शीशमहल भरभराकर गिर न जाए माई लाॅर्ड्स ! : कनक तिवारी ,वरिष्ठ अधिवक्ता , छतीसगढ

29.03.2018

 

नवभारत में आज प्रकाशित 

 

 

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा पर महाभियोग लगाए जाने की सुगबुगाहट है। पिछले दिनों चार वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट जजों और चार मशहूर वकीलों की लगातार कानूनी पेशबंदी के चलते सुप्रीम कोर्ट की असंदिग्ध प्रतिष्ठा जनता की निगाह में वैसी नहीं बची है। लोग कहते हैं कुछ तो है जिसकी परदेदारी है। यह भी कि यदि आग नहीं होगी तो धुआं क्यों उठता है। खुशबू और सड़ांध कभी छिपाए नहीं छिपते। अदालतों को गुमान भी हो गया था कि वे कार्यपालिका और विधायिका से कहीं अलग स्वर्ग से उतरी संस्थाएं हैं जिनकी जनजवाबदेही नहीं है। उन पर कटाक्ष या खुशामद किए बिना संविधान में न्यायपालिका की अवधारणा और लगातार हो रहे अप्रत्या​शित व्यवहार की गंभीर समीक्षा करने की जरूरत है। जनता आईना है। उसमें सभी संस्थाएं कहें कि यहां तो सब कुछ दिखता है। कोई संस्था हाथी दांत की मीनार नहीं है। उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान बचाना भी नागरिक कर्तव्य है।

 

संविधान निर्माताओं ने ऊंची अदालतों का आकाश बुनने में दुनिया के संविधानों से प्रेरणास्पद उधार लिया। उनकी कोशिश थी अदालतों को सम्मान की गरिमा से लीपा जाये। आम जनता को महसूस हो यह महत्वपूर्ण संस्था लोकतंत्र के विकास के लिए स्थापित की गई है। उन्होंने उच्च न्यायाधीशों की जवाबदेही का समीकरण लेकिन नहीं लिखा। निष्पक्षता न्यायप्रियता का समास होने पर कुछ न्यायाधीशों पर भ्रष्ट, बिकाऊ, दुराचारी और पक्षपाती होने के आरोप रहे हैं। सामान्य जांच से परे सुप्रीम और हाईकोर्ट के जज जन दृष्टि में ‘मिस्टर क्लीन‘ ही समझे जाते रहे हैं। तार्किक हथियारों से न्यायाधीश अन्य अधिकारियों को दोषी सिद्ध करते हैं। उन्हें अपने खिलाफ इस्तेमाल होने की संभावना को अन्याय का विद्रूप समझते हैं। न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर सब कुछ हरा ही हरा नहीं है। लोग भी सावन के अंधे नहीं हैं। न्यायपालिका का रोम एक दिन में भले नहीं बना लेकिन अपने ऐतिहासिक भग्नावशेषों पर पलस्तर चढ़ाए बिना भरभरा कर गिर जाने के खतरों से बच नहीं सकता। कई जज न्यायिक कार्यों से अलग निजी जिंदगी में सार्वजनिक तौर पर कदाचार, भ्रष्टाचार और व्यभिचार तक का पोचारा फेरते रहते हैं, वह भी बेखौफ होकर। जजों की जिंदगी निजी नहीं हो सकती। वह चौबीसों घंटे न्यायाधीश होते हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल ने कहा था न्यायाधीशों को जीवन और आचरण के मानदंडों पर सामान्य लोगों से अधिक खरा उतरना होता है। भय, पक्षपात, स्नेह और दुर्भावना से परे न्यायाधीश अंतरात्मा की आवाज़ पर न्याय करें। अंगरेज़ी जुमले में उसे सीज़र की पत्नी की तरह संदेह से परे रहना चाहिए।

 

