बिलासपुर ःः सरकार, अफसर के लिए ये बच्चें “उनके बच्चे” होंगे लेकिन ये बच्चें आज भी “हमारे बच्चें” है. ःः महेंद्र दुबे ,अधिवक्ता .

“हमारे बच्चे” और “उनके” बच्चे! ः

1.02.2019/ बिलासपुर 

छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान, बिलासपुर (सिम्स) में 21 जनवरी को आग लगी! आग ने नियो नटाल इंटेंसिव केयर यूनिट के मेडिकली एक्विपेटेड पालने में किलकते 22 नवजात शिशुओं को अपनी चपेट में ले लिया! कड़ाके की ठंड में सिम्स में उठी आग की लपटों ने जिला प्रशासन और चिकित्सा अमले की नींद में खलल डाल दिया! अगले ही दिन सभी बाईस नवजात निजी अस्पतालों में भर्ती करा दिए गये! 23 तारीख को स्वास्थ्य मंत्री ने सिम्स का दौरा किया और सिम्स प्रशासन को बच्चों की चिकित्सा हेतु आवश्यक निर्देश दिये! कलेक्टर बिलासपुर ने आगजनी पर जांच भी बिठा दी! इस बीच अन्य मंत्री और विधायक भी सिम्स और निजी अस्पतालों में व्यवस्था देखने जाते रहे! स्वास्थ्य मंत्री और अन्य मंत्री विधायक के विजिट के दौरान ढेरों कांग्रेसी कार्यकर्ता भी अपने अपने नेताओं के साथ सिम्स और निजी अस्पतालों में हाजिरी बजा आये थे! अखबार में ये भी खबर थी कि कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा नवजात के परिजनों को आपस में चन्दा करके पांच हजार रुपये दिया गया है! सिम्स एनआईसीयू मे लगी आग से उठा धुआं बच्चों के फेफड़ों में भरने की वजह से प्रभवित 22 बच्चों में से अब तक आज दिनांक तक पांच माँओं की गोद सूनी हो चुकी है जबकि 17 शिशुओं का इलाज अभी भी शहर के महादेव हॉस्पिटल, डॉ. सिहारे हॉस्पिटल, अपोलो और शिशु भवन में चल रहा है जिनकी स्थिति अभी भी क्रिटिकल बनी हुई है!

बच्चें हमारे थे लिहाजा”हमारे बच्चों” की मौत से आहत स्वास्थ्य मंत्री ने राजधानी से आकर स्वास्थ्य विभाग और सिम्स प्रबंधन को दो टूक कह दिया था कि “ऐसे नहीं चलेगा, व्यवस्था सुधारिये” और सरकारी खर्च पर बच्चों के समुचित इलाज का एलान भी किया था, “अन्य मंत्री और विधायक भी “हमारे बच्चों” की मौत के दुख में सिम्स और निजी अस्पताल जा कर सब कुछ सही करने की हिदायत दे आये थे! कलेक्टर महोदय ने “हमारे बच्चों” की मौत के लिए जिम्मेदार आदमी और वजह जानने के लिए जांच बिठा दी है, हमारे बच्चों” की मौत से व्यथित कांग्रेसी कार्यकर्ता और समर्थक भी मंत्री और विधायकों के साथ सिम्स और निजी अस्पतालों में जाकर लौट आयें है और अपने अपने नेताओं के दुख भरे बयान और दौरे की तस्वीरें सोशल मीडिया में सर्कुलेट करके अपने अपने आकाओं को जनपक्षीय और संवेदनशील जननेता घोषित करके से फारिग हो चुके है!

