डॉ भीमराव अंबेडकर के 128 वीं जयंती :    जाति उन्मूलन के बिना सच्ची आज़ादी नहीं : तुहिन

15.04.2019


डॉ भीमराव अंबेडकर के 128 वीं जयंती के अवसर पर 14 अप्रैल को सतनामी समाज तहसील परिक्षेत्र राजिम के नेतृत्व में “बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर के विचार और जाति उन्मूलन आंदोलन की जरूरत” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता तुहिन सदस्य राष्ट्रीय समन्वय परिषद, जाति उन्मूलन आंदोलन थे एवं अध्यक्षता मुन्ना कुर्रे ने किया ।

मुख्य अतिथि के रूप में डॉ अमन हुमने, डॉ स्नेहलता हुमने, विशिष्ट अतिथि डॉ हिरौन्दिया, आनंद मतावाले गुरुजी, तेजराम विद्रोही, अंजू मेश्राम, टिकेश्वर मेश्राम, पुनुराम देशलहरे, गोपीचंद बनर्जी, नंदकुमार सक्सेना, जुगनुदास मन्नाडे, कांशीराम मांडले, कोमल डीडी, रेखा वंजारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन भागचंद चतुर्वेदी ने किया तथा आभार टिकेश्वर बंजारे ने व्यक्त किया। मुख्य वक्ता तुहिन ने कहा कि बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर सिर्फ भारतीय संविधान के रचयिता ही नहीं थे बल्कि वे हमारे समाज की आर्थिक, सामाजिक प्रगति में बाधक हिंसक जाति व्यवस्था की उन्मूलन के लिए पहल की और कैसे जाति व्यवस्था को उखाड़ा जाये इस पर मार्गदर्शन दिया। बाबा साहब ने जाति तोड़ो- समाज जोड़ो के साथ उद्योगों व भूमि के राष्ट्रीय करण का का आह्वान किया।

इससे यह बात साफ है कि वे समता, शांति और बंधुत्व के साथ साथ समाजवाद के पक्ष में भी थे। आज बाबा साहब द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र संघी कारपोरेट फाँसीवादी ताकतों के चौतरफा हमले से भीषण खतरे में है। हमें कट्टर हिंदुत्व के आक्रामक दौर में अम्बेडकर का पुनर्पाठ करना चाहिए। आज देश भर में दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों व तमाम मेहनतकशों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में कॉरपोरेट मनुवादी ताकतों का भीषण हमला हो रहा है। ये विचारों की आजादी को अंधराष्ट्रवाद और युद्धउन्माद के जुमलों के नीचे कुचलने का प्रयास कर रहे हैं। रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या हमें यह बताती है कि भारतीय शैक्षणिक परिसरों में कैसे भीषण जातिवाद हावी है। इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि जातियों के उन्मूलन के बिना भारत के लिए कोई परिवर्तनकामी भविष्य नहीं है।

जाति के उन्मूलन के बिना हम सच्ची आजादी हासिल नहीं कर सकते। इस अर्थ मेंजाति का उन्मूलन भारतीय क्रांति का अभिन्न अंग है और इसके लिए हमें ब्राह्मणवाद का हमारे जीवन और संस्कृति के क्षेत्र में पुरजोर विरोध करना पड़ेगा और यह संघी कॉरपोरेट फासीवादियों के खिलाफ लड़ाई का परचम बुलंद करने और बाबा साहब अम्बेडकर व शहीदे आजम भगतसिंह के पथ पर चलकर ही हम कर सकते हैं। अनिवार्यतः यह कम्युनिस्ट आंदोलन और दलित आंदोलन को एक साथ लाने की मांग करता है और इस तरह ही हम शहीदों के सपनों का भारत एक शोषणहीन, समतावादी भारत का निर्माण कर सकते हैं।

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