सरगुजा : वंदना दत्ता जिन्होंने पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित किया और बनी दूसरों के लिए मिसाल .मीरा शुक्ल जिन्होंने बिखरे बच्चों को दिखाई राह .

ऐसी होती है माँ : वन्दना और मीरा से टूटे विखरे बच्चों को राह , शिक्षा देकर बदल दी जिंदगी 

जन्म नही दिया ,फिर भी माँ का मिला दर्जा

पत्रिका की रिपोर्ट .सरगुजा

अंबिकापुर . एक ऐसी महिला जिसने परिवार से बिछड़कर दर – दर की ठोकर खाने वाले बच्चों की जिंदगी सवारने में अपना पूरा जीवन खपा दिया । यही नहीं उन्होंने बाल सम्प्रेक्षण गृह में हत्या जैसे संगीन आरोप में बंद एक अपचारी बालक को सही रास्ता दिखाकर ऐसी सीख दी कि बाहरी दुनिया में कदम रखने के बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज एक सफल इंसान बनकर हरिद्वार में नौकरी कर रहा है । उसने अपने पहले वेतन से मोबाइल खरीदकर पहला कॉल भी उसे सही राह दिखाने वाली महिला को कर उन्हें ‘ वंदना मां ‘ कहा तो उनकी भी आंखें भर आई । हम बात कर रहे हैं बाल सम्प्रेक्षण गृह की पूर्व अधीक्षिका वंदना दत्ता की , जो निरंतर 30 वर्ष से नारी निकेतन व सम्प्रेक्षण गृह में बच्चों व महिलाओं का जीवन संवारते आई हैं । 

वंदना ने इस बात को भी साबित किया है कि केवल जन्म देने से  ही मां का दर्जा नहीं होता , कर्म और शिक्षा दीक्षा देने वाले को भी मां कहा जाता है समाज सेवा के क्षेत्र में वंदना दत्ता एक ऐसा नाम जिसे आज किसी पहचान की जरूरत नहीं हैं । अपनी आधी जिंदगी इन्होंने दूसरों का जीवन संवारने में लगा दी । मदर्स – डे पर आज वे भी यह कहने से नहीं रह पाती हैं कि आज की माताओं के सामने ज्यादा चुनौतियां हैं वे काम के साथ बच्चों को अच्छे से लालन पालन कर रही हैं । घर के साथ बाहर की जिम्मेदारी निभाते हुए अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार कर

रहीं हैं । उन्होंने कहा कि पूर्व में माता पिता अपने 6 बच्चों को भी बेहतर ढंग से पाल लेते थे । लेकिन बच्चे अपने माता – पिता को पालने में असमर्थ होते . हैं उनकी ऐसी भावनाएं नहीं होनी चाहिए । एक मां ही है जो पेट में बच्चों को सींचती है और उसका जीवन संवारने में अपना सबकुछ समर्पित कर देती है । मां को भगवान का दर्जा इसी वजह से मिला हुआ है ।

माँ शब्द देता है सुखद अनुभूति

वंदना दत्ता ने बताया कि उन्होंने परिवार परामर्श केंद्र में अपनी : शुल्क सेवा दी और कई परिवार को बिखरने से बचाया । इसके साथ ही कई ऐसे बच्चे जिनका कोई नहीं था , उन्हें अपने घर में रखकर न केवल शिक्षा दी , बल्कि सही राह पर चलना सिखाया । उनकी बताए राह पर चलकर कई बच्चे आज । अधिकारी बनकर अपनी सेवा दे रहे है। सम्प्रेक्षण गृह में जब वंदना दत्ता अपनी सेवा दे रही थी,। इस दौरान एक अपचारी बालक हत्या के आरोप वहा बन्द था । उसके व्यवहार देखते हुए न्यायालय व शासन स्तर अन्य जगह स्थानांतरण करने की कहा गया । लेकिन इसे उन्होंने । चुनौती के तौर पर लिया और उसकी खुबियों को देखते हुए उसकी जिंदगी संवारने में जुट गई । उनके सेवानिवृत्त होने पर कोई सबसे अधिक दुखी था वह यह बच्चा ही था । वंदना के सेवानिवृत होने के बाद वहां निर्दोष साबित हुआ और आगे उनके बताए मार्ग पर बढ़ना शुरू कर दिया । इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा । आज वह हरिद्वार में एक कम्पनी में । काम कर बेहतर जिंदगी बिता रहा । । पहला वेतन जब उसे मिला तो । उसने एक मोबाइल खरीदा और पहला कॉल वंदना दत्ता को लगाया । उसने अपना नाम बताए बिना जब वंदना मां कहा तो उनकी आंखें भी भर आई । इसके बाद उस बच्चे ने बताया कि मुझे भले ही जन्म मेरे मां ने दिया है । लेकिन आज आपकी सीख ने मुझे जो शिक्षा – दीक्षा दी है , उससे मेरा पूरा जीवन संवर गया । आप मेरी मां हैं । मोबाइल पर इतनी बाते सुनने के बाद दोनों की आंखें भर आई और वंदना दत्ता ने अपनी जिंदगी को सफल बताया ।

