|| वेणु गोपाल की चार कविताएँ || दस्तक में आज प्रस्तुत |

वेणु गोपाल

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

|| उजाला ही उजाला ||

आ गया था ऐसा वक्त
कि भूमिगत होना पड़ा
अंधेरे को

नहीं मिली
कोई
सुरक्षित जगह
उजाले से ज़्यादा

छिप गया वह
उजाले में कुछ यूं
कि शक़ तक नहीं
हो सकता किसी को
कि अंधेरा छिपा है
उजाले में

जब कि
फिलहाल
चारों ओर
उजाला ही उजाला है !

 

*|| ख़तरे ||*

ख़तरे पारदर्शी होते हैं
ख़ूबसूरत
अपने पार भविष्य दिखाते हुए
जैसे छोटे से गुदाज़ बदन वाली बच्ची
किसी जंगली जानवर का मुखौटा लगाए
धम्म से आ कूदे हमारे आगे
और हम डरें नहीं
बल्कि देख लें उसके बचपन के पार
एक जवान ख़ुशी
और गोद में उठा लें उसे

ऐसे ही कुछ होते हैं ख़तरे
अगर डरें तो ख़तरे और अगर
नहीं तो भविष्य दिखाते
रंगीन पारदर्शी शीशे के टुकड़े.

 

*||जहाज़ पर पक्षी ||*

उड़ना
बार-बार
और हर बार उसी जहाज़ पर लौट आना
अब नहीं होगा.

दूर ज़मीन दिखाई पड़ने लगी है
जहाज़ बस, किनारा छूने ही वाला है
लेकिन मैं फिर भी बेचैन हूँ
अब तक तो सब-कुछ तय था
उड़ान की दिशाएँ भी
उड़ान की नियति भी कि
अपार जलराशि के ऊपर
थोड़ी देर पंख फड़फड़ा लेना है
और फिर दुबारा लौटकर फिर वहीं आ जाना है.

अब
सब-कुछ मेरी मरज़ी पर निर्भर होगा
चाहूँ तो पहाड़ों की तरफ़ जा सकूँगा
जंगल की तरफ़ भी
या फिर से
आ सकूँगा किनारे पर खड़े जहाज की तरफ़

भावी आज़ादी पंखों में फुरहरी
जगा रही है
ख़ुद को बदलते पा रहा हूँ
और यह सब ज़मीन के चलते
जो दिखाई पड़ने लगी है
पक्षी हूँ
पर आसमान से ज़्यादा
ज़मीन से जुड़ा हूँ

आँखों में अब ज़मीन ही ज़मीन है…
और वे पेड़, जिन पर अगली रातों में
बसेरा करूँगा
वे पहाड़, जिन्हें पार करूँगा
वे जंगल, जहाँ ज़िन्दगी बीतेगी

और ये सब एक निषेध है
कि पक्षी को
समुद्री-यात्रा पर जा रहे जहाज़ की ओर
मुँह नहीं करना चाहिए.

 

*|| अंधेरी रात में दूधिया बारिश ||*

अंधेरी रात में सड़कों पर बारिश हो रही है
और
लोग अपने-अपने बिस्तरों पर
लिहाफ़ों में दुबके
नींद आने से पहले
उन पहाड़ों के बारे में सोच रहे हैं
जिनकी ऊँचाइयों तक
बादल कभी नहीं पहुँच पाते

छत से परे के आकाश को वे
सिर्फ़ सपनों में मंज़ूर करेंगे
और सबेरे तक
वे पंख झड़ चुकेंगे
जिनके सहारे उन्होंने अतीत और भविष्य के बीच
उड़ानें भरी होंगी

रात में.

 

*|| योद्धा चश्मे ढूंढ़ रहे हैं ||*

कोई शक नहीं
कि वे ईमानदार योद्धा हैं
अन्याय के खिलाफ़
आख़िरी साँस तक लड़ सकते हैं

बशर्ते वह दिखे

मुश्किल यही है
कि उन्हें कुछ भी
साफ़ नज़र नहीं आता

आँखें कमज़ोर हैं

और
इसीलिए वे
एक अरसे से

लड़ने की जगह
बाज़ार में चश्में ढूंढ रहे हैं

 

*|| देखना और सुनना ||*

देखने के नाम पर
मेरे पास सिर्फ़ वह अंधेरा है
जो बढ़ता ही चला जा रहा है

लेकिन सुनने के नाम पर
ढेर सारी किलकारियाँ हैं

घुटनों के बल
खिसक-खिसक कर आते हुए बच्चे की

मैं
जो कुछ भी देख पा रहा हूँ
वह आज है।
लेकिन जो सुन रहा हूँ
वह आने वाला कल है.

✍? *वेणु गोपाल*

*दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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