गलती केवल फातमी जी की नहीं ,पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का एक अनुभव : सीमा आजा़द

7.04.2019

पिछले दिनों राजेन्द्र कुमार जी के 75 पार के जश्न में इलाहाबाद विवि उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो अली अहमद फातमी की एक महिला विरोधी अभद्र टिप्पणी के खिलाफ मैंने विरोध जताया और देश भर से इसके लिए समर्थन भी मिला, लेकिन इलाहाबाद के अन्दर इसे लेकर राजनीति के जिस अनुभव से मैं गुजरी, वह दुखद तो है ही, वह इस बात को स्पष्ट भी कर देता है कि उस रोज फातमी जी के महिला विरोधी वक्तव्य पर ठहाकों की आवाज कहां से आ रही थी। वास्तव में यह एक अट्टहास था, जो साहित्य की दुनिया के महिला विरोधी होने की मुनादी कर रहा था। मैं इस अनुभव को काफी सोच-समझ कर आप सभी लोगों से साझा करना चाहती हूं। लेकिन इसे बयान करने का मेरा मकसद प्रगतिशीलों, साहित्यकारों के बीच मौजूद पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति को चिन्हित करना है और कुछ नहीं।

मैं इस पोस्ट के बाद अपने पर होने वाले हमलों और छिपा बहिस्कार झेलने का खतरा मोल लेते हुए ऐसा कर रही हूं। इस उम्मीद के साथ कि यहां सब ऐसे नहीं है और यह मेरे अलावा भी बहुतों की लड़ाई है।
31 मार्च को इलाहाबाद में हुए इस आयोजन के बाद मैंने फेसबुक पर लिखा कि.

 

’मैं उस हंसी में शामिल नहीं थी

आज इलाहाबाद में हम सबके प्यारे राजेन्द्र कुमार जी के 75 वर्ष पार करने का जश्न मनाया गया। वे इतने प्यारे इंसान हैं कि हम सबके पास उन पर कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं। लेकिन आज के जश्न में कुछ ऐसी बातें भी कहीं गयीं, जिसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी और जो नहीं होनी चाहिए थी। राजेन्द्र कुमार जी की सादगी पर बात रखते हुए इलाहाबाद विवि में उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो अली अहमद फातमी ने मज़ा लेते हुए कहा कि राजेन्द्र जी के पास एक ही सदरी है, जिससे वे सालों से काम चला रहे हैं, और तो और वे सालों से एक ही बीबी से काम चला रहे हैं।’’
इस बेहद अभद्र, अश्लील और पितृसत्तात्मक बात पर पूरे हॉल में हंसी के ठहाके फूट पड़े, लोगों ने तालियों से फातमी साब की बात का स्वागत किया। मैं गुस्से से भर उठी। इससे आगे भी वे बिना रूके अपनी अभद्र और महिला विरोधी बातें बोलते रहे और लोग हंसते रहे। उनका यह लिखित भाषण खत्म होने पर लोगों ने वाह-वाह किया और मेरे पीछे बैठी महिला ने कहा कि ‘फातमी साब हमेशा अच्छा बोलते हैं।’ जबकि मेरा मानना है कि वे अपनी बहुत ही खूबसूरत और कलात्मक भाषा में हमेशा महिला विरोधी बात ही बोलते हैं। मुझे लगा कि संचालक साथी और आयोजकों में से कोई उनकी बात पर अपनी टिप्पणी रखेेगा या मंच पर बैठी एक महिला वक्ता इस पर आपत्ति दर्ज करायेंगी, लेकिन इसमें से कुछ भी नहीं हुआ। मैं बहुत आहत महसूस कर रही थी, पर सोच रही थी कि मेरा बीच में आपत्ति दर्ज कराना कार्यक्रम में अनावश्यक दखल माना जायेगा, इसलिए चुप रही। बाहर खड़े कुछ लोगों से मैंने अपनी बात कहकर आपत्ति दर्ज कराई पर ये पर्याप्त नहीं था। क्योंकि फातमी साब ने ऐसा पहली बार नहीं किया था, वे अक्सर अपने वक्तव्यों में ऐसे महिला विरोधी और फूहड़ किस्म में मजाक करते रहते हैं। वे हमसे काफी सीनियर है करीबी परिचय भी नहीं, इसलिए बहुत खुलकर तो नहीं, पर काफी हल्के से मैंने आपत्ति भी जताई है, मेरे सामने ही और लोगों ने भी जताई है, लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो इसलिए क्योंकि उन्हें सार्वजनिक मंच पर जहां वे ऐसी बातें बोल जाते हैं, किसी ने नहीं टोका। और तो और उन्होंने बताया कि उनका आज का वक्तव्य ‘समकालीन जनमत’ में प्रकाशित होने जा रहा है। यह और भी खीझ और चिन्ता का विषय है।

