लगे हमारे
ऐसा भी कुछ नहीं था . ये जवानी की बातें हैं
वह मुझे धोखा देने चक्कर में रहता था
मैं उसे ज़हर देने की सोचती थी
फिर वह अचानक मर गया
धोखा दिए बिना ज़हर खाए बिना
मुझे लगा मेरा तो सब कुछ चला गया

००

फिर मैं जैसे तैसे करके ख़ुद को हरकत में लाई
अधूरी पड़ी पी एच डी खींचकर पूरी की और
यूनिवर्सिटी के हलक़ में हाथ डालकर
निकाली एक नौकरी उसी विभाग में जहाँ मैं
अस्थायी पद पर पढ़ा चुकी थी उसके चक्कर में आकर
सब कुछ छोड़ देने से पहले

००

उसके बारे में क्या बताऊँ बेसुरी उसकी आवाज़ थी
बेमेल कपड़े काली काली आँखें
रहस्यमय बातें ख़ालिस सोने का दिल
और ग़ुस्सा ऐसा कि ख़ुद ही को जलाकर रख दे
हम बड़ी ग़रीबी और खु़ददारी का जीवन जीते थे

००

दूसरों को हमारी जोड़ी
बेमेल दिखाई देती थी . थी भी
पर बात यह है कि वह मुझे समझता था
और मैं भी उसे ख़ूब जानती थी
सोचती हूँ ऐसी गहरी पहचान
बेमेल लोगों में ही होती है

००

समाजशास्त्र की मैं रही अध्यापक
यही कहूँगी हमारा प्रेम एक मध्यवर्गीय प्रेम ही था
प्रेम शब्द पर हम हँसते थे
अमर प्रेम यह तो राजेश खन्ना की फ़िल्म होती थी
जैसे आज होते हैं 24×7 टीवी चैनल

००

उसको गए इतने बरस हो गए हैं
पर वह जवान ही याद रहता है
जबकि मैं बूढ़ी हो चली
और कभी कभी तो एक बदमिज़ाज छोटे भाई की तरह
वह ध्यान में आता है

००

कितना कुछ गुज़र गया
इस बीच छठा वेतन आयोग आ गया
साथ के सब लोग इतना बदल गए
न तो वह अब हमारी दुनिया रही न वैसे अब विचार
समझ में नहीं आता यह वास्तविक समाजवाद है या
वास्तविक पूँजीवाद

००

एक नई बर्बरता फैल गई है समाज में
” रोटी नहीं मिलती तो खीर खाओ ” कहते लोगों को
कहूँ तो क्या कहूँ

००

अगर वह जीवित होता तो सोफ़े पर पड़े
आलू का जीवन तो न जीता
हो सकता है कहता हत्यारे हैं ये चिदंबरम
ये मनमोहन ये मोदी इन्हें रोका जाना चाहिए
हो सकता है मैं उसे ही छत्तीसगढ़ के वनों में
जाने से रोकती होती कहती होती और भी रास्ते हैं ।

००

लीजिए पीकर देखिए यह ग्रीन टी . हरी चाय
जिसे पिलाकर पैंतीस बरस हुए उसने मेरा दिल
जीतने की पहली कोशिश की थी
तब मैं हरी चाय के बारे में जानती न थी ।


*|| 1857 : सामान की तलाश ||

1857 की लड़ाइयाँ जो बहुत दूर की लड़ाइयां थीं
आज बहुत पास की लड़ाइयाँ हैं

ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब
हर गलती अपनी ही की हुई लगती है
सुनायी दे जाते हैं ग़दर के नगाडे और
एक ठेठ हिन्दुस्तानी शोरगुल
भयभीत दलालों और मुखबिरों की फुसफुसाहटें
पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन चहलकदमी

हो सकता है यह कालांतर में लिखे उपन्यासों और
व्यावसायिक सिनेमा का असर हो

पर यह उन 150 करोड़ रुपयों के शोर नहीं
जो भारत सरकार ने `आजादी की पहली लड़ाई’ के
150 साल बीत जाने का जश्न मनाने के लिए मंज़ूर किये हैं
उस प्रधानमंत्री के कलम से जो आजादी की हर लड़ाई पर
शर्मिंदा है और माफी माँगता है पूरी दुनिया में
जो एक बेहतर गुलामी के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए कुछ भी
कुर्बान करने को तैयार है

यह उस सत्तावन की याद है जिसे
पोंछ डाला था एक अखिल भारतीय भद्रलोक ने
अपनी अपनी गद्दियों पर बैठे बन्किमों और अमीचंदों और हरिश्न्द्रों
और उनके वंशजों ने
जो खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे
जिस सत्तावन के लिए सिवा वितृष्णा या मौन के कुछ नहीं था
मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, इश्वरचंद्रों, सय्यद अहमदों,
प्रतापनारायणों, मैथिलिशरणों और रामचन्द्रों के मन में
और हिन्दी के भद्र साहित्य में जिसकी पहली याद
सत्तर अस्सी साल बाद सुभद्रा को ही आयी

