मुक्तिबोध जन्म शताब्दी ”  || इंसानी रिश्ता बनाने की तड़प || अपूर्वानंद ( जानकीपुल से साभार_) दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र

” मुक्तिबोध जन्म शताब्दी ” 

|| इंसानी रिश्ता बनाने की तड़प ||

*० अपूर्वानंद*

 

_( जानकीपुल से साभार_)

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र*

” मुक्तिबोध अचानक क्यों लोकप्रिय हो उठे?’ ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ की भूमिका लिखते हुए 1964 में शमशेर बहादुर सिंह ने यह प्रश्न किया था. तब मुक्तिबोध अचेत थे. शमशेर ने लिखा कि 1964 के मध्य में मुक्तिबोध अचानक एक बड़ी घटना बन गए. अशोक वाजपेयी ने,जो उन तरुण लेखकों में थे जिन्हें मुक्तिबोध के मूल्य का पता था, उनकी मृत्यु के पचास साल बाद लिखा है कि वे एक दूसरे से साहित्यिक और राजनीतिक मामलों में विरोधी विचार रखने वालों के बीच समादृत हैं.अपनी भूमिका में ही शमशेर ने ‘अँधेरे में’ को राष्ट्रीय कविता का दर्जा दिया है और कहा है कि यह हिंदी की स्वस्थतम आधुनिक काव्य सृष्टि का सर्वोपरि विजय-चिह्न है.

राष्ट्रीय अभी भी एक ऐसा भाव है जो परस्पर विरोधी राजनीतिक और वैचारिक दृष्टियों पर एक साथ लागू होता है.वाम वाम होगा और दक्षिण दक्षिण लेकिन दोनों ही राष्ट्रीय होंगे.उस अर्थ में मुक्तिबोध की रचनाओं को राष्ट्रीय कहना कितना उचित है,यह विचारणीय है. इसलिए भी कि राष्ट्र की परियोजना की आलोचना करते हुए मुक्तिबोध नहीं दीखते हालाँकि उनकी रचनाओं में, कविता, कहानी, निबंध और आलोचना समेत,राष्ट्र विचार की इकाई नहीं है, मनुष्य है:जंगल में जलावन बीनती माँ,साधारण दफ्तरों में काम करने वाले बाबू,स्कूल में पढ़ानेवाले लोग,निम्न मध्यवर्ग के लोग, जो किसी तरह ज़िंदगी का छकड़ा खींचते जाते हैं,उस ज़िंदगी की ऊब और जकड़न से आज़ादी पाने के लिए शनिवारी तालाब में कूदकर डूब मरने वाले नवयुवक-युवतियाँ और परिवार से ईमानदारी बरतते हुए दिन रात खुद को खपा देने वाले श्रमिक,जो अपनी अंदरूनी रूहानी ज़िंदगी की तलाश में भटकते रहने को अभिशप्त हैं. मुक्तिबोध के लिए वर्गीकृत मनुष्य की जगह महत्वपूर्ण है वह “घर की पड़ोसन,जो बड़ी लड़ाकू है, न मालूम कब और क्यों पिघल जाती है…आपके संकट के काल में सारा भार अपने ऊपर ले लेती है! उसके ह्रदय का न मालूम कौन सा छोर भीग गया है.”

