सेंट्रल जेल ग्वालियर : फूलन की पहेली : बादल सरोज 

28.07.2018

“अर्जुनसिंह निकम्मा है, फूलन उसकी अम्मा है” जे क्या नारा लगाते हैं आप लोग ? फूलन देवी ने अपनी आंखों को शरारती अंदाज में मटकाते हुए यह सवाल मम्मी से पूछा था जब वे कुछ दिन उनके साथ जेल में थीं । मम्मी और उनके साथ गईं जनवादी महिला समिति की सभी साथिने जोर से हंस दीं ।

फूलन ने भी हंसी में हंसी मिलाई और कहा : “हम क्या इत्ते बड़े दिखते हैं कि इत्ते बड़े मौड़न (लड़कों) की अम्मा हो जायें ?” ऐसा ही कुछ कहा था उन्होंने !!

● मिट्टी से जुड़ी हर औरत की तरह फूलन का भी सेन्स ऑफ ह्यूमर गजब का था । मगर इस नारे के प्रति मजाकिया भाव उनमे बाद में विकसित हुआ था । पहले वे इस नारे से आहत हुई थीं, उन्हें बुरा लगा था यह संयोजन ; मगर चूंकि इसे लेकर वे एक बार हम लोगों से लड़ चुकी थीं, इसलिए उनका गुस्सा खत्म हो चुका था ।
● एक बार किसी आंदोलन में ठीकठाक तरीके से ठुक-पिटकर हम जेल में दाखिल हुए थे । कोई 300 के करीब थे हम लोग ।

दिन भर कभी #मजाज़ की नज़्म :
“शेर हैं चलते है दर्राते हुए
बादलों की तरह मंडलाते हुए
ज़िंदगी की रागिनी गाते हुए
आज झंडा है हमारे हाथ में ।
लाल झंडा है हमारे हाथ मे !!”

के समूहगान से जेल गूंजती रहती थी तो कभी नारों से – जिनमे एक प्रमुख नारा वह होता था, जिसका उल्लेख ऊपर किया है ।
● एक दिन जब कामरेड शैली के साथ हम तीन लोग जेलर (तब तक हर जेल को सुपरिंटेंडेंट नही मिला था ) से चर्चा करके लौट रहे थे तो वहीं जेल अदालत के बाहर बैठीं फूलन दिखीं । मगर आज उन्होंने कोई भाव नही दिया । बल्कि मुंह तक फेर लिया । हम लोग अचरज में पड़ गये । शैली ने साथ आये बाकी 2 को बैरक जाने का इशारा किया और हम दोनों फूलन के पास वहीँ जमीन पर आकर बैठ गए ।
● शैली ने पूछा ; क्या हुआ ? सब खैरियत तो है ।
फूलन चुप रहीं जैसे सुना ही न हो ।
शैली बोले : आज चाय नही पिलायेंगी ?
फूलन ने बिना हमारी ओर देखे ही अपनी सखी जैसी वार्डन को चाय की व्यवस्था करने का इशारा किया । चाय अंदर के एक दरवाजे के पार अस्पताल से बनकर आया करती थी।
कोई बात हुई है क्या ? हम दोनों ने लगभग एक साथ पूछा ।
तमतमाये चेहरे से वे बोलीं : ये फूलन उसकी अम्मा है का नारा क्या है ? हम अर्जुनसिंह की अम्मा दिखती हैं तुम्हे !!
● हम सन्न रह गये । कभी सोचा ही नही था कि जिसे हम सियासी नारा समझकर लगाते थे उसकी धार किसी व्यक्ति के विरुध्द भी है और आहत करने वाली भी ।
● कामरेड शैली ने बात संभाली : “अरे, हम तो ये बताते हैं कि अर्जुन सिंह कुछ भी नही हैं आपके सामने । आप उनसे बड़ी हो । अम्मा तो नारे की तुकतान मिलाने के लिए कहते हैं ।”
वे कन्विंस तो नही हुई किंतु मुस्कुरा दीं । बोली ; “बहुत चालू हो। बुद्दू समझते हो हमे।” बोली “वैसे तो हम बागी हैं, तुम हमे डकैत कह लेयो, चाहें कछु कह लेयो, भले भड़या कह लेओ पर जिन नेतन ते मत जोड़ो हमे।”
● और उसके बाद वे जो शुरू हुईं तो घंटा भर तक अर्जुन सिंह के वायदों और विश्वासघातों का पोथा पढ़ती रहीं। इस पर कभी बाद में अभी सिर्फ इस बेहूदे नारे पर जिसे खुद हम लगाया करते थे ; बाद में जब उसके बारे में सोचा तो पहेली सुलझी। और ग्लानि भी हुई ।
● पहेली यह है कि फूलन देवी सरेंडर करने वाली अकेली “डकैत” नहीं थी। उनके पहले माधोसिंह, मोहरसिंह, नाथू सिंह, मलखान सिंह, पंडित लोकमन लुक्का और फलाने-ढिकाने ने भी सरेंडर किया था। फूलन तो जेल काटने के बाद महज 37 साल की उम्र में भून दी गयी। ये सब सुख-चैन-आराम के साथ जीए, जी भी रहे हैं। मगर इनमे से किसी को भी श्यामाचरण शुक्ला या गोविन्द नारायण सिंह या अर्जुन सिंह का फूफा-ताऊ-चाचा-मामा-जीजा-साला नहीं बताया गया। लेकिन।फूलन दोनों तरफ से इस्तेमाल हुयी ; खुद को अपमानित करने के लिए भी और खुद से जोड़कर “कुंवर” अर्जुन सिंह को जलील करने के लिए भी !!
● ऐसा क्यों हुआ ? फूलन ने स्वयं इस बारे में क्या कहा था यह बाद में बताएँगे तब तक इस पहेली का जवाब ढूंढिए और उसके बाद फूलन को प्रवचन देने आइये।

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