यह सब सोचते हुए भी चुप रहकर घर आयी तो देखा कि फोन पर एक छात्र का सन्देश था-‘‘ आपको नहीं लगता दीदी कि फातमी सर की बात बहुत पितृसत्तात्मक थी, वह किसी साहित्यकार की भाषा तो थी ही नहीं…..और बाकी साहित्यकार उनकी बात पर ताली पीट रहे थे ठहाके लगा रहे थे……क्या ऐसे ही होते हैं ये लोग?’’

इसे पढ़कर मुझे लगा कि चुप रहकर मैंने गलती की, और मुझे जरूरी लगा कि कम से यहां इस सार्वजनिक मंच से विरोध दर्ज कराकर बता सकूं कि मैं उस ठहाके मंे शामिल नहीं थी। यह विरोध केवल फातमी साब के लिए नहीं है बल्कि उस पूरे माहौल के लिए है, जो महिलाओं को सदरी से ज्यादा कुछ नहीं समझता, जहां महिलाओं का मजाक उड़ाने वाले चुटकुले ग्राह्य होते हैं।

नोट– कृपया मेरे इस विरोध को अली अहमद फातमी के विरोधी अपने पक्ष में इस्तेमाल न करें, क्योंकि खुद उनकी मानसिकता भी कमाबेश ऐसी ही है।‘’
इस आपत्ति पर देश भर के लोगों ने समर्थन दिया, और इलाहाबाद के बाहर के साहित्यकार, जो कि इस आयोजन में मौजूद थे और मेरे फेसबुक मित्र हैं, ने भी कहा कि ‘फातमी जी का यह बयान उन्हें भी घटिया लगा था, इसके अलावा भी उन्होंने अपने पढ़े गये वक्तव्य में बहुत सारी अशोभनीय और महिला विरोधी बातें कहीं है, जिसकी चर्चा हमने भी आपस में की थी।’ उन सबके इन बयानों को मेरी फेसबुक वॉल पर पढ़ा जा सकता है। कुछ लोगों ने यह भी उचित ही कहा कि ‘आपको वहीं पर आपत्ति करनी चाहिए थी, चुप नहीं बैठना चाहिए था।’ मुझे भी वहां ऐसा करने का बहुत मन हुआ, लेकिन कुछ ही महीने पहले के एक ऐसे अनुभव ने मुझे वहां ऐसा करने से रोक दिया। मैंने टिप्पणी में इसे साझा किया-

‘’यह सही है कि आपत्ति वहीं करनी चाहिए थी, लेकिन कुछ महीने पहले मैंने समानांतर के एक नाटक के बाद मंच पर जाकर आपत्ति जताई कि यह नाटक सांप्रदायिक है तो वहां मौजूद नाटक के आयोजकों ने मेरी बात से ज्यादा इस बात का विरोध किया कि ये बात मैंने यही पर क्यों कह दी, इससे नाटक का असर कम हो गया। मैंने कहा मैंने इसीलिए तो यह बात कही है लेकिन वे लोग मुझसे नाराज़ हो गए भौमिक दादा ने कुछ भी नहीं कहकर अपनी बात कह दी जबकि इसके बाद मैंने इस मसले पर उनसे उनकी राय जाननी चाही। उसके बाद बहुत से लोगो के मेरे पास फोन आए कि आपने सही आपत्ति की, लेकिन किसी ने सामने आकर यह बात नहीं कही। उस घटना के कारण इस बार मैं वहीं आपत्ति दर्ज कराने में झिझक गई। वैसे यह काम मुख्य रूप से संचालक और आयोजकों का होता है। इन कारणों से मैंने ये मंच चुना, यहां इस महिला विरोधी वक्तव्य और माहौल की मुखालफत को समर्थन करने के लिए आप सब का शुक्रिया। माहौल ऐसे ही बदलेगा। हम जहां भी बोल सकते हैं बोलेंगे।‘’

