सोनू रूद्र मंडावी की कविता / जब तक काल दिखती नही इन दुश्मनों के चेहरे पर.

सोनू रूद्र मंडावी जब तक काल दिखती नही इन दुश्मनों के चेहरे पर, जब तक मौत नही नाचेगी इन गुंगो बहरों पर। तब तक यह दिकू भाई भाई चिल्लायेंगे, गोंडवाना के इतिहास का मस्तक पोंगाओं से कटवाएंगे। जिनको शर्म नही आती हर रोज मरकर जीने में खंजर अब तक गडा है गोंडवाना के सीने में
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15.09.2018 उन तितलियों के पर जला दिए गए जिनके रंग विधर्मी थे यह एक समय ऐसा था कि विविधता को विधर्म घोषित कर दिया गया। वे परिंदे वे पशु वे पेड़ सब पराए हो गए जो बहुवर्णी थे। रंगों का ऐसा डर था हवा में कि दो तीन रंगों तक सीमित था संसार। पर रंग
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   * गणेश कछवाहा यह कविता ‌उनके लिए नहीं है ‌जो शब्दों को ‌सुने ,पढे बगैर ‌वाह वाह कर देते हैं। ‌पंक्तियों के ‌पूरा होने से पहले ‌तालियां बजा देतें हैं। ‌ ‌यह कविता ‌उनके लिए भी नहीं है ‌जो सीता को ‌कोठे पर दम तोड़ने, ‌राम रहीम को ‌चार दिवारी में कैद करने, ‌सरयू
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एक बार एक गांव में  मंदिर का काम चल रहा था, मंदिर  आदिवासी और गरीब लोग बना रहे थे, एक आदिवासी बड़ी मूर्ति बना रहा था! कुछ दिन बाद  मंदिर बनकर तैयार हो गया, मंदिर में पुजारियो द्वारा हवन कार्य मूर्ति स्थापना और मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा आदि कार्य सम्पन्न हो गया, अगले दिन मन्दिर दर्शन
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अनुज श्रीवास्तव के जन्मदिन पर हमारे आग्रह पर प्रस्तुत . बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी लोग बेवजह की मौतों का सबब पूछेंगे ये भी पूछेंगे के तुम इतने डरे से क्यूं हो उँगलियाँ उट्ठेगीं सूखे हुए तालों की तरफ़ उँगलियाँ उट्ठेगीं नदियों में बहते नालों की तरफ़ उँगलियाँ उट्ठेगीं हर बात के
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  14.09.2018 सरकार के इशारे के बाद रायपुर से कोयम्बटूर भेजे गए पत्रिका के पत्रकार राजकुमार सोनी का एक गाना- ओ चाऊंर वाले बाबा ओ दारू वाले बाबा जबरदस्त ढंग से वायरल हो रहा है। महज दो दिनों में यह गीत लाखों लोगों तक पहुंच गया है। वैसे तो राजकुमार सोनी की कलम का लोहा
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दस्तक की सदस्या रेणु मिश्रा सक्रिय युवा कवयित्री हैं। वे कहानियाँ भी लिख रही हैं। आजकल उनकी रिहाइश अलीगढ़ में हैं। आइये आज पढ़ते हैं रेणु की कुछ कविताएं। कविताओं पर आप सभी की प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी….. अनिल करमेले . रेणु मिश्रा || स्त्रियां, मन से लड़कियाँ || हमनें माँओं को देखा अपनी पुरानी
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  दक्षिण बस्तर की आदिवासी युवा  कवि गायत्री सलाम . मै घायल बस्तर की दर्द सुनाने आज निकली हुँ , इस मातृभूमि की कर्ज चुकाने आज निकली हुँ.  बस्तर कभी शांति हुआ करती थी घर घर में रेला और मादर की थाप गुंजा करती थी बस्तर की शांति रोती है मरघट की तन्हाई में मै
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  30.07.2018 असमानता, शोषण की राह लिखुं या दमनकारियों की वाह लिखुं, कल्लुरी की जीत लिखुं या खामोश आदिवासीयों को मृत लिखुं। नक्सलियों के कुकर्म लिखुं या महिलाओं का दुष्कर्म लिखुं लिख तो मैं भी दुं साहब पर लगी आग बुझाएगा कौन घर से विस्थापित बैगाओं का हाल लिखुं या बेदखल करने वाले शोषकों की
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⭕ दोस्तो, आज प्रस्तुत हैं  वीरेन डंगवाल की कविताएँ. कविताओं पर चर्चा ज़रूर करें.   ✍🏻 वीरेन डंगवाल ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले || माँ की याद || क्या देह बनाती है माँओं को ? क्या समय ? या प्रतीक्षा ? या वह खुरदरी राख जिससे हम बीन निकालते हैं अस्थियाँ ?
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