शिक्षाकर्मियों का आंदोलन ब्राह्मणवर्णियों के चंगुल में कैद : लेकिन किसी में इच्छाशक्ति नहीं है कि वह संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा करते हुए शिक्षाकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए पहले एक कमेटी का गठन कर मंत्रीमंडलीय कैबिनेट में शिक्षाकर्मियों को सेवक नहीं बल्कि लोकसेवकों के रूप में बदलाव कर इस मामले को विधानसभा के आसंदी में विधेयक पारित करवा कर संविधान के अनुच्छेद 309 के अंतर्गत लाए. :: उत्तम कुमार ( दक्षिण कौशल )

( फेसबुक वाल से आभार सहित )

शिक्षाकर्मियों के आंदोलन का समाधान संवैधानिक अमल और ब्राह्मणवर्णीय व्यवस्था के बीजनाश में निहित है। पहले शिक्षा ब्राह्मणों की बपौती थी अब जब शूद्रों ने लोगों को शिक्षा देना शुरू किया तबसे शिक्षा व्यवस्था को तहस नहस करने के लिए पहले सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है और अब शिक्षकों को तोड़ उन्हें ठेकाकर्मियों में बदल दिया गया है इन आंदोलनकारियों को पहले वे अपनी ऊंगलियों में नचाते हुए आंदोलन के मैदान में उतारते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं। मांगों में भी प्रधान मांग संविलियन को हासिए में रख देते हैं और बाकी मांगों को मनवाने का दिलासा देते हुए आंदोलनरत बहादुर शिक्षाकर्मियों के जिंदगियों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। शिक्षाकर्मियों का पद संवैधानिक नहीं है।

छत्तीसगढ़ में पिछले दो सरकारों के रवैया से यह नहीं लगता है कि ना शिक्षाकर्मियों का संविलियन हो सकता है और ना ही उन्हें सातवां वेतनमान ही मिल सकता है। हां लगातार आंदोलन के बाद नेतृत्वकारी वर्ग नौनिहालों के शिक्षा और शिक्षाकर्मियों के संघर्षों के बदौलत समझौता जरूर कर लेते हैं। पिछले 20 नवम्बर से छत्तीसगढ़ के बहादुर शिक्षाकर्मियों की तादाद एक लाख 80 हजार हैं संविलियन जैसे नौ-सूत्रीय मागों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं और इससे पूरे प्रदेश में शिक्षकीय कार्य ठप पड़ गया है। और सरकार को यह चिंता है कि आसन्न चुनाव की तैयारी में रूकावट खड़ा न हो जाए। पूर्व में सरकारों की तरह इस बार भी 25-26 नवम्बर तक कई शिक्षकों को बर्खास्त कर दिया गया है। 27 नवम्बर को मुख्यमंत्री के बयान के बाद कि संविलियन किसी सूरत में नहीं हो सकती है इस पर हड़ताली शिक्षाकर्मियों में आक्रोश व्याप्त है।

शिक्षकों के पद को संविधान में संशोधन कर ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है। 2003 में अजीत जोगी सरकार ने शिक्षाकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने की कोशिश की थी। उस समय शिक्षा कर्मियों ने 2011 तथा 2012 में शिक्षाकर्मियों को बर्खास्त करने की धमकी दी थी दोनों ही सरकार को मालूम है कि इनकी मांगों के साथ वोट की राजनीति की जा रही है लेकिन किसी में इच्छाशक्ति नहीं है कि वह संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा करते हुए शिक्षाकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए पहले एक कमेटी का गठन कर मंत्रीमंडलीय कैबिनेट में शिक्षाकर्मियों को सेवक नहीं बल्कि लोकसेवकों के रूप में बदलाव कर इस मामले को विधानसभा के आसंदी में विधेयक पारित करवा कर संविधान के अनुच्छेद 309 के अंतर्गत लाए।

