छत्तीसगढ़ी फिल्म के जनक मनु नायक को पदम श्री के लिये सरकार करेगी केन्द्र को सिफारिश . भूपेश बघेल .

अपना मोर्चे से साभार ..

रायपुर / गुरूघासीदास सेवादार संघ के अध्यक्ष लखन कुर्रे सुबोध की अगुवाई में शनिवार को सामाजिक कार्यकर्ता डा. लाखन सिंह, फिल्मकार अनुज श्रीवास्तव, अशोक ताम्रकार और पत्रकार राजकुमार सोनी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात कर छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जनक मनु नायक को पद्मश्री देने की मांग की. इस मौके पर विशेष रुप से  फिल्मकार मनु नायक भी मौजूद थे. मुख्यमंत्री ने उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और विस्तारपूर्वक चर्चा की. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे स्वयं मनु नायक जी के प्रशंसक है और फिल्मी दुनिया में उनके संघर्ष और साहसपूर्ण काम से परिचित है.

प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को अवगत कराया कि भाजपा के शासनकाल में भी मनु नायक को पद्मश्री देने की मांग उठी थीं, लेकिन तब कई ऐसे नामों पर विचार किया गया जिन्हें लेकर आज तक सवाल उठ रहे हैं. पूर्ववर्ती सरकार में दो-चार योग्य लोग ही पद्मश्री काबिल थे, लेकिन ऐसे-ऐसे लोग पद्मश्री पाने में सफल हो गए है कि पद्मश्री का मजाक उड़ने लगा. . छत्तीसगढ़ के बहुत से पद्मश्री अब छद्मश्री की उपाधि से भी नवाजे जाते हैं. प्रतिनिधिमंडल की बातों से अवगत होने के बाद मुख्यमंत्री ने भारत शासन को मनु नायक का नाम प्रस्तावित करने एवं पत्र लिखने का निर्देश दिया.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में जन्मे मनु नायक ने वर्ष 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेश का निर्माण किया था. उन्हें इस फिल्म के निर्माण में काफी कठिनाइयों को सामना करना पड़ा था. छुआछुत, ऊंच-नीच और भेदभाव जैसे विषय पर फिल्म बनाना कोई सरल काम नहीं था. जब फिल्म रीलिज हुई तब एक समुदाय विशेष ने जगह-जगह विरोध जताया. कई जगह पोस्टर फाड़े गए और कुछ छबिगृहों में फिल्म को प्रदर्शित ही नहीं होने दिया गया. एक समुदाय विशेष के लोग जब विरोध करने दिल्ली पहुंचे तब तात्कालिक सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने विज्ञान भवन में फिल्म का विशेष शो देखा. इस फिल्म को देखने के बाद श्रीमती गांधी ने इसे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने वाली बेहतर फिल्म बताया था.

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद नुक्कड़ स्टूडियो में सीजी बास्केट के लिए मनु नायक का एक विशेष इंटरव्यूह भी रिकार्ड किया गया. लगभग आधे घंटे की बातचीत में मनु नायक ने कई विषयों पर चर्चा की. उन्होंने छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों से आग्रह किया कि अगर वे सच में नवा छत्तीसगढ़ गढ़ना चाहते हैं तो उन्हें यहां रीति-रिवाज, परम्परा और समस्याओं को वैज्ञानिक ढंग से अपनी फिल्म में जगह देनी चाहिए. एक नवा छत्तीसगढ़ तब ही बन सकता है जब सांस्कृतिक चेतना को संपन्न करने वाली फिल्मों का निर्माण होगा और यह तभी संभव है जब फिल्मकार केवल मनोरंजन और पैसा कमाने को ही अपना ध्येय नहीं मानेंगे.

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