इस विरोध से हंगामा मचने के बाद मेरे पास पहला फोन प्रलेस के संजय श्रीवास्तव का आया, जिन्होंने मेरे विरोध को समर्थन दिया, मुझे यह अच्छा भी लगा। मैंने उनसे बात की कि इस आयोजन में तो प्रलेस भी शामिल था, लेकिन उन्होंने वहां पर आपत्ति नहीं की यह ठीक नहीं है। उन्होंने बताया कि ‘आपकी फेसबुक वॉल पर प्रलेस के वीरेन्द्र यादव और सन्तोष भदौरिया का समर्थन सबसे पहले आया है, देखिये।’ फिर भी मैंने कहा कि यह आपत्ति आयोजक के रूप में वहीं होनी चाहिए थी। हलांकि मैंने उनके कहने के बाद जब अपना फेसबुक खोला तो मुझे वहां वीरेन्द्र यादव की टिप्पणी तो दिखी, लेकिन सन्तोष भदौरिया की कहीं नहीं दिखी। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि प्रलेस को फातमी जी के लगातार ऐसे वक्तव्यों और समानान्तर के साम्प्रदायिक पुट लिये नाटकों पर सालों से आपत्ति रही है, और अब तो ये दोनों ही प्रलेस के प्राथमिक सदस्य भी नहीं है। मुझे यह नयी जानकारी हुई थी, इसलिए इस पर मैं बात कर ही रही थी कि घर से एक जरूरी फोन आने लगा, इसलिए मैंने बात खतम कर दी। दोपहर 12 बजे के आसपास जब मैं उसी दिन कचहरी पर होने वाले एक प्रोटेस्ट में भागीदारी करने जा रही थी, तभी फातमी जी का फोन आया। मैंने इस दिमागी तैयारी के साथ फोन उठाया कि फातमी जी अब मुझसे झगड़ा करने वाले हैं, लेकिन आश्चर्य और खुशी हुई कि उन्होंने यह कहते हुए मुझसे माफी मांगी कि ‘मुझसे यह गलती अनजाने में हुई है।’ मैंने इस ‘अनजानेपन’ पर थोड़ी बात की कि आप कई बार लोगों के टोकने पर भी ये अनजानापन करते हैं और फिर कहा कि लेकिन यह माफी आपको मुझसे नहीं सबसे मांगनी चाहिए। वे इसके लिए भी तुरन्त तैयार हो गये। उन्होंने बताया कि वे मुझसे बात करने के पहले राजेन्द्र कुमार जी और ‘जनमत’ से भी बात कर चुके हैं। उनसे हुई पूरी बात मैंने उस प्रोटेस्ट से लौटने के बाद लगाने का वादा किया और लगभग डेढ़ घण्टे बाद बाकी काम पीछे छोड़ इसे लगा भी दिया।–

‘’दोस्तों

थोड़ी देर पहले मेरे पास अली अहमद फातमी जी का फोन आया कि वे अपने कल के वक्तव्य पर माफी चाहते हैं और ये गलती उनसे अनजाने में हुई है। मैंने उनसे कहा कि हो सकता है कि समाज में महिला विरोधी माहौल होने के नाते आप ये गलती अनजाने में करते हों, लेकिन टोकने के बाद किसी गलती को सोचें समझे तरीके से सुधारा जाता है, पर आपने टोकने के बाद भी नहीं सुधारा। दूसरे, माफी केवल मुझसे नहीं सबसे मांगनी चाहिए, सार्वजनिक रूप से।
इस पर उन्होंने कहा कि मैं माफी मांगने के साथ ये वादा करता हूं कि आइंदा ऐसी गलती नहीं करूंगा, लेकिन क्योंकि मैं फेसबुक पर नहीं हूं मेरी माफी मांगने की बात आप ही सबसे बता दीजिए।
उन्होंने यह भी कहा कि जनमत कि मीना राय को फोन कर उन्होंने कह दिया है कि लेख से महिला विरोधी सारे वक्तव्यों को हटा दिया जाए, तब प्रकाशित किया जाय।‘’