लोक सेवकों की भर्ती तथा उनकी सेवा की शर्तों का विनियमन करने के लिए बनाया गया कोई अधिनियम यदि किसी भी मूल अधिकार का अतिक्रमण करता है अर्थात विशेष रूप से अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 310, 311, 320 के विरुद्ध है, तो वह स्वत: असंवैधानिक हो जाता है।

|| समस्या कहां? ||

एक चुभने वाली बात अवश्य कहूंगा कि पंडालों में देवी देवताओं की जय-जयकार करने, यज्ञ करने से कुछ भी हासिल नहीं हो सकेगा। समस्या और समाधन पर हमें जाना होगा। संविधान के 73वां संशोधन अधिनियम 1992 के धारा 4 द्वारा (24/4/93 से 11वीं अनुसूची तथा संविधान के 74वां संशोधन 1992 के धारा 4 द्वारा (1/6/1993) के माध्यम से 11वें व 12वें अनुसूची संविधान में अस्तित्व में आया जहां 11वें अनुसूची अनुच्छेद 243 (छ) एवं 12वें अनुसूची अनुच्छेद 243(ब) में नगरपालिका आदि की शक्तियां प्राधिकार और उत्तरादायित्व नए सिरे से सुनिश्चित की गई है। इस तरह 11वीं अनुसूची में किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों की ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान कर सकेगा जो उन्हें स्वायातत्ता शासन के संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हो और इन्हीं के अधीन लगभग 11वीं अनुसूची में 1 से लेकर 29 बिंदुओं में राज्य सरकार पंचायत को सौंपती हैं जिसमें बिंदु क्रमांक 17 में शिक्षा जिसके अंतर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं उनकी जिम्मेदारी के तहत एवं 12वीं अनुसूची के बिंदु क्रमांक 13 में सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सौंदर्यपरक आयामों की अभिवृद्धि के अंतर्गत नगरीय निकाय शिक्षाकर्मियों की पदास्थापना सुनिश्चित की गई और इस तरह शिक्षाकर्मियों की हैसियत सेवक यानी ठेकाकर्मियों की बन गई है और इस तरह मुख्य सुधार इन पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित कर करना है।

|| नियुक्ति ||

शिक्षाकर्मियों को अपनी नियुक्तियों के संबंध मेंं गहराई से समझने की जरूरत है उन्हें पद नहीं ठेकाकर्मी बनाकर रखा गया है हायर और फायर की नीति के तहत कभी भी वे बाहर के रास्ते दिखा दिए जाएंगे। छत्तीसगढ़ पंचायत शिक्षाकर्मी (भर्ती तथा सेवा की शर्ते) नियम 1997 के नियम 2 (ज) में शिक्षाकर्मी से अभिप्रेत है यथास्थिति जिला पंचायत या जनपद पंचायत द्वारा उनके नियंत्रणाधीन स्कूलों में पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है। शिक्षाकर्मी पद पदधारण नहीं करता। छत्तीसगढ़ की शिक्षा गारंटी योजना संविधान के नीति निर्देशक सिद्धातों के अनुशरण में निर्मित है कि इस योजना के अंतर्गत शिक्षाकर्मी की नियुक्ति मानदेय तौर पर की जाती है। मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ नगर पालिका शिक्षाकर्मी (भर्ती तथा सेवा शर्ते) नियम 1998 के नियम 2 (ज) में शिक्षाकर्मी से अभिप्रेत यथास्थिति नगर पालिक निगम, नगर पालिका परिषद या नगर पंचायत द्वारा उनके नियंत्रणाधीन स्कूल में पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए व्यक्ति से है।

|| सेवासमाप्ति तथा वेतन ||

वेतन और नियुक्ति मनमर्जी है। छत्तीसगढ़ पंचायत शिक्षाकर्मी (भर्ती तथा सेवा शर्ते) नियम 1997 के नियम 7 परिवीक्षा के तहत शिक्षाकर्मियों के पद पर सीधी भरती से चयनित प्रत्येक व्यक्ति प्रारंभ में स्कूल विशेष के लिए 3 वर्ष की परिवीक्षा अवधी में नियुक्त किया जाएगा तीन वर्ष पश्चात नियुक्त प्राधिकारी द्वारा उनके कार्यों का आंकलन किया जाएगा आंकलन पश्चात उनके कार्य संतोषप्रद नहीं पाए जाने पर उन्हें 1 से 2 वर्ष के लिए परिवीक्षा अवधि पर बनाकर रखा जाएगा जिसे 5 वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा कि शिक्षाकर्मी पूरी परिवीक्षा की कालावधि में उनकी कार्य संतोषप्रद नहीं पाए जाने पर पुन: परिवीक्षा अवधि न बढ़ाते हुए संबंधित शिक्षाकर्मियों की सेवा समाप्त कर दी जावेगी। शिक्षाकर्मी को परिविक्षा के कालावधि के वेतनमान के नियमित वेतनमान के बराबर नियत वेतन तथा उस पर स्वीकार्य महंगाई भत्ता प्रदत्त किया जाएगा। परंतु परिवीक्षा अवधि में कार्यों का आंकलन करने के बाद सही पाया जाता है तो पंचायत के नियमित वेतनमान में नियुक्त किया जा सकेगा।

