जस्टिस ग्वाल
* सबसे बडा अपराध है  इस समय निरपराध और ईमानदार होना वो भी एक ज़ज का .
#  ज़ज यदि ह्यूमन राइट डिफेंड करेंगे तो कैसे काम करेगा शासन.
* पुलिस के आड़े आने का खामियाजा उठाना ही था .
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घोर नक्सली क्षेत्र सुकमा की एक अदालत ,
और ज़ज सीजेएम की कुर्सी पे  पदस्थ एक नौजवान0 दलित
सायकल से कोर्ट जाते ,बेंक बैलेंस न के बराबर
ईमानदारी से भरपूर आत्मविश्वास  परिपूर्ण …
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बस्तर की आम अदालत  में और रोज की तरह
पुलिस पेश करती
सीधे साधे निर्दोष  आदिवासी नौजवान और महिलाओं  को ,
नक्सल होने ,सहयोगी या समर्थन करने के गंम्भीर आरोप में.
कल तक  इन सबको बिना कुछ खास सुनवाई  के
जेल के अन्दर .
तीन चार साल,
हां सात आठ साल भी सडते जेल में.
इनमे़ से नब्बे फीसदी लोग निर्दोष  रिहा हो ही जाते है.
क्यों कि उन्होंने कुछ अपराध किया ही नहीं  होता है.
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ज़ज ने सवाल उठाने शुरू किए पुलिस पे
अभियुक्त का नाम : नामालुम
पिता का नाम  : नामालुम
निवासी :नामालुम
अपराध  : नक्सली हमला हत्या वगैरा
क्यों उठा लाते हो इन सीधे साधे आदिवासी लोगो को ?
इनसे क्या दुशमनी है पुलिस की ?
ये क्यों  मारेंगे किसी को ?
एक दो नहीं ,पूरे हज़ार ग्रामीण को लेके पहुंच गई कोर्ट
कहा की सब माओवादी है.
ज़ज ने कहा ! क्या तमाशा है ?
सब को मिल गई ज़मानत .
चालान नही फोटो नहीँ  गवाही  और सबूत नहीं…..
हथियार के नाम पे कुल्हाड़ी ,भरमा बन्दूक और डंडे
ज़ज ने कह भी ,
ये तो भूमकाल के समय से  रहते है इनके पास
यह हथियार नहीं  इनकी संसकृति  है.
 पुलिस को चेतावनी : तुम और तुम्हारे अधिकारियों को जेल भी जाना पड सकता है ,समझे !
और ऊपर से निर्दोषो को  मिलने लगी थी ज़मानत .
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पुलिस और प्रशासन  में हडकम्प
कलेक्टर ने फोन भी किया ,
ज़ज साहब ,निर्णय करने से पहले थोड़ा हमसे पूछ भी लिया कीजिए .
ज़ज साहब अचंभित !
उन्होंने कलेक्टर के फोन को वायरल कर दिया.
अख़बारो में छपा
बडी थू थू हुई .
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आनन फानन में पुलिस प्रशासन और शासन के लोगो ने बैठक की .
निर्णय हुआ ट्रांसफर से काम नहीं चलेगा ,क्यों कि पहले भी जहाँ  जहाँ भी रहे ,इन्होंने पुलिस और करप्ट लोगों  की नाक में दम कर रखा था॥
अब बताओ  यदि ज़ज लोग ,
ह्यूमन राईट डिफेंडर की तरह काम  करने लगे तो
कैसे शासन चलेगा जी .
किसी पुलिस अधिकारी ने फरमाया  .
खैर तय किया गया ,कि
इन्हें तुरंत बरखास्त किया जायें.
पर कैसे ?
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एस पी ने रिपोर्ट तैयार की
कि  ज़ज साहब पुलिस को प्रताड़ित करते है ,
पुलिस का मोराल डाउन कर रहे  हे ,ज्यादा पूछ ताछ करते है ,तुरंत ज़मानत दे देते है
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रिपोर्ट जिला होते हुये उच्च न्यायालय तक पहुचीं
पहले से तैयार अधिकारियों ने बिना किसी बडी जांच के बिना ज़ज साहब से स्पष्टीकरण  के उन्हें बरखास्तगी  आदेश थमा दिया गया .
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और इस तरह बस्तर में  मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ,वकीलों ,पत्रकारों  की प्रताड़ना  मे एक ज़ज भी शामिल हो गये .
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इति श्री कथा एक ईमानदार ज़ज की

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