| पूनम विश्वकर्मा वासम || की कविताएँ.  * दस्तक़ के लिए प्रस्तुत : अनिल करमेले: टिप्पणियां

| पूनम विश्वकर्मा वासम || की कविताएँ.  * दस्तक़ के लिए प्रस्तुत : अनिल करमेले: टिप्पणियां

 

|| सामान्य सी बात है ||

नदी समझती है औरत के निर्वस्त्र होकर
उससे लिपट जाने वाली देह की भाषा
नदी के पानी के लिए यह सामान्य सी बात है

एक नन्ही चिड़िया जानती है
नदी में डुबकी लगाती औरत की देह का
प्रेम में टूटकर मकरन्द हो जाने की कथा

फूलों के लिए और भँवरों के लिए भी
यह एक सामान्य सी बात है

आस-पास गोते लगाती मछलियों के लिए
औरत का यूँ नदी से लिपटना कोई नई बात नहीं कि
औरत के लिपटते ही
नदी का पानी किसी पवित्र कुंड जैसा लगने लगता है
जहाँ डुबकी लगा कर मछलियाँ भी ले आती हैं
अपने हिस्से की पवित्रता

सूरज जानता है उसके उगते ही नदी गर्म हो जाएगी
नन्ही चिड़िया फुदकने लगेगी
मछलियाँ भी चहक उठेंगी
और औरत
नदी के पानी से निर्वस्त्र होकर
लिपट जाएगी हमेशा की तरह

जंगल के लिए औरत का नदी से यूँ रोज लिपटना
सामान्य सी बात है
पहाड़ को भी कोई आपत्ति नहीं

नन्ही चिड़िया ,मछली ,फूल तितली,भँवरे,जंगल,पहाड़ ,सूरज
सब मानते है
औरत का नदी से लिपटना सामान्य सी घटना है

औरत को निर्वस्त्र होकर नदी से लिपटते हुए
एक युग बीत गया

तब भी तुम्हारी आँखों मे औरत की देह मात्र का प्रतिबिंब उतर आना समझ से परे है

तुम कब समझोगे कि तुम्हारे गुरुर के तने हुए सागौन वृक्ष के नीचे से जड़ो को चूमते हुए
धरती के नीचे
बहुत बार चुपचाप गुजर जाती है नदी

तुम्हारा इतराना हमारे लिए एक सामान्य सी बात है

क्योंकि तुम नही जानते
तुम्हारा सारा हरापन हमारा दिया हुआ है.

 

*|| सोमारू के लिए ||*

दण्डकारण्य के बीहड़ जंगलों से,
एक बार फिर लिखूँगी मैं तुम्हें
संबोधित करते हुए प्रेमपत्र…
भले ही तुम संवाद न कर सको,
मेरे लिखे हुए शब्दों से !
फिर भी मैं लिखूँगी तुम्हें
घोटूल की मोटीयारिन की तरह,
प्रेम में सब कुछ अर्पण करने वाली
चेली बनकर ।

मैं लिखूँगी तुम्हें
गुण्डाधुर मानकर…
एक नई क्रांति की शुरुआत जानकर,
मांदर की थाप, सल्फी,
ताड़ी की मिठास पर थिरकते
तुम्हारे पांवों की धूल को मांथे लगाकर ।

मैं लिखूँगी तुम्हें प्रेम-पत्र…
बस्तर की गौरवशाली
इतिहास की पुर्नरावृति के नाम,
महाराज प्रवीरचंद भंजदेव का
माई दंतेश्वरी के प्रति
आस्था के नाम …
तुम्हें इंद्रावती की संतान मानकर
ककसाड़ गेंड़ी की ताल पर…
संस्कृति, सभ्यता और परंपरा का
निर्वाह करने वाला सोमारू जानकर ।

मैं लिखूंगी तुम्हें प्रेम-पत्र…
लहूलूहान हो चुकी तुम्हारी आत्मा
तुम्हारे शरीर पर लगी चोटों के नाम ।

मैं सुन सकती हूँ तुम्हारी आवाज
जो पुकारती है मुझे…
दण्डकारण्य के बीहड़ों से
चीख़-चीख़ कर ।

सुनो…मैं जानती हूँ
तुम लौटकर जरूर आओगे,
जब पढ़ोगे गोंडी भाषा में लिखे
मेरे प्रेम-पत्र…
अपनी कोट की जेब से निकालकर
तब तुम देखना…
लहूलुहान हो चुकी बस्तर की भूमि पर
पलाश के सुर्ख लाल फूल
प्रेम बरसाने लगेंगे ।

हाँ, तब भी मैं लिखूंगी तुम्हें
प्रेम-पत्र…
बस्तर का आदिवासी सोमारू समझकर
क्योंकि मैं तुमसे प्रेम करती आयी हूँ
युगोयुगान्तर से…
सच्चा प्रेम… मेरे सोमारू —

 

*|| मुकदमा ||*

हजारों वृक्षों की हत्या का मुकदमा
दायर किया बची- कूची सूखी पत्तियों ने
बुलाया गया उन हत्यारों को
दी गई हाथ में गीता….
कसम भी खाया भरी अदालत में
कि जो कुछ कहेंगे सच कहेंगे
कहा भी वही जो सच था !

अदालत ने भी माना कि
वृक्षो की हत्या कोई सोची -समझी रणनीति नही थी
और नही कोई साज़िश रची थी हत्यारों ने
क़सूर तो था वृक्षो का जिन्होंने कि थी कोशिश
धरती को सूरज की तपिश से बचायें रखने की

मूर्ख थे सारे के सारे वृक्ष
मान बैठें खुद को चाँद की मौन किरणों की भाषा का
सबसे बड़ा अनुवादक !

थी बादलों से भी इनकी साठ -गांठ
इसलिए रोप आते थे धरती की कोख़ में
अंसख्य नन्ही-नन्ही बूंदों को
नीले समुद्र की खेती के लिए !

मूर्ख थे सारे के सारे वृक्ष
काँक्रीट के जंगलों में उगाना चाहते थे गुलमोहर के फ़ूल
मधुमखियों से इनकी अच्छी जमती थी
इसलिए बाँट आते थे तितलियों को
उनके हिस्से का दाना-पानी !

अपनी हवाओं के बदले
हमारी सांसे रखना चाहतें थे गिरवी
इसलिए उन सारे वृक्षो को उखाड़ कर फेंक दिया
जिनकी जड़े जुड़ी हुई थी हमारे हिस्से की मिट्टी से !

मूर्ख थे सारे के सारे वृक्ष इन्हें शायद पता नही कि
जिन्दा रहने के लिए अब कृत्रिम हवा ही काफ़ी है

डाली से अलग हुई सूखी पत्तियों को भी
उतनी अक़्ल कहाँ कि …
करते विरोध वृक्षो की हत्या का
अच्छा होता ग़र समय रहते सारे के सारे वृक्ष बैठ जाते
बिना कुछ कहें बिना कुछ सुनें अनशन पर।

*|| माँ की चूड़ियां ||*

दर्द तो होता होता होगा न तुम्हें
तुम्हारी,चूड़ियों के टूटने का
सुबह ,बाबू जी की टेबल पर
चाय रखते हुये ,नाराज़गी में तुम
खनकाती थी अपनी चूड़ियां
और बाबू जी समझ जाते थे
तुम्हारी चूड़ियों की भाषा !

माँ जब तुम ,हाथो को ऊपर
उठा -उठा कर हमें डाँटती थी
हमारी गलतियों पर …
तो कैसे हँसती थी ,तुम्हारी चुड़िया
मानो हमें चिड़ा रही हो …!

घर के बर्तनों से लेकर
चुल्हा ,चौका ,तक बतियाते थे
तुम्हारी चूड़ियों से …
मेहमानों का स्वागत कैसे
इठलाकर करती थी,तुम्हारी
हरी -पीली कांच की चूड़िया !

तुम्हारे हर दुःख हर दर्द की
भागीदार थी, तुम्हारी चूड़िया
हमसे ज्यादा तुम्हारे दर्द को
भोगती थी
तुम्हारी कलाई की चूड़ियां !

कितनी रौनक् थी, तुम्हारी हाथो की
खनकती चूड़ियों में …
फिर अचानक, कैसे ?
बाबू जी की सासों के साथ
ख़ामोश हो गई इनकी खनक !

क्या ? तुम्हारी चूड़ियों पर
तुम्हारा बस इतना ही हक़ था
कि तुम्हारी कलाई में होने के
बावजूद भी इनकी डोर
जुड़ीं, हरदम बाबू जी की
सासों के साथ …

ऐसा क्यों माँ ? ऐसा क्यों
दर्द तो होता होगा ना तुम्हें
तुम्हारी चूड़ियों के टूटने का ।

,****

टिप्प्णी :

\शरद कोकास\

पूनम को मैं उनके बचपन से जानता हूँ । लगभग 20 साल पहले उसने कविता लिखने की शुरुआत की थी । पूनम की कविताओं में बस्तर का सौंदर्य ही नही बल्कि वहाँ के आदिवासियों का दर्द , उनके जीवन के छोटे छोटे सुख और दुख भी शामिल हैं । पूनम की कविताओं में जहाँ बस्तर के जीवन का उल्लास है , वहीं प्रेम की पीड़ा भी है । किन्तु पूनम के कवि का विकास बहुत धीमा है इसलिए उनकी कविताओं में शिल्प उसी रूप में आता है जिस तरह उनका ऑब्सर्वेशन होता है इस वजह से कही जाने वाली बात का वितान कुछ अधिक ही विस्तारित हो जाता है इस तरह कविता में अनावश्यक शब्द और पंक्तियों में वृद्धि हो जाती है ।
आदिवासी क्षेत्रों पर काफी कविताएँ लिखी गई हैं सो उनके बिंबों का दोहराव स्वाभाविक है फिर भी इन नई परिस्थितियों में उनके जीवन और शोषण पर नए तरीके से लिखा जा सकता है ।
उम्मीद है पूनम इस बात को गम्भीरता से लेगी ।

*

\दीपक मिश्र\

देसज खुश्बू से पगी ये कविताएँ न सिर्फ लोकधर्मी चेतना से संपृक्त हैं अपितु सहज जीवन की बानगी भी प्रस्तुत करती हैं। टटके बिम्बो से गुजरना सुखद है। शब्दों की अतिशयता भावो के सम्प्रेषण को , अलबत्ता, बाधित करती है!

*

\बुद्धिलाल पाल\

सोमारु कविता प्रणय गीत में कुछ इस तरह क्रान्तिगीत है जैसे पहले भारतीय भारतीय वीर राजा महाराजा युद्ध करने जाते थे तो उनकी पत्नियाँ उनकी आरती की थाल लेकर उनकी आरती उतारकर उनके भाल में टीका लगाकर उनके हाथ मे तलवार देकर उन्हें युद्ध भूमि के लिये भेजती थीं।परंतु जंगल की पृष्ठभूमि में तो औरतें भी क्रांतिधर्मा में कहीं न कहीं न्यूनतम ही सही पर साथ होती हैं।तो कविता सोमारू देखने से ऐसी लगती है जैसे दंडकारण्य में बैठकर नही लिखी गई है किसी किला,किसी मेवाड़ या किसी शहर में बैठकर लिखी गई जैसी लगती है।
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