दूधनाथ सिंह : बंद मुट्ठी से रेत की मानिंद खिसक गयी जिंदगी.

13.01.2019

साहित्यकार दूधनाथ सिंह का 11 जनवरी की आधी रात को निधन हो गया । वे 81 वर्ष के थे । वे अपने पीछे दो बेटे , एक बेटी और उनका भरा पूरा परिवार छोड़ गये हैं । उनकी पत्नी निर्मला ठाकुर का आज से दो साल पहले स्वर्गवास हो गया था । पत्नी की मृत्यु के बाद वे गुमसुम से रहने लगे थे । बीते साल के माह अक्टूबर में जांच के दौरान एम्स ने उनके प्रास्टेट कैंसर होने की पुष्टि की थी । उनका इलाज चल रहा था । 26 दिसम्बर को उनको इलाहाबाद के घर झूंसी लाया गया । यहां आने पर उनकी तबियत फिर खराब हुई । इस बार उन्हें इलाहाबाद के फिनिक्स हाॅस्पिटल में दाखिल कराया गया , जहां उन्हें मैसिव हार्ट अटैक आया । वेन्टीलेटर पर रखा गया । लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका । वे पंचतत्व में विलीन हो गए ।

दूधनाथ सिंह का जन्म 13 अक्टूबर 1936 को बलिया जनपद के सोबंथा गांव में हुआ था । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव जवार में हीं हुई थी । वे बी ए तक भी यहीं से पढ़े थे। फिर उन्होंनों एम ए की पढाई इलाहाबाद विश्व विद्यालय से की । पढ़ाई के उपरांत वे इसी विश्व विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गये । 1994 में वे सेवा निवृत हुए थे । फिर इलाहाबाद में हीं वे सेटल हो गए थे । उन्होंने झूंसी में अपना निवास बना लिया था । सेवानिवृति के बाद वे सामाजिक कार्यों में रूचि लेने लगे थे। पत्नी की मृत्यु के बाद वे अन्यमनस्क हो उठे थे । निर्मला ठाकुर से उनका प्रेम विवाह हुआ था । दोनों परिवारों में काफी क्लेश हुआ था । निर्मला ठाकुर भी एक जानी मानी कवयित्री थीं । इस शादी से दो बेटा व एक बेटी हुए थे । वाम पंथी दूधनाथ सिंह ने अपने बच्चों को अपना सरनेम न देकर निर्मला ठाकुर का सरनेम दिया था । उनके बेटे बेटी अपने नाम के साथ ठाकुर टाईटिल लगाते हैं ।

उनके एक बेटे की शादी साहित्यकार काशीनाथ सिंह की बेटी से हुई थी । बेटा आई आई टी में सेलेक्ट हो गया था । दूधनाथ सिंह के पास काशीनाथ सिंह अपने बेटी का रिश्ता लेकर पहुंचे थे । दूधनाथ सिंह यारों के यार थे । उन्होंने यह रिश्ता सहर्ष स्वीकार कर लिया । काशीनाथ सिंह ने अपने संस्मरण ” काशी के साढ़े चार यार ” में इस घटना का जिक्र किया है । काशी के साढ़े चार यार में स्वयं काशीनाथ सिंह , रवींद्र कालिया , ज्ञान रंजन , दूधनाथ सिंह और विजयमोहन आते हैं । विजयमोहन को उन्होंने आधा यार हीं माना है । बाकी चारों कहानीकार हैं । विजयमोहन कहानीकार के साथ आलोचक भी थे । आलोचक किसी का यार नहीं होता । वह आधा यार भी हो गया तो यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि कही जाएगी । दूधनाथ सिंह को पूरी जिंदगी यह मलाल रहा कि काशीनाथ सिंह ने इस संस्मरण में ज्यादातर उनके प्रति विषवमन हीं किया है ।

दूधनाथ सिंह की अंतिम कृतियां “आखिरी कलाम ” और ” लौट आ ओ धार ” थीं । सपाट चेहरे वाला आदमी , यम गाथा और धर्म क्षेत्रे कुरू क्षेत्रे आदि उनकी कालजयी रचनाएं थीं । उन्होंने कविताएं भी लिखीं थीं । उन्होंने एक लम्बी कविता “सुरंग से लौटते हुए” लिखी थी । इसके अतिरिक्त अन्य काव्य ग्रंथ -“एक और भी आदमी है “, “अगली शताब्दी के नाम “, “युवा खूश्बू” हैं । दूधनाथ सिंह ने महाप्राण निराला पर ” निराला -आत्म हंता आस्था ” , महादेवी वर्मा पर” महादेवी ” और मुक्ति बोध पर ” मुक्तिबोध – साहित्य में नई प्रवृतियां ” जैसे आलोचनात्मक साहित्य भी लिखे थे । उन्होंने जयशंकर प्रसाद व सुमित्रा नंदन पंत पर कुछ नहीं लिखा । इस सम्बंध में मेरी उनसे बात हुई थी । साल 2013 था । फोन पहली बार मिस काॅल गयी थी । दूसरी बार उन्होंने स्वंय फोन किया । उन्होंने जवाब दिया था – ” अब मैं 77 का हो चुका हूं । लिखना मेरे वश की बात नहीं रही । अगली पौध इन पर लिखेगी ।”

आज दूधनाथ सिंह इस दुनियां में नहीं है , पर उनकी रचनाएं अपने पूरे दम खम के साथ हमारे पास हैं । उनकी रचनाएं हमेशा उन्हें जिंदा रखेंगी । दूधनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का सर्वोच्च भारत भारती और मध्य प्रदेश का मैथिली शरण गुप्त शिखर सम्मान प्रदान किया गया था ।

मेरी तरफ से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि !

एस डी ओझ

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