न्यायाधीश को सम्प्रदायवाद, क्षेत्रीयतावाद और मतवाद से परे होना है। उन्हें मंत्रियों और राजनीतिक नेताओं का बगलगीर या हमदर्द दीखने पर सम्मान नहीं मिल सकता, जिसके वे हकदार हैं। बड़ी सरकारी कुर्सियों पर निगाह रखते न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद संभावित पदों के लिए जन्मकुंडली साथ लिए फिरते हैं। निष्पक्षता, तटस्थता और स्थितप्रज्ञता की डींग हांकने वाले न्यायाधीश राष्ट्रपति पद से लेकर सांसदों तक के चुनाव में अलग अलग पार्टियों के उम्मीदवार बनते हैं। उनकी किसी से राजनीतिक समझ की पहले से ही सांठगांठ नहीं रही हो तो उन्हें कोई पार्टी क्यों टिकट देना चाहेगी? कई न्यायाधीश सुरक्षित कुर्सी पर बैठे अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं। खुद की अवमानना जैसा आचरण करते हैं। उनमें अधिवक्ताओं और पक्षकारों के प्रति कुंठित दर्प कभी कभी चोटिल सांप की तरह फुफकारता है। न्याय करने तथा कानून की चुनौतीपूर्ण व्यवस्था से जूझने के बदले ऐसे न्यायाधीश वकील का उपहास उड़ाने में आत्मसंतोष प्राप्त करते बदजुबानी और बदखयाली से उज्जवल संस्था के इतिहास और भविष्य को कलंकित करते हैं। कई न्यायाधीशों को सांप्रदायिक, पक्षपाती और खुल्लमखुल्ला भ्रष्ट होने का सामाजिक प्रमाण पत्र मिलता है। उनके निकट संबंधी सहसा समाज में महत्वपूर्ण और अमीर हो उठते हैं। ऐसे न्यायाधीश न्याय प्रक्रिया पर बदनुमा दाग होते हैं। डेविड पैनिक ने कहा है ‘न्यायपालिका का विद्यार्थी मुकम्मिल तौर पर जानता है कि सदियों से बुरे और वितृष्णा उत्पन्न करने वाले न्यायाधीश हुए हैं। उनमें तरह तरह के दोष रहे हैं। विख्यात अंगरेज दार्शनिक, लेखक और न्यायाधीश फ्रांसिस बेकन के अनुसार न्याय का स्थान पवित्र होता है। पूरा परिसर भ्रष्टाचार तथा कलंक से मुक्त रहना चाहिए। कई न्यायाधीश कायर और मौकापरस्त होते हैं। राजनीतिक महारथियों और व्यापारिक दिग्गजों के प्रकरणों में उनकी कलम की स्याही उनकी नहीं और किसी की रची भाषा लिखती है। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के मुकदमे छुट्टियों के दिन और वह भी न्यायाधीश के बंगले पर कैसे सुने जा सकते हैं। भोपाल गैस त्रासदी के मुकदमों को लेकर कुछ फैसलों की न्यायिक क्षेत्रों में तीखी आलोचना हुई थी।

 

उच्चतम न्यायालय के कई फैसले अमेरिकी बाजारवाद से प्रभावित भी लगते हैं। क्या ऐसा घालमेल भारत का भविष्य है? ऐसे निर्णयों के भीतर एक अंतर्निहित खतरा है। अपनी न्याय नजीरों में खुद को स्थापित करते न्यायाधीश अवतारवाद की मिथक कथा से प्रभावित नजर आते हैं। उच्चतम न्यायालय के फैसले कई बार एक दूसरे को उलटते पलटते और खंगालते हैं। एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने तल्खी में झल्लाकर कहा था उच्चतम न्यायालय को बुनियादी मसलों पर तो अपनी राय इस तरह कायम करनी चाहिए कि उसे बार बार बदलने की जरूरत नहीं पड़े। विधायिका औसतन प्रतिवर्ष डेढ़ बार संविधान में संशोधन करती है। जस्टिस कृष्ण अय्यर कहते हैं कि न्यायाधीशों को मालूम होना चाहिए कि उन पर संविधान की पोथी का बोझ लदा हुआ है। वे संविधान पर लदे हुए नहीं हैं। जब पहली अदालत आखिरी हो या आखिरी अदालत पहली, तब उसका किया गया फैसला पुनर्विचार के दायरे के बावजूद ऐतिहासिक होता है। एक गरीब मुल्क के पक्षकार इसके बावजूद उच्चतम न्यायालय नहीं पहुंच पाते। चारों धाम हिन्दुओं के लिए पवित्रतम मंजिलें हैं, लेकिन उनकी यात्रा दुष्कर असाध्य है। न्याय भी पुण्य की तरह दूधिया चांदनी है। उसे देखते देखते आंखें भले पथरा जाएं, वह अहसास से आगे बढ़कर अनुतोष के यथार्थ की तरह बरस नहीं पाती है। उच्चतम न्यायालय के फैसले अपनी गमक में कभी कभी मगरूर भी दिखाई पड़ते हैं। उन्हें इस धरती का नमक बनने की ताब भी दिखानी चाहिए। यह इतिहास का जनाभिमुखी आग्रह है।

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