|| सेवक (ठेकाकर्मी) ना कि कर्मचारी ||

गुलामों की तरह जिंदगी है और विरोध और आंदोलन की मनाही है। छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (आचरण) नियम 1998 के नियम 2 (छ) ‘पंचायत सेवक’ से अभिप्रेत है पंचायत की किसी क्रियाकलाप के संबंध में सिविल सेवा या तकनीकी सेवा या अन्य पद पर नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति अर्थात उक्त नियमों अधिनियमों के तहत शिक्षाकर्मी पंचायत सेवक है ना कि लोकसेवक। इसमें साफ तौर यह भी लिखा है कि ऐसा पंचयत सेवक जिनकी सेवाएं किसी निगम, संगठन या स्थानीय प्राधिकरण को सौंपी गई हों, इन नियमों के प्रयोजनों के लिए पंचायत के अधीन सेवा करने वाला सेवक समझा जावे। भले ही उसका वेतन किसी अन्य स्त्रोत से निकाला जाता हो।

छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (आचरण नियम 1998) के नियम 5 में प्रदर्शन तथा हड़तालों के संबंध में दर्ज है कि -कोई पंचायत सेवक नियम 5 के बिंदु (2)में अपनी सेवा या किसी अन्य पंचायत सेवक की सेवा से संबंधित किसी मामले के संबंध में ना तो किसी तरह का हड़ताल का सहारा लेगा और ना ही किसी प्रकार से अभिप्रेरित करेगा।

|| समाधान ||

समाधान विधानसभा के रास्ते संवैधानिक मार्गों से ही है हां रोड या पंडाल में विरोध प्रदर्शन समस्या को समाधान के रास्ते पर ला खड़ा करेगा। मप्र एवं छत्तीसगढ़ शिक्षा संहिता के अध्याय एक जिसमें प्रस्तावना तथा परिभाषा सुनिश्चित की गई है। जहां परिभाषा के टिप्पणी नौ में शिक्षक शब्द को परिभाषित करते हुए टिप्पणी 1 में शिक्षक शब्द की व्यापकता का अर्थ प्राथमिक पाठशाला से लेकर महाविद्यालय के शिक्षक तक भी शामिल किया गया है। टिप्पणी क्रमांक 2 चयन प्रक्रिया को समझ लेना चाहिए। शासकीय पद के लिए प्रक्रिया राज्य सरकार के लिए प्लास्टिक का खिलौना है। जिसको स्वयं के इच्छा के अनुरूप आकृति प्रदान की जा सकती है। जैसा कि पूर्व में (शिक्षक का चयन कनिष्ठ चयन आयोग (जूनियर सर्विस सेलेक्शन बोर्ड) के द्वारा किया जाता था। तत्पश्चात शिक्षा विभाग द्वारा किया जाने लगा। जिसके चयन में संयुक्त संचालक शिक्षा एवं उप संचालक शिक्षा नियुक्त प्रदान करने वाले स्वतंत्र एवं सक्षम प्राधिकारी थे। तदर्थ शिक्षक (एडहॉक शिक्षकों) की नियुक्ति के लिए शिक्षाविभाग का अध्यक्ष सक्षम है। यह शिक्षक की नियुक्ति संबंधित मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील ) नियम 1966 के तहत संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत प्रदत्त संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्ते लागू की जानी चाहिए और यह सब राज्य सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।

जैसा कि शिक्षा संहिता के अध्याय 1 में नौवें टिप्पणी के बिंदु दो में चयन की प्रक्रिया की परिभाषा को स्पष्ट करने की कोशिश हुई है। चूंकि वर्तमान सरकारों के पास किसी तरह की नीतियां नहीं है अर्थात भारतीय संविधान पर विश्वास और उनके प्रति समर्पण की भावना नहीं है। यथा निर्वाचन के बाद शपथ ग्रहण समारोह में जरूर संविधान की शपथ लेते हैं परंतु यथार्थ में पालन करते नजर नहीं आते हैं। अत: संवेदनशील एवं संविधान पर विश्वास करने वाली और पूरे देश को संचालित करने के लिए किसान मजदूर व्यापारी कर्मचारी आदि के लिए एक सुनिश्चित नीति होनी चाहिए तभी यह संभव हो सकता है।
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