इस पोस्ट को लगाने के पहले घर लौटने के समय मेरे पास प्रलेस लखनऊ की किरन सिंह का फोन आया, जिसे मैं मोपेड पर होने के कारण नहीं उठा सकी, घर आकर मैंने उन्हें फोन किया, तो उन्होंने मेरी पोस्ट का हवाला देकर पूछा कि ‘मुझे सन्तोष भदौरिया ने तुमसे बात करने का कहा है, क्या हुआ था वहां?’ मैंने उनसे कहा ‘वहां भदौरिया जी खुद मौजूद थे, उन्होंने ही स्वागत वक्तव्य दिया था, तो क्या उन्होने ये नहीं बताया कि क्या हुआ था?’

भदौरिया जी वहां उपस्थित थे इस बात पर आश्चर्य जताते हुए उन्होने यह कहकर फोन रख दिया कि ‘मैं उनसे ही बात करती हूं।’

इसके थोड़ी देर बाद सन्तोष भदौरिया जी का फोन आया। उन्होंने कल हुई घटना पर खेद जताते हुए कहा कि ‘कल गलती तो हो गयी, लेकिन अब बहुत हो गया, हम प्रेस विज्ञप्ति जारी कर निंदा करने जा रहे हैं।’ मैंने उनसे कहा आपको ये सब पहले करना चाहिए था। अब जो भी करना है करिये, लेकिन आपको बता दूं कि फातमी जी ने माफी मांग ली है और मैं ये फेसबुक पर लगाने जा रही हूं।’

मैंने पोस्ट लगा दी। शाम को मैंने देखा कि लखनऊ की उषा राय की वाल पर प्रलेस की प्रेस विज्ञप्ति लगी हुई है, जिसमें फातमी जी के बयान की निंदा के साथ यह भी कहा गया है कि ‘वे नजर रखेंगे कि उन्हें एक साल तक कोई भी संगठन किसी भी मंच पर न बुलाये।’

प्रलेस के इस बयान में दो बातें तुरन्त खटकने वाली थीं। पहली ये, कि इसमें 31 के आयोजन को मात्र ‘जसम का आयोजन’ कहा गया था। यानि यह प्रलेस और जलेस का भी आयोजन था, इस बात से ही पल्ला झाड़ लिया गया था। दूसरे, इस विज्ञप्ति में फातमी जी द्वारा माफी मांग लिये जाने और भविष्य में फिर ऐसा न किये जाने का वादा करने के आश्वासन का जिक्र तक नहीं किया गया था, जबकि यह बात मैं भदौरिया जी को बता भी चुकी थी और फेसबुक पर दोपहर लिख भी चुकी थी। यह दोनों गलतियां जिस मंशा से की गयीं थी, इसे लेकर इलाहाबाद के साहित्यिक घेरे के एक अलग ही हलचल शुरू हो गयी। अगले दिन मैंने प्रलेस के संजय श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल पर लिखा देखा कि ‘दोस्तो प्रलेस के कल के फातमी जी वाले बयान में यह गलत चला गया कि आयोजन जसम का था, जबकि जलेस और प्रलेस इसमें ‘भागीदार’ संगठन के रूप में थे।’ इस पोस्ट पर जब किसी ने टिप्पणी की कि ‘संजय जी इस बात को मूल विज्ञप्ति में ही एडिट करके कह दिया जाय तो ठीक रहेगा’, तो उसके नीचे इलाहाबाद प्रलेस की कोषाध्यक्ष नीलम शंकर की टिप्पणी थी कि ‘कोई एडिट, वेडिट नहीं’। इससे प्रलेस की खुद को पाक-साफ जताने की मंशा पर किसी को भी शक होगा ही, लोगों को हुआ भी। यह विज्ञप्ति अगले दिन ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में प्रकाशित भी हो गयी। उस दिन मेरे पास फिर फातमी जी का फोन आया और उन्होंने कहा कि उन्होंने तो माफी मांग ली है फिर ये सब क्यों? अगर अब भी कोई शिकायत है तो फिर से माफी मांगता हूं। मैंने उन्हें बताया कि इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है, और ये भी कहा कि हो सकता है ‘मेरी आपकी फोन पर हुई बात को वे तवज्जो न दे रहे हों, इसलिए आप 7 अप्रैल को जोश और मजरूह पर होने वाले कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से माफी मांग लें। वे एक मिनट की भी देर किये बगैर तैयार हो गये। और मैंने उस दिन फिर से फेसबुक पर लिखा-