करने को तो बहुत से काम करतीं है वंदना जी जिसमें  रात्रि कालीन भोजन सेवा भी है जो  सप्ताह में 3 दिन अपने से भोजन बनाकर उनको कराते है जो रात में भूखे साप्ताहिक बाजार के झाले में सो जाते है,

सिर्फ़. अपने दो बच्चों की नहीं बल्कि ,660 बालिकाओं की भी मां कहलाती हैं मीरा.

समाज सेवा के क्षेत्र में जब मीरा शुक्ला ने अपने कदम बढ़ाए थे , तो उन्हें पता नहीं था कि आज वे अपने दोनो बच्चों के साथ ही 660 बालिकाओं की भी मां कहलाएंगी इसके साथ ही 76 ऐसी महिलाएं जिन्हें परिवार ने भी रखने से इंकार कर दिया था । उनकी जिंदगी को भी संवारा । इसके साथ ही इन महिलाओं के बच्चों को बेहतर जिंदगी कैसे मिले , इस तरफ भी ध्यान दिया । मीरा शुक्ला पत्रिका से चर्चा करते हुए बताती है कि विश्रामपुर पुलिस में एक ऐसी किशोरी को लाकर उन्हें सौंपा था , जिसे उसकी मां ने जब प्रेमी से मिलने से रोका तो उसने माँ पर ही चाकू से हमला कर दिया था व अपने परिवार के साथ रहने से इंकार कर दिया था । उसे जब मीरा ने कुछ दिन अपने साथ रखा तो किशोरी इतनी प्रभावित हो गई कि वह न केवल अपने मां के साथ रहने को तैयार हो गई कि आज आगे की पढ़ाई कर जिंदगी सवार रही है । आज वह जब भी मीरा से बात करती है तो माँ ही कहकर संबोधित करती है। 

दी ऐसी शिक्षा कि बन गई प्रशासनिक अधिकारी 

एक ऐसी युवती जो काफी ज्यादा डिप्रेशन में आ गई थी और उसे लेकर अपने परिवार के साथ भी । विवाद होने लगा । लेकिन जब उस युवती को परिवार वालों ने काउसिलिंग की जिम्मेदारी मीरा को सौंपी थी तो उन्हें भी नहीं पता था कि युवती की पूरी जिंदगी बदल जाएगी । जब वह युवती यूपीएससी कर । सफलता प्राप्त की और जब अपना कार्यभार संभाल रही थी , तो अचानक उसके कार्यालय में मीरा पहुंच गई । इस दौरान सभी कर्मचारी उनका स्वागत करने में लगे थे । उसने सभी को छोड़ कर  चरण स्पर्श किए और मां कहकर गल्ले से लिपट गई  एक 19 वर्षिय महिला प्रेम में धोखा खाकर मीरा । शुक्ला के पास पहुंची थी . इस दौरान वह गर्भवती थी । उसने जब बच्चे को जन्म दिया और प्रसव पीड़ा से बिलख रही थी तो वह मीरा से खुद गले में लिपटकर रोने लगी । इस दौरान उस महिला के मुख से पहला शब्द निकला वह मां था ।

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