शमशेर स्वस्थ प्रवृत्ति को किस प्रकार परिभाषित कर रहे थे, यह स्पष्ट नहीं लेकिन चिकित्साशास्त्र के  इस शब्द का प्रयोग जब कला और साहित्य में किया जाता है तो उसके परिणाम भयंकर होते हैं. स्वस्थ-अस्वस्थ के बीच का अंतर करने में एकाधिकारवादी और ‘टोटैलिटेरियन’ सत्ताओं को दिलचस्पी रही है और उसके नतीजे रचनाओं से अधिक रचनाकारों को झेलने पड़े हैं. खुद शमशेर के मित्र रामविलास शर्मा उन्हें पूर्णतः स्वस्थ नहीं मानते थे. अगर उनपर आक्रमण उन्होंने नहीं किया तो उनकी नाजुकमिजाजी पर तरस खा कर. लेकिन यह रियायत उन्होने मुक्तिबोध को नहीं दी.उनकी बात मान ली जाती तो मुक्तिबोध को शिजोफ्रेनिया का इलाज कराने किसी मनोचिकित्सालय भेज दिया गया होता. अगर उनका हश्र आंद्रेई सखारोव वाला नहीं हुआ तो सिर्फ इसलिए कि भारत लेनिनवादी-स्तालिनवादी राज्य नहीं था और यहाँ ज्दानोव जैसा सांस्कृतिक कमिसार बहाल नहीं हुआ था.

स्वस्थ और अस्वस्थ शरीर और मन को लेकर जो दुविधाएं सत्ता और साहित्य में देखी जाती हैं उनका  रिश्ता कुछ इस समझ से है कि एक पूर्ण और आदर्श शरीर होता है और हर किसी का लक्ष्य उसे प्राप्त करना होना चाहिए.अपूर्णता इसलिए हमेशा न्यूनता या कमी की द्योतक है. अपूर्णता घृणा या दया उत्पन्न करती है,सहानुभूति नहीं.अपूर्णता से ग्रस्त व्यक्ति के साथ विशेष व्यवहार किया जा सकता है, समानता की प्रतिष्ठा उसे देना कठिन है.

विडंबना यह है कि जिस मार्क्सवाद की खराद पर मुक्तिबोध को चढ़ाया जा रहा था, उसे वे भी रघुवीर सहाय और शमशेर की तरह प्राणवायु मानते थे.वह मार्क्सवाद उन्होंने एक कड़े बौद्धिक संघर्ष और श्रम के बाद अर्जित किया था और फिर वह उनका अस्तित्व तर्क बन गया था. अपने गुरु मित्र या मित्र गुरु नेमिचंद्र जैन को उन्होंने लिखा कि उन्हें मार्क्सवादी बना कर उन्होंने उनके साथ बहुत कड़ा खेल खेला है.

मुक्तिबोध के लिए मार्क्सवादी होना मज़ाक न था.वे उन मार्क्सवादियों को हैरत से देखते थे जिन्हें उसके लिए अपने आप से लड़ना न पड़ा और अपने वजूद का कुछ कुर्बान न करना पड़ा, “यूरोप में एक-एक विचार की प्रस्थापना के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं. लेकिन हिन्दुस्तान को पका पकाया मिल रहा है….चूँकि उसके पीछे स्वतः उद्योग नहीं है,…शरीर में उनका खून नहीं बन पाता.आँखों में उनकी लौ नहीं जल पाती.मस्तिष्क में उनका प्रकाश नहीं फैल जाता.”

मुक्तिबोध की कविताओं के उद्विग्न स्वर ने प्रगतिशील आलोचकों को उलझन में डाल दिया: मार्क्सवाद को अंगीकार करने में इतनी पीड़ा क्यों? मार्क्सवाद को स्वीकार कर लेने के बाद भी इतना द्वंद्व क्यों! ऐसे आलोचकों को वे ‘बोधहीन बौद्धिकता’ का शिकार बताते हैं और कहते हैं कि नई पीढ़ी का इन समीक्षकों के लिए तभी तक महत्त्व है जब तक वे उनके प्रगतिवादी ढर्रे में ही प्रगतिवादी भावों को प्रकट  करें: “उस पीढ़ी की असली ज़िंदगी के संघर्ष, कष्ट और संवेदनाओं से उन्हें कोई मतलब नहीं. जब यह पीढ़ी निराशा, घुटन, उदासीनता, प्रणय, स्नेह, सौन्दर्य, आश्चर्य,साहस,उत्साह,संघर्ष और विजय की भावनाओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण करती है, तो वह उन्हें आत्मबद्ध, आत्मग्रस्त, कुंठामय, अवरुद्ध और वयक्तिनिष्ठ, अहंवादी और गतिरुद्ध प्रतीत होती है.”