‘’क्योंकि अली अहमद फातमी जी ने अपने वक्तव्य के लिए माफी मांग ली है, आइंदा ऐसी बातें न बोलने का वादा कर चुके हैं, जनमत को फोन कर लेख के महिला विरोधी और फूहड़ अंश हटा लेने को कह चुके हैं, और अब ये भी कह चुके हैं कि शहर में 7 अप्रैल को होने वाले कार्यक्रम में भी वे सार्वजनिक तौर पर सबसे माफी मांगने को तैयार हैं, तो मेरी ओर से यह झगड़ा फिलहाल खत्म है। (फिलहाल इसलिए कि वे या कोई और भी फिर से ऐसे वक्तव्य देगा तो फिर यह शुरू हो जाएगा)।

कृपया अब इस मामले को आगे कर लोग फातमी जी से अपनी पुरानी दुश्मनी निभा डालने की कोशिश न करें, और मुझे फोन कर यह समझने की कोशिश न करें कि ‘आप को ये नहीं ये’ या ‘ऐसे नहीं वैसे’ करना चाहिए था।‘’

लेकिन अब तक भीतर-भीतर बहुत कुछ पक चुका था। उस दिन फातमी जी के समर्थक, जिनका प्रलेस के मौजूदा इलाहाबाद ग्रुप से पुराना झगड़ा है वे इस प्रेस विज्ञप्ति से चिढकर खुलकर फातमी जी के समर्थन में आ गये और वे मेरे ऊपर आरोप लगाने लगे कि मेरे कारण फातमी जी के विरोधियों को बोलने का मौका मिल गया। अब उनसे अपना-अपना पुराना झगड़ा निपटाने के चक्कर में फातमी जी के समर्थक उनके बयान को भी ‘महिला विरोधी नहीं’ बताने लगे और एक सही लड़ाई पर लीपा-पोती की जाने लगी। इसके बाद प्रलेस के दोनों गुटों और फातमी समर्थकों और फातमी विराधियों ने एक दूसरे पर जिस तरह से कीचड़ फेंकना शुरू किया, वह फातमी जी के 31 तारीख के दिये गये बयान के कम गन्दा नहीं है।

दरअसल इस मामले में इलाहाबाद प्रलेस के मौजूदा समूह की ओर से आया बयान उचित होने के बाद भी प्रलेस के दूसरे समूह और उसके बाहर के लोगों का भी उनकी मंशा पर शक होना स्वाभाविक था, खुद मुझे भी हुआ। उसकी वजह ये है कि प्रलेस फातमी जी के महिला विरोधी बयान के कारण उनका तो बहिस्कार करने की बात कर रहा है, लेकिन उसके वर्तमान उपाध्यक्ष महिलाओं के प्रति घटिया सोच, चुगलखोरी, उनके निजी जीवन पर घटिया बातें करना, जैसी हरकतों के कारण इलाहाबाद के साहित्यिक हलकों में कुख्यात हैं। खुद प्रलेस की नये और पुराने दोनों समूहों की महिलायें इससे त्रस्त रहीं है, महिलायें ही नहीं, पुरूष भी क्योंकि वे हर महिला का नाम किसी न किसी से जोड़कर उसे बदनाम भी करते रहते हैं। लेकिन पता नहीं क्या वजह है कि प्रलेस का मौजूदा इलाहाबाद समूह उन्हें सीने से लगाये हुये है। कुछ दिन पहले तक, जब तक सन्तोष भदौरिया इलाहाबाद के वर्धा केन्द्र में थे, तब तक ये उपाध्यक्ष वहां हर रोज होने वाली ‘अड्डेबाजी’, (ये शब्द मेरा नहीं है बल्कि शहर के दूसरे बहुत से लोगों और वर्धा केन्द्र में काम करने वाले बहुत से लोगों का है) का हिस्सा हुआ करते थे।

