वर्धा: गीतों-कविताओं से महात्मा गांधी विश्वविद्यालय में याद किए गए भगत सिंह

वर्धा: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी भगत सिंह जन्मोत्सव की पूर्व संध्या पर गाँधी हिल में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कविता, नाटक, गीत आदि की प्रस्तुति दी.

आज शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है. हालांकि हमारे नेता भगत सिंह को याद करने से घबराते हैं पर टीवी पर बहुतेरे नेता आज उन्हें करते देखे जा सकते हैं. चौक चौराहों पर भगत सिंह की फ़ोटो पर हार चढ़ाए जाएंगे. कहीं पर बाइक रैली, कहीं देशभक्ति के नारों के साथ डीजे पर नाचते युवा भी दिख सकते हैं. कुछ कह नहीं सकते शायद प्रधानमंत्री जी भी एक-आदा बयान दे दें कि वे बचपन से भगत सिंह की तरह बनना चाहते थे. ये दौर-ए-प्रोपेगेंडा है यहां कुछ भी हो सकता है.

ऐसे नाज़ुक समय में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) के प्रगतिशील छात्रों ने जब “गाँव छोड़ब नाही जंगल छोड़ब नाही” जैसे जनवादी गीत के साथ भगत सिंह का जन्मदिन मनाया तो सच में महफ़िल जोशीली हो गई होगी.
छात्रों ने कार्यक्रम का जो विवरण हमें भेजा है उससे इस अँधेरे दौर में रौशनी की उम्मीद को बल मिलता है.

कार्यक्रम के प्रारंभ में मंच का संचालन करते हुए शुभम जायसवाल ने कहा- “जब तक व्यक्ति जिंदा रहता है तब तक उसकी प्रासंगिकता बनी रहती है जब वह मर जाता है तो उसकी स्मृतियों और विचारों में उसकी प्रासंगिकता बनी रहती है और जब उनके विचारों को हम जीते है तब सच मे उनकी प्रासंगिकता सिद्ध होती है” और शुभम ने भगत सिंह के सपनों के भारत के विचार को रखा.

कार्यक्रम की शुरुआत “भगत सिंह तू जिंदा है” गाने के साथ तुषार और उसकी टीम के सदस्य विशाल, आकाश, किशन, शिवानी और रुचि ने की. भगत सिंह का संक्षिप्त परिचय देते हुए प्रेम ने कार्यक्रम की अगली कड़ी पेश की , अनिल यादव ने भगत सिंह और आज की पत्रकारिता पे अपनी बात रखी.
अश्वजित ने आगे का मंच संचालन भगत सिंह के कोड में “मैं इश्क लिखना चाहूँ भी तो इंकलाब लिख जाता हूँ ” से की. चेतन वर्मा द्वारा एक नाटक “भगत सिंह और वर्तमान” की प्रस्तुति देते हुए यह दिखाने का प्रयास किया गया कि वर्तमान में नेता वोट बैंक के लिए जनता को कैसे मूर्ख बनाते हैं.
शोधकर्ता गजेंद्र द्वारा बासुरी वादन की प्रस्तुति दी गई “बात सुनो भाई” कविता और “मेंरा मुल्क मेरा देश मेरा ये वतन” गीत की प्रस्तुति दी गई. कानुप्रिया मानिक अपने विचार रखते हुए कहती है कि “लोग ऐसे अनुकूलता में है जहाँ से वे बाहर निकलना ही नही चाहते और आसपास जो कुछ भी हो रहा उन्हें वो नही दिख रहा है.

“गाँव छोड़ब नही जंगल छोड़ब नही” गीत की प्रस्तुति बापू और उसकी टीम ने की जिससे उन्होंने यह दर्शाने का प्रयास किया कि किस तरह वर्तमान सत्ता आदिवासी जान समुदाय को अपने शोषण काशिकार बना रही है. अजय ने “तुम मुझसे हाल-ए-दिल न पूछो दोस्त” कविता की प्रस्तुति दी.
रविचंद्र ने अपनी बात रखी जिसमे उन्होंने कीर्ति जो भगत सिंह का लेख है लोगो को पढ़ने का आग्रह किया.

पंकज वेला ने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किए जा रहे शोषण पर अपनी बात रखी. रमेश सिद्धार्थ द्वारा दलितों पर होने वाली हिंसा पर अपनी बात रखी, तुषार और उसकी टीम ने मोबलिंचिंग जैसे विषय पर नाटक प्रस्तुत की. कार्यक्रम की अगली कड़ी में “उन्हें यह फिक्र है हरदम” , “मिटा देंगे जुल्म की हस्ती यही पैगाम है मेरा”, “युग परिवर्तन की बेला में हम सब मिल कर काम करे”, “है नमन कोटि जिनके सामने बौना हिमालय” , “हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए” जैसी सुंदर कविताओं की प्रस्तुति दी गई.

कार्यक्रम की अंतिम कड़ी में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए पलाश किशन ने पूँजीवाद जैसे विषय मे बात करते हुए कार्यक्रम का समापन किया.
कार्यक्रम का संयोजन पलाश किशन, शुभम जैसवाल, ने किया तथा उपस्थित लोगों में तुषार सूर्यवंशी, विशाल वानखेड़े, किशन पाटिल, बापू चौहान, डिसेंट साहू, अनिल यादव, सुधीर कुमार, कान्हा पाठक, कुमुद ऋषभ, पवन सहज, अनिल, रुचि पांडे, अजय गौतम, रोहित तिवारी, महेंद्र जायसवाल, सुरेंद्र जायसवाल, सुयज्ञ राय, जयवीर, देश दीपक भास्कर, पीयूष, पुष्पेंद्र सिंह आदि सहित सैकड़ों की तादाद में लोग उपस्थित रहे।

इस जानकारी का संकलन शिवानी अग्रवाल ने किया और सीजीबास्केट तक इसे पहुंचाया साथी चंदन सरोज ने

Anuj Shrivastava

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