मुक्तिबोध पर स्वयं ये सारे आरोप लग चुके थे. लेकिन असल परेशानी थी मुक्तिबोध का कविता के रूप के साथ बर्ताव.प्रगतिशील कवि हों या प्रयोगवादी या नई कविता के कवि, उन्होंने लोकप्रिय हो गए प्रगीत या छोटी कविता के सुरक्षित घेरे से बाहर पाँव नहीं बढ़ाए. मुक्तिबोध ने शुरुआत तो रोमांटिक मनोभूमि और काव्यभूमि से की लेकिन प्रगीत का घेरा अपने लिए उन्हें तंग मालूम पड़ा.

प्रगीतात्मकता में एक सुरक्षा थी. प्रचलित काव्यरुचि के वह अनुकूल थी. विषयवस्तु बदल जाने से बहुत अंतर नहीं पड़ता था क्योंकि कविता पढ़ने के अभ्यास को उससे चुनौती न थी. कविता के  एक सांद्र,पूर्ण अनुभव का आश्वासन था. सारे प्रयोगों के बाद भी उसका शासन बना हुआ था. मुक्तिबोध जिस प्रक्रिया की कविता लिखना चाह रहे थे, वह एक नई वैचारिक संवेदना के आविष्कार की प्रक्रिया  थी.

अज्ञेय ने कहा कि मुक्तिबोध प्रक्रिया के कवि हैं, परिणति के नहीं. लेकिन मुक्तिबोध की कविताओं में शिल्प की कमी उन्हें खली.अज्ञेय के वाक्-संयमी स्वभाव को मुक्तिबोध का शब्द-बाहुल्य भी अटपटा लगा.मुक्तिबोध के आरंभिक प्रशंसकों में अग्रणी नामवर सिंह ने भी 1958 में नामवर सिंह ‘आत्म-संघर्ष के कवि: गजानन माधव मुक्तिबोध” शीर्षक निबंध में यह शंका जाहिर की थी: ‘मुझे ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध जितना बड़ा विषय लेते हैं उसके लिए उनके पास गहरी चिंतनशक्ति तो है परंतु उतनी ही समर्थ कलात्मक शक्ति  नहीं है.”

कविता में कलात्मकता या कलात्मक कविता की इस समझ का स्रोत जाहिर है, प्रगीतात्मकता में है. मुक्तिबोध को कविता के शिल्प बनने न बनने की फिक्र नहीं थी.असल चीज़ थी कविता में शक्ति का प्रवाह.इस वजह से कविता को तराशने या गढ़ने के पक्ष में वे नहीं थे.

शक्ति का स्रोत बाहर है या अपने भीतर? मुक्तिबोध की कविताएँ प्रायः भीतर की यात्राएं हैं. यात्रा कहने से लकिन उस छटपटाहट या बेचैनी का अंदाज नहीं मिलता जो ‘अंतःकरण का आयतन’ नामक कविता में यों व्यक्त होती है, “यह छाँह मेरी सर्वगामी है! हवाओं में अकेली सावली बेचैन उड़ती है/” और “…..मेरी छांह सागर-तरंगों पर भागती जाती,दिशाओं पार, हलके पाँव..”

वह छाँह ‘उन्मद बिजलियों में अनेक बिजलियों से खेल जाती है’ , ‘अपने प्रियतरों के स्वप्न, उनके विचारों की वेदना जीकर/व्यथित अंगार बनती है/….उतरती है खदानों के अंधरे में/वह और अगले स्वप्न का विस्तार बनती  है.” और यह “मैं देखता क्या हूँ कि–/पृथ्वी के प्रसारों पर/ जहाँ भी स्नेह या संगर,/वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है/ वहाँ है ज़ोर गहरा एक मेरा भी;/सतत मेरी उपस्थिति, नित्य सन्निधि है.”