अगर प्रलेस को सचमुच फातमी जी के महिला विरोधी बयान से तकलीफ पहुुंची है, तो उसे अपने उपाध्यक्ष पर भी अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि वे वहां आज तक बने हुए हैं, लाख शिकायतों के बावजूद उनका बहिस्कार क्यों नही किया गया? तब प्रलेस की मंशा पर किसी को शक नहीं होगा। दिक्कत की बात ये है कि फातमी जी के समर्थकों के दिमाग में ये बात मथ रही है, लेकिन वे इसे खुल कर बोल नहीं रहे है।ं लीजिये मैंने यह भी बोल दिया। लड़ना हो तो सीधे बताकर लड़ो कि लड़ाई किसके खिलाफ है, नही ंतो मत लड़ो।
इनमें से प्रलेस की पुरानी सदस्य उर्मिला जैन का पक्ष मुझे फिर भी ठीक लगा कि उन्होंने बेशक प्रलेस से अपने पुराने झगड़ों को इस घटना के माध्यम से फिर से खोल दिया, लेकिन फातमी जी के बयान के समर्थन में नहीं खड़े हो गयीं।

जलेस और जसम ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध ली। जबकि यह सवाल जसम की पत्रिका ‘जनमत’ पर भी है, क्योंकि फातमी जी ने अपने वक्तव्य के दौरान ही बताया कि यह लेख ‘जनमत’ में छपने जा रहा है। उन्हें वहीं आपत्ति करनी चाहिए थी कि ‘वे इस तरह का महिला विरोधी लेख नहीं छापते हैं।’ लेकिन उन्होंने न तब बोला न विरोध के बाद। फातमी जी ने खुद अपने आपत्तिजनक अंश उसमें से हटाने के लिए कहा है, जबकि जनमत को ही ऐसा करना चाहिए था

