जातिवाद भेदभाव के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा.

दलित बहुजन और आदिवासी अधिकारों के लिए डिग्री प्रसाद चौहान ने बुलंद आवाज उठाई है । इसकी गूंज वंचित समुदाय के उत्थान की दिशा में सकारात्क नतीजे ला रही है .

आज भी कोई जीत हासिल करता है तो बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि उसने ‘ डिग्री हासिल कर ली है । जब मेरा जन्म हुआ तो यह मेरे परिवार के लिए बड़े जश्न की बात थी । मेरी दादी ने पहली बार मुझे डिग्री कहकर बुलाया था । यह शब्द सभी के दिमाग में बैठ गया । मेरे नाम के पीछे यही कहानी है । यह कहना है 39 वर्षीय डिग्री प्रसाद चौहान का जो छत्तीसगढ़ में दलित , बहुजन और आदिवासी अधिकारों और मानवाधिकारों के पैरोकार हैं ।

चौहान रायगढ़ में रहकर मूलभूत अधिकारों से वंचित सीमांत समुदाय के लिए काम कर रहे हैं । इन वजह से वे कई बार सरकारी और गैर – सरकारी स्तर पर निशाना भी बने हैं । पिछले वर्ष अगस्त में पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय महासचिव सुधा भारद्वाज का कथित तौर पर लिखा गया एक पत्र सामने आया था , जिसमें दूसरे लोगों के साथ उनका नाम भी शामिल था .

‘ कामरेड डिग्री प्रसाद चौहान , जिन्हें मैंने आंतरिक हिस्सों में भेजा था . . . अपना ऑपरेशन पूरा कर . . . लौट आए हैं ।

यह पत्र दलित और सवर्ण पेशवाओं के बीच 2018 में हुई भीमा – कोरेगांव हिंसा में शामिल होने की ओर इशारा कर रहा था । बाद में सुधा भारद्वाज ने अपने वकील के माध्यम से इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया । वर्ष 2013 में एक स्थानीय महिला से कथित बलात्कार और हत्या की जांच करने के दौरान पुलिस ने चौहान को देर रात एक रेलवे स्टेशन के पास रोका और उन पर ‘ नक्सल ‘ साहित्य रखने के आरोप लगाए । चौहान बताते हैं कि पुलिस को उनके पास से कुछ नहीं मिला और कोई मामला दर्ज न हो सका । वे बताते हैं । कि वर्ष 2015 में स्थानीय पुलिस ने आरोप लगाया कि वे नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं । वे कहते हैं , ‘ इस मामले में भी न तो मुझे गिरफ्तार किया गया और न ही मेरे खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज की गई । मुझसे कहा गया कि अपना काम रोक दें । ‘

जातिगत अन्याय के प्रति चौहान का संघर्ष वर्ष


2002 में शुरू हुआ था । वे उस वक्त 22 साल के थे । बारडोली गांव में एक धार्मिक उत्सव था और इसमें आसपास के 13 गांवों के लोग शामिल हुए थे । चौहान बताते हैं कि हर कोई इस उत्सव को सफल बनाने में जुटा था लेकिन सवर्णो ने दलितों के साथ पूजा करने से इंकार कर दिया था । चौहान को यह बात बुरी लगी कि वे भले ही कितना पढ़ – लिख लें , वे कभी समकक्ष दर्जा हासिल नहीं कर सकते । वे बताते हैं कि यहीं से उनके भीतर एक नए इंसान ने जन्म लिया । चौहान अस्पृश्यता के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि दलितों को उनके मोहल्ले , विद्यालयों व खेल के मैदानों में अलग रखा जाता था । अध्यापक दंड देते समय भी उहें । अपने हाथों से नहीं छूते थे , उन्हें स्केल से ही मारते थे । उन्हें इस असमानता पर काफी पीड़ा होती थी । वे बताते हैं कि समाज में उनकी स्वीकार्यता की जरूरत थी । दलित भाई – बहनों के लिए कुछ किया जाना जरूरी था ।

जाति अधारित हिंसा की खबरें आम हैं , जहां स्थानीय प्रशासन के सहयोग से खनन कंपनियां जमीनें हड़प लेती हैं । आदिवासी महिलाओं और बच्चों की नियमित रूप से तस्करी होती है , बलात्कार , हत्या , धोखाधड़ी , उत्पीड़न , निर्दयता और बहिष्कार की घटनाएं आम हैं ।

अवसरों की समानता नहीं होने की वजह से असंतोष बढ़ता है । सीमांत लोग अक्सर प्रशासन की नीतियों और गैरकानूनी नक्सलियों के बीच अपनेआप को फंसा हुआ पाते हैं । चौहान ने वकालत की पढ़ाई की है , लेकिन उन्हें छत्तीसगढ़ की बार काउंसिल में पंजीकरण से रोक दिया गया था । हालांकि उन्होंने अभी तक वकालत की प्रैक्टिस नहीं की , लेकिन उन्होंने अन्याय से संबंधित 200 मामलों को सूचीबद्ध करने में मदद की है । वे वर्तमान में यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि दलितों और आदिवासियों को उनकी भूमि से वंचित करना अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति ( अत्याचार की रोकथाम ) अधिनियम के तहत अपराध है । साथ ही वे छत्तीसगढ़ , ओडिसा और झारखंड में मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी के मुद्दों पर भी काम कर रहे हैं ।

{ रीडर्स डाइजेस्ट के साथ विशेष अनुबंध के तहत अनूदित और प्रकाशित}

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