मुक्तिबोध ने एक तरह से आत्म का उत्खनन किया और वे मणि-रत्न निकाले जो बहुत अंदर दबा दिए गए थे, तलघर में फ़ेंक दिए गए थे क्योंकि वे ज़िंदगी में शामिल होने की माँग करते हैं.मुक्तिबोध कहते भी हैं, आई वांट टू  बि  इन द थिक ऑफ़ थिंग्स.” अशोक वाजपेयी ने लिखा, “मुक्तिबोध में रचयिता और टीकाकार में कोई अलगाव नहीं है.” इस तरह तटस्थ वर्णनकर्ता या व्याख्याता की शांत भूमिका की जगह ‘इन्वॉल्वमेंट’ के आवेश से मुक्तिबोध को कोई लाज नहीं आती.

अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध की कविता को भयानक खबर की कविता कहा. यह खबर जितनी बाहर की नहीं थी उतनी भीतर हो रहे ध्वंस की थी.अपनी भूमिका की तलाश का मतलब था खुद को संकट में डालना.वह ‘अपनी आत्मा के लुहारखाने में समाज के अधबने अंतःकरण को गढ़ना भर नहीं था, खुद को तोड़ना और फिर बनाना भी था. संभवतः अस्तित्ववाद के अपने पुराने संस्कार के कारण मुक्तिबोध का निजी दायित्व बोध बहुत तीव्र था और जो कुछ भी बाहर हो रहा था, उसके लिए वे बाह्य भौतिक कारणों को जिम्मेदार मानकर छुट्टी नहीं पा सकते थे.

निजी जिम्मेदारी और प्रत्येक परिस्थिति में अपने भूमिका की पहचान का दायित्व बोध जिसमें असफलता या हार के निश्चित होने के बावजूद संघर्ष को आह्लाद्पूर्वक अंगीकार किया जाता है. गुजरात से लेकर देश में हो रहे अधिकतर संघर्षों में वामपंथी दलों की निष्क्रियता से यह प्रकट होता है कि मार्क्सवाद अपने आप इस  दायित्वबोध का स्रोत नहीं हो पाता. उसके लिए मनुष्यता से एक गहन और बिनाशर्त प्रतिबद्धता चाहिए, कुछ वैसी जो अज्ञेय को बिहार के बाढ़ ग्रस्त इलाकों तक ले गई, जिनकी मानवीय तत्परता देखकर फणीश्वर नाथ रेणु आपने आलस्य पर शर्मिंदा हो उठे. यह मानवीय तत्परता या अशोक वाजपेयी के शब्दों में ही मार्मिक तात्कालिकता संसार को एक सही दिशा में ले जाने या दुरुस्त कर देने की इच्छा से पैदा नहीं हो सकती.

मुक्तिबोध की कविता का सबसे सबल पक्ष है यह राजनीतिक दायित्व बोध. इसके लिए ज्ञानार्जन अनिवार्य है और नई ज्ञानात्मक संवेदना की संरचना का काम भी फौरी ज़रूरत है.इसे टाला नहीं जा सकता. ‘एक अंतर्कथा’ में सभ्यता के जंगल में अग्नि अधिष्ठान खोजती माँ के आदेश से “मैं हर टहनी में डंठल में/एक-एक स्वप्न देखता हुआ/पहचान रहा प्रत्येक/जतन से जमा रहा” क्योंकि माँ बताती है, “आधुनिक सभ्यता के वन में/व्यक्तित्व-वृक्ष सुविधावादी./कोमल –कोमल टहनियां मर गईं अनुभव मर्मों की/वह निरुपयोग के फलस्वरूप हो गया./अंतर्जीवन के मूल्यवान जो संवेदन/ उनका विवेकसंगत प्रयोग हो सका नहीं/कल्याणमयी करुणाएं फेंकी गईं/रास्ते पर कचरे जैसी/मैं चीन्ह रही उनको.”

