——————— धुप्प अंधेरे कमरे में एक छोटा सा रौशनदान , खुला रहने दो। नजर आती है यहाँ से थोड़ी हरियाली , थोड़ा आसमान खुला रहने दो। धुप्प अंधेरे कमरे में…. लकीर सी घुस आती है सूर्य किरणें , कभी छिटकती है चांदनी , गर्म हवा के झोंके , कभी भीगी […]

हिंदी दिवस पर विशेष यह कविता ‌उनके लिए नहीं है ‌जो शब्दों को ‌सुने ,पढे बगैर ‌वाह वाह कर देते हैं। ‌पंक्तियों के ‌पूरा होने से पहले ‌तालियां बजा देतें हैं। ‌ ‌यह कविता ‌उनके लिए भी नहीं है ‌जो सीता को ‌कोठे पर दम तोड़ने, ‌राम रहीम को ‌चार […]

रोशन बंजारे ” चित्रा’ अब कभी – कभी अकेले कुछ किताबें ले किसी एकांत जगह चली जाती हूँ…अब रास्ते अच्छे लगते हैं…यूँ कि मंज़िल कहाँ है जानती ही नहीं…आज रेलवे के पास एक खाली जगह पर बैठी थी…तुम वहां भी थे… उस रास्ते से हम गुज़रे थे साथ…उस मंज़र को […]

गोदना ÷÷÷÷÷ उस दिन भीड़ ने नहीं मरा था – तुम्हें दुबारना मारना पड़ा निहायत महीन – सभ्य तरकीब से . ठहरो – वहीं बाहर रूक जाओ . मेरे पहलू में क्यों घुसे आ रहे हो . मेरे एक पहलू में धुकुर धुकुर करता दिल है . दूसरे में ठसाठस […]

🏣🏤🏚🏦🏘🏬 बैतूल का रेलवे स्टेशन यहीं में पहली बार तीन माह की उम्र में रेल में बैठा. (रिपोर्ताज: सुधीर सक्सेना , संपादक दुनिया इन दिनों ) 🏠बहुत दिलचस्प है किसी के ज़रिये किसी जगह को जानना। कुछेक यात्राओं से आप किसी शहर को कितना जानते हैं।शहर की पंखुरियां बहुत आहिस्ता-आहिस्ता […]

जब हम शुरुआती तौर पर दलित साहित्य पढ़ रहे थे यह ऐसा वक्त था जब दलित साहित्य से हमारा दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। ऐसे समय में दो किताबें मेरे सामने आई जो पहले से चर्चित थी जिस के नामों को हमने सुन रखा था। उनमें से एक किताब […]

जंगल , जंगल क्यों हैं , किस लिये हैं – किनके हैं . जंगल गर जंगल हैं तो वहां का बासिंदा – जंगली हुआ . ये तय किसने किया ….. जंगल को – क़ानून के जंगल में फांदने वाला – कौन था – है . * ज़मीन को – अपने […]

अनुज श्रीवास्तव ने मुबंई में.मसाला चाय की श्रंखला प्रारंभ की थी जिसमें वे देश के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार ,कवि और लेखकों की कहानी, कविता का पाठ करते है.यह श्रंखला बहुत लोकप्रिय हुई ,करीब 50,60 एपीसोड. जारी किये गये. सीजीबास्केट और यूट्यूब चैनल पर क्रमशः जारी करने की योजना हैं. हमें भरोसा […]

प्रस्तुति अनुज श्रीवास्तव पिछले दिनों भिलाई के मशहूर हो रहे नुक्कड़ कैफे में शरद कोकास ने अपनी दो कवितायें , पिता हुये नाराज ,भाई ने दी धमकी मां ने बंद कर दी बातचीत ,उसने नाटक नहीँ छोड़ा ..और . स्त्री होना कितना दुखद है .. पानी का पाठ किया . […]

27.04.2019 शाकिर अली जगदलपुर में 2004 से 2007 तक ग्रामीण बेंक में आडीटर के पद पर रहे ,अपने कार्यक्षेत्र में उन्हे  दक्षिण बस्तर के अंदरूनी  शाखाओं में बार बार जाना पडता था.इसी समय उन्होंने ” बचा रह जायेगा बस्तर”  कविता संग्रह तैयार किया .जब प्रकाशन के लिये उद्भावना में भेजा […]

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