अल्पावधि में पांच बच्चों की मौत को अभी मुश्किल से एक सफ्ताह ही बीता है और गहमागहमी लगभग खत्म हो चुकी है! स्थानीय अखबार और चैनल सिम्स की अव्यवस्था और बच्चों की मौत का निजी अस्पतालों और सिम्स द्वारा बताये जा रहे अलग अलग कारणों का तफ़सरा कर रहे है और इधर बाकी 17 बच्चों के परिजन निजी अस्पतालों में मौत से जूझ रहे अपने नौनिहालों की जिंदगी की उम्मीद में एनआईसीयू के बाहर ठंड और भय से जूझ रहे है! स्वास्थ्य मंत्री के हस्तक्षेप और जिला प्रशासन की पहल पर बच्चों का इलाज सरकार के खर्चे पर हो रहा है! खामोशी और निश्चिंतता का आलम ये है कि सब कुछ दुरुस्त हो चुका है, मंत्री विधायक अपने रूटीन कार्यक्रमों में व्यस्त हो गये है और कार्यकर्तागण व्वाट्स अप ग्रुपो में नई सरकार और पार्टी जिंदाबाद में व्यस्त हो गये है। फर्क सिर्फ इतना पड़ा है कि अब बच्चें “हमारे बच्चे” से “उनके बच्चे” हो चुके है। जब तक बच्चें हमारे थे, मंत्री संतरी, पार्टी सार्टी, कार्यकर्ता समर्थक, सत्ता विपक्ष सब दौड़ रहे थे मगर जैसे ही मंत्री विधायक रूटीन काम में लौटे बच्चे अपनी अपनी मां के हो गये!

मेरे सहयोगी साथी सिम्स और सिम्स के बाद चारों निजी अस्पताल में लगातार जा रहे है, मरने वाले बच्चों के परिजन के संपर्क और पते लेकर रखे हुए है ताकि उन्हें क्षतिपूर्ति राशि और सहायता सरकारी योजनाओं के तहत दिलाया जा सके! 17 बच्चें जो अभी भी भर्ती है, उनसे तकरीबन हमारी टीम रोज मिल रही है, उनकी जरूरी मदद कर रही है! बच्चों की लाश लेकर अपने घर लौट चुके और निजी अस्पतालों में अभी तक भर्ती बच्चों का इलाज करा रहे परिवार अत्यंत गरीब परिवार से है, किसी बच्चे के माता पिता मजदूर है, कोई रिक्शा चालक है, कोई कोई जोत का किसान है तो कोई रेवड़ी खोमचे लगाने वाला है। उनकी हालत ऐसी भी नहीं है कि अस्पताल में बच्चे की मां के साथ रुके बाप या अन्य रिश्तेदारों के लिए कम से कम सौ रुपये रोज खाने का खर्च वहन कर सके! हमने अपने मित्रों और सहयोगियों से रकम इकठ्ठा करके उनके खाने का खर्च जैसे तैसे दिया हुआ है मगर अस्पतालों में घबराए बच्चों के माता पिता की अब कोई खोज खबर नहीं लेता है, स्वास्थ्य मंत्री के साथ फोटो खिंचा आये कार्यकर्ता उसके बाद वहां झांकने तक नहीं गये है, मंत्री विधायक सब नदारत है, शहर के छपास सामाजिक कार्यकर्ता सोशल मीडिया में सरकार को सलाह दे रहे है, परिजनों को अस्पताल प्रबंधन कोई जानकारी देता नहीं है, चिकित्सा अमले के अधिकारी फोन उठाते नहीं है, न कोई बुलेटिन जारी होती है और न कोई व्यवस्था देखने जाता है।

जब तक मंत्री विधायक का आगमन होता रहा बच्चें हमारे थे मगर अब उनके हो चुके है! लेकिन हम बच्चों को मरता नही छोड़ सकते है, हम रोज अस्पताल जा रहे है, बच्चों के माता पिता से मिल रहे है, उन्हें हर सम्भव मदद कर रहे है, सरकार, अफसर के लिए ये बच्चें “उनके बच्चे” होंगे लेकिन ये बच्चें आज भी “हमारे बच्चें” है और ऐसा हर बच्चा हमेशा हमारा होगा! बिलासपुर के मददगारों से हम आग्रह करते है कि घरों से निकल कर इन बच्चों तक जायें, इनके माता पिता से मिले, इनकी मदद करें, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन पर दबाव बनाये, निजी अस्पतालों की व्यवस्था पर नजर रखे, ये अखबार में छपने वाले नम्बर नहीं है, ये बच्चे हमारे बच्चे है, इन्हें अपना समझिये और बचाइए इन्हें!

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महेंद्र दुबे, अधिवक्ता

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