प्रलेस की इस अन्दरूनी कलह के अनुसार अपना पक्ष-विपक्ष चुनने के अलावा कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने फातमी जी से अपनी ‘दोस्ती’ को महिला विरोधी बयान की मुखालफत से ज्यादा महत्व दिया और उनके पक्ष में स्टैण्ड लेकर उन्हें क्लीन चिट दे दी। हलांकि मैं यह बताती चलू,ं कि फातमी जी की मुखालफत के बावजूद मेरी खुद फातमी जी से दोस्ती नहीं खत्म हुई, क्योंकि उन्होंने उसके लिए माफी मांग ली। लेकिन लोगों को शायद यह लगता है कि दोस्त की हर सही-गलत बात की हां में हां मिलाना ही दोस्ती है। लाल बहादुर वर्मा ने 30 मार्च को ही इलाहाबाद में ‘जश्ने दोस्ती’ नाम से कार्यक्रम किया, जिसके आमन्त्रण पत्र में दोस्ती के सन्दर्भ में अन्य बातों के अलावा यह भी लिखा था, ‘क्या आपने कभी अपने मित्र की सार्वजनिक खिचाई की है?’ वर्मा जी, उस दिन मैंने सबसे ज्यादा उम्मीद आपसे ही की थी कि आप फातमी जी की इस बयान के लिए खिंचाई जरूर करेंगे, क्योंकि आप फातमी जी के बाद वक्ता थे, लेकिन उस दिन तो मुझे निराशा हुई ही, बाद में फातमी जी के फोन से और अमर उजाला में छपी खबर से पता चला कि खिंचाई तो दूर, आपने भी उन्हें क्लीन चिट दे दी है। 3 की सुबह जब मैं बनारस जाने के लिए बस में थी फातमी जी का फोन आया और उन्होंने मुझसे कहा कि ‘सीमा जी मेरे माफी मांग लेने के बावजूद प्रलेस वाले इस तरह की अखबारबाजी कर रहे हैं यह ठीक नहीं है’ मैंने भी सहमति जताई कि ‘हां अब ये सब अब ठीक नहीं है और मेरी ओर से ये मामला खत्म मुझे आपसे अब कोई शिकायत नहीं है।’ फिर उन्होंने कहा कि ‘मैं जानता हूं, इसलिए अब आप बीच से हट जाइये अब मैं भी कुछ करूंगा और अब मैं 7 अप्रैल के आयोजन में माफी भी नहीं मांगूगा।’ मैं चुप हो गयी। आगे उन्होंने जो कहा उससे मुझे इसकी दूसरी वजह समझ में आयी। उन्होंने बताया कि लाल बहादुर वर्मा जी के सम्मान में कल रात जफर बख्त के यहां एक डिनर पार्टी थी, जिसमें वर्मा जी के अलावा अंशु और यश मालवीय और पद्मा जी भी थीं। वहां मैंने अपना वही लेख सुनाया, और उन लोगों को उसमें कुछ भी गलत नहीं लगा। मुझे दो नामों पर आश्चर्य हुआ लाल बहादुर वर्मा और उससे भी ज्यादा स्त्री मुक्ति संगठन की पद्मा सिंह, क्योंकि वे खुद फातमी जी के ऐसे महिला विरोधी बयानों के कई किस्से मुझे सुना चुकी थी और मेरी आपत्ति वाली फेसबुक पोस्ट पर किसी ने टिप्पणी में बताया था कि वे एक कार्यक्रम में फातमी जी के ऐसे बयान पर सार्वजनिक आपत्ति भी कर चुकी हैं और खुद उन्होंने मुझे वहां सैल्यूट किया। मैंने फातमी जी से कहा कि आपने एडिट करके सुनाया होगा तो उन्होंने कहा, जी नहीं हूबहू सुनाया था। तब मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने उनसे यह कहकर फोन रख दिया कि ‘मैं इससे सहमत नहीं हूं कि आपके लेख में कुछ भी गलत नहीं था, उनके क्लीन चिट दिये जाने के बावजूद मैं अपनी राय पर कायम हूं, लेकिन आपने माफी मांग ली इसलिए आपसे मेरा झगड़ा खत्म आपको जो करना हो करिये।’ फोन रखने के बाद मैंने पद्मा जी को मेसेज किया कि फातमी जी ऐसा कह रहे हैं ‘क्या ये सच है?’ पद्मा का जवाब आया कि ‘कल (4 अप्रैल वाले) महिला मार्च में मिलेंगे तो बात करेंगे, ‘ये ट्विस्टेड नॉट करेक्ट।’ अगले दिन महिला मार्च के बाद बहुत सारी इधर-उधर की बातें करने के साथ ठोस पूछने पर उन्होंने बताया कि फातमी जी ने जो लेख सुनाया था उसमें ये बात थी कि ‘राजेन्द्र जी अपनी सदरी और बीबी दोनों को गले लगाकर रखते हैं।’ हलांकि ये भी अपने आप एक बेतुकी बात है, पर सरासर गलत है। लगभग दो सौ लोगों ने फातमी जी का बयान उस दिन सुना है सबके भाषणों की रिकार्डिग भी की जा रही थी, इस बात को आराम से लोगों से पूछा भी जा सकता है और रिकार्डिंग सार्वजनिक कर सुनी भी जा सकती है। अगर इस लेख में सब कुछ सही ही था, तो मैं ‘जनमत’ से आग्रह करती हूं कि वे फातमी जी के बयान को बिना एडिट किये हूबहूं छाप दें, रिकार्डिंग बिना एडिट किये ओपन कर दें और इसका फैसला लोगों पर छोड़ दें कि वह गलत था या नहीं। इससे यह भी पता चल जायेगा कि उन्होंने अपना एडिटेड लेख लोगों को सुनाया है या समारोह में पढ़ा गया लेख। समारोह में उपस्थित लोग इसकी तस्दीक कर देंगे। लेकिन वर्मा जी तो समारोह में भी थे और उस डिनर पार्टी में भी, उन्हें तो यह समझ में आ ही गया होगा, फिर उन्होंने क्यों किया ऐसा, मैं नहीं कह सकती।
फातमी जी के समर्थकों ने इस पूरी लड़ाई में मेरे ऊपर कई आरोप लगाये, वे आरोप बताना मैं जरूरी समझती हूं, क्योंकि उससे भी उस दिन के ठहाके के माध्यम से कही गयी बात खुलकर समझ में आती है। उसके साथ ही उन आरोपों पर मैं अपना मत भी रख रही हूं।

सबसे पहले पद्मा जी की ओर से लगाया गया एक तकनीकी आरोप, कि मुझे इस बात को लेकर सोशल मीडिया में नहीं जाना चाहिए था। पद्मा जी की बात से मैं 50 प्रतिशत सहमत हूं। मुझे लगता है कि जब कोई घटना दो लोगों या एक छोटे से दायरे में घटित हुई हो, तो उस पर सोशल मीडिया पर लड़ाई नहीं छेड़नी चाहिए क्योंकि इसमें वे लोग भी शामिल हो जाते हैं, जो दूसरा पक्ष जानते ही नहीं, लेकिन उसमें एकतरफा अपनी राय रखते रहते हैं। लेकिन जब कोई बयान सार्वजनिक तौर पर दिया गया हो, तो उसकी निंदा भी सार्वजनिक तौर पर ही होनी चाहिए, और यह बयान फातमी जी ने भरी महफिल में सार्वजनिक तौर पर ही दिया था। उसके बाद उनके समर्थन में जो आरोप मेरे पर लगाये गये वे भी सार्वजनिक ही हैं।

दो आरोप मुख्य रूप से प्रलेस इलाहाबाद के पूर्व सचिव अविनाश मिश्रा ने लगाये, लेकिन उनके पीछे उनके साथ और लोग भी थे। पहला यह कि मेरे इस सार्वजनिक निंदा से फातमी जी के विराधियों को ‘वितण्डा’ करने का अवसर मिल गया। अविनाश जी, इसका ख्याल मुझे नहीं, फातमी जी को रखना चाहिए था, कि उनके विरोधी उन पर जो आरोप लगाते हैं, उस पर वे सोचें और वैसा करने से बचें ताकि उनके विरोधियों का मुंह बंद हो सके। लेकिन ये मौका उन्होंने खुद उन्हें दे दिया मैंने नहीं। मुझे आपके पुराने झगड़ों से क्या मतलब? फिर भी मैंने फातमी जी जैसे ही उनके एक धुर और मुखर विरोधी प्रलेस के मौजूदा उपाध्यक्ष को चेताने के लिए लिख दिया था कि ‘इसका उपयोग कोई अपनी दुश्मनी निकालने के लिए न करे’, उस वक्त तो मुझे ये भी नहीं मालुम था कि पूरा प्रलेस ही फातमी जी का विरोधी है।

उन्होंने मुझ पर दूसरा आरोप ये लगाया कि मैंने अनावश्यक फातमी जी की आलोचना की, उनके वक्तव्य में ‘हल्कापन तो था, लेकिन स्त्री विरोध नहीं।’ यह अपने आप में ही एक स्त्री विरोधी बयान है कि औरतों के मजाक उड़ाने वाले, उन्हें सामान मानने वाले बयान को सिर्फ ‘हल्का’ कहा जाय स्त्री विरोधी नहीं। अविनाश जी बार-बार इस बहस में मेरी बात को ‘स्त्री विमर्श’ कहकर महिला आत्म सम्मान की लड़ाई की गम्भीरता और महत्व को कम करने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें इन दोनों में फर्क समझना चाहिए। और अभी हमने लड़ाई ही लड़ी है, स्त्