यह उस सिलसिले की याद है जिसे
जिला रहे हैं अब 150 साल बाद आत्महत्या करते हुए
इस ज़मीन के किसान और बुनकर
जिन्हें बलवाई भी कहना मुश्किल है
और जो चले जा रहे हैं राष्ट्रीय विकास और
राष्ट्रीय भुखमरी के सूचकांकों की खुराक बनते हुए
विशेष आर्थिक क्षेत्रों से निकलकर
सामूहिक कब्रों और मरघटों की तरफ
एक उदास, मटमैले और अराजक जुलूस की तरह
किसने कर दिया है उन्हें इतना अकेला?

1857 में मैला-कुचैलापन
आम इंसान की शायद नियति थी, सभी को मान्य
आज वह भयंकर अपराध है

लड़ाइयां अधूरी रह जाती हैं अक्सर, बाद में पूरी होने के लिए
किसी और युग में किन्ही और हथियारों से
कई दफे तो वे मैले-कुचैले मुर्दे ही उठकर लड़ने लगते हैं फिर से
जीवितों को ललकारते हुए जो उनसे भी ज्यादा मृत हैं
पूछते हैं उनकी टुकड़ी और रिसाले और सरदार का नाम
या हमदर्द समझकर बताने लगते हैं अब मैं नज़फगढ़ की तरफ जाता हूँ
या ठिठककर पूछने लगते हैं बख्तावारपुर का रास्ता
1857 के मृतक कहते हैं भूल जाओ हमारे सामंती नेताओं को
कि किन जागीरों की वापसी के लिए वे लड़ते थे
और हम उनके लिए कैसे मरते थे

कुछ अपनी बताओ

क्या अब दुनिया में कहीं भी नहीं है अन्याय
या तुम्हें ही नहीं सूझता उसका कोई उपाय। 


*|| वही जीवन फिर से ||*

कितने लोग हैं इस दुनिया में जिन्होंने गाहे बगाहे
रोककर कभी मुझसे कहा ऐ भैया …
किसी ने बस रास्ता पूछा एक अौरत ने अाधी रोटी माँगी
या कहा कि बीमार है छोरी, किसी डागदर से मिलवा दे
किसी ने इसलिए पुकारा कि मुड़के देखूँ तो मेरी शक्ल देख सके
अाँखें मिचमिचाए अौर कहे भैया तू कहाँ कौ है
इनमें से कुछ तो कभी के गुज़र गए कुछ अभी हैं
कैसे जानूँ कौन भूत है कौन अभूत
दानिश को इससे क्या… कि सब रस्ते में हैं
दो पीढ़ी बाद अक्सर कोई बता नहीं पाता मामला क्या था
जिस रजिस्टर में टूट फूट दर्ज हुई वह बोसीदा हो चला
काग़ज़ भी तो जैविक चीज़ है
स्याही-क़लम-दवात से बहुत कुछ लिखा गया
01010101 में तब्दील नहीं हुअा और जान लीजिए
काग़ज़ पत्तर भले कुछ बचे रहें 01010101 को छूमंतर होते
ज़रा देर नहीं लगेगी
मरणशीलों में सबसे मरणशील है यह बाइनरी कोड
दुनिया के अंत के बारे में कोई नहीं जानता
सब उसके अारंभ के पीछे पड़े रहते है धर्म हो चाहे वाणिज्य अौर विज्ञान
मिल-जुल के हम सब सब कुछ तबाह किये दे रहे हैं इस विनाश की सामाजिकता
इसका मर्म इसके भेद अभेद ज़रूर किसी दैवी मनोरंजन का मसाला हैं
तुम देख लो सभी तो यहाँ बैठे हैं सारे यज़ीद,
फ़िरअौन, क़ारून, इबलीस, नमरूद, दज्जाल… तुम पूछती थी या अल्लाह क्या अब
हमारा क़ब्रिस्तान भी हमसे छीन लिया जाएगा
वक़्त अाने पर मैं कहाँ जाऊँगी …
ऐसी ही मरी रहना अब, मेरी अापा
सुकून की नींद भी ऐसी ही होती है
बना रहेगा तुम्हारा कथानक वैसा जैसा कि तुम छोड़कर गयीं
अौर न अाना जीने के लिये वही जीवन फिर से.

✍? *असद ज़ैदी*

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

( Asad Zaidi, born in Karauli (Rajasthan), has lived in Delhi for the last 35 years. He has three books of poems: Behnen aur anya kavitaen (1980 & 2008), Kavita ka jivan(1988), and Saman ki talash (2008) and has edited a number of collections including Das Baras: Hindi kavita Ayodhya ke bad (2003). His interests extend to education, literary criticism, occasional social commentary and publishing.)

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