ज्ञान का अर्थ है इन संभावनाओं को पहचानना और उनसे रिश्ता बनाना.इसका मतलब होगा उन इलाकों में जाना जो बेकार मानकर छोड़ दिए गए हैं.फिर मार्क्सवाद के पतनशील वर्ग और उत्थानशील वर्ग की अवधारणा के दायरे से भी निकलना होगा.साथ ही आत्मग्रस्तता और आत्ममुग्धता के गड्ढे से भी बाहर आना होगा.

मुक्तिबोध की कविता सही मायने में ज़िन्दगी में भरपूर हिस्सेदारी की कविता है.इंसानी रिश्ता बनाने की तड़प की कविता.सब कुछ पुराना और बासी हो सकता है यह तड़प नहीं.

***

शरद कोकास ने लिखा कि मुझे   यह लेख मुक्तिबोध के बहाने मार्क्सवाद की पतनशीलता के विश्लेषण का लेख लगता है । यद्यपि मुक्तिबोध में अस्तित्ववाद के संस्कार थे किंतु उनका अवलोकन आंतरिक के साथ बाह्य भी था । कोई भी महान रचना बिना बाह्य अवलोकन के सम्भव नही हो सकती । बाह्य में प्रतिभागिता यह उसकी दूसरी शर्त है ।
राष्ट्र की अवधारणा मुक्तिबोध के लिये उस समय प्रचलित अवधरणा से बहुत भिन्न नही थी किन्तु उसमे प्रकृति, जंगल , साधरण मनुष्य सभी शामिल थे और प्रगीतात्मक रूप से किसीं रचना में यह सम्भव नही था । उन्हें सिर्फ कलावाद के बिंदु से परखना उचित नही होगा । “
मर गया देश जीवित रह गए तुम ” कहते हुए वे राष्ट्र और मनुष्य के इसी द्वंद्व को प्रदर्शित करते हैं ।
कला और साहित्य या अन्य किसी में प्रयोग के बावज़ूद स्वस्थ्य शब्द का अपना चिकित्सा शास्त्रीय महत्व है और मुक्तिबोध के लिए यह ज़रूरी था । अभी विगत दिनों उनके बेटे रमेश मुक्तिबोध ने भिलाई में अपने पिता के संस्मरण सुनाते हुए कहा था कि मुक्तिबोध अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हुए थे वे कहते थे उन्हें अपना काम पूरा करने के लिए पाँच साल और चाहिए । किन्तु उनकी यह इच्छा पूरी नही हो सकी ।
उनके निधन के बाद उनकी रचनाओं पर कालजयी का ठप्पा लगाया गया , उन्हें सदी का सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार घोषित किया गया किन्तु उनके समकालीन उस समय उनकी यह इच्छा पूरी करने में कोई मदद क्यों नही कर पाए ? उनका अन्त इस तरह क्यों हुआ ? वे अपनी इस अपूर्णता को लेकर ही दुनिया से चले गए ।
यह सही है कि मुक्तिबोध का आंतरिक और बाह्य संघर्ष ही उनकी रचनाओं का आधार था और उन्हें तत्कालीन जनता को कोंचने का अधिकार था उसमे गैर मार्क्सवादी और मार्क्सवादी सभी थे इसलिए उनकी कविता तत्कालीन मापदंडों को नकारकर आगे बढ़ती है उसके आकलन के लिए उस दौर के टूल्स नाकाफी थे और आज भी हैं क्योंकि समय और धारा का सामंजस्य न तब स्थापित किया जा सका न अब ।
हमे मुक्तिबोध को अनेक कोणों से देखना होगा तब हम उनके किसीं अंश तक पहुंच पायेंगे ।

शरद कोकास

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