बात कुछ भी न थी.! बहुत ही खतरनाक, भयावह और चिंताजनक परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं _ राजेंद्र सायल

बात कुछ भी न थी.! बहुत ही खतरनाक, भयावह और चिंताजनक परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं  _ राजेंद्र सायल

बात कुछ भी न थी.! बहुत ही खतरनाक, भयावह और चिंताजनक परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं _ राजेंद्र सायल

बात कुछ भी न थी…………….!
बहुत ही खतरनाक, भयावह और चिंताजनक परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं; आज इस खबर ने विचलित कर दिया कि त्रिपुरा के एक वरिष्ट पत्रकार सुदीप दत्त भौमिक की अगरतला में हत्या कर दी गयी है; और हत्या में टी.एस.आर. का एक जवान, नंदू रियांग शामिल है.
इसी तरह से हाथ काटने वाले, सर कलम करने वाले, और धरती से नाम-ओ-निशान मिटा देने वाले, एनकाउंटर में मार गिराने वाले बयान भी खुल्लम-खुल्ला जारी किये जा रहे हैं; और इनके पीछे तमाम संवैधानिक पदों पर पदासीन अधिकारी, नेता और मंत्री शामिल हैं.
इसी सन्दर्भ में जनवरी 2008 मैं मैंने एक कविता/तुकबंदी की थी…..बात कुछ भी न थी……….!
हालांकि उस वक़्त इस कविता के सन्दर्भ में था: छत्तीसगढ़ में गैर-संवैधानिक सरकारी दमन से लेकर सलवा जुडूम और भगवा ब्रिगेड के हिंसक हमले, वह भी मानव अधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और वकीलों पर, जो सच को स्थापित करने या संविधान में निहित अधिकारों और सिद्धांतों की सुरक्षा में कार्यरत थे.

 

लेकिन आज यह कविता और भी मौजूं लग रही है, इसलिए इसे यहां पेश कर रहा हूं.

***
बात कुछ भी न थी….!
बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!
कि वह अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे थे,
मैंने बीच में ही पूछ लिया कि
महात्मा गांधी की हत्या किसने की,
बस इतनी सी बात पर वे आग-बबूला हो गए
कहने लगे, बहुत ज़ुबान चलाते हो,
तुम्हारी ज़ुबान खींच लेंगे!
बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!

बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!
कि वे ‘हिन्दू-राष्ट्र’ का सपना दिखा रहे थे,
मैंने पूछा, कि गुरु गोलवालकर ने
मुसलमानों, ईसाईयों और कम्यूनिस्टो को
‘हिन्दू राष्ट्र’ का दुश्मन क्यों करार दिया?
बस इतनी सी बात पर वे भड़क गए
कहने लगे, तुम हमारे गुरु पर उंगली उठाते हो,
तुम्हार हाथ काट देंगे!
बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!

बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!
वे छत्तीसगढ़ राज्य का जश्न मना रहे थे,
मैंने कहा कि पवन दीवान की एक कविता बांट दूं:
“छत्तीसगढ़ बन जाएगा तेलंगाना”.
बस इतनी सी बात पर वह चीखने लगें,
अरे तुम गुज़रे ज़माने की कविता पढ़ते हो,
तुम्हारा पुस्तकालय जला देंगे,
बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!

बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..!
कि वे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का पुतला दहन कर रहे थे,
मैंने किसी से पूछा कि
क्या पुतला दहन करने से छत्तीसगढ़ शांत हो जायेगा,
तो वह बड़े शांत स्वभाव में बोले, अरे तुम पुतले की बात करते हो,
हम जिंदा इंसान जला देते हैं….
बात कुछ भी न थी, बात इतनी सी थी…..
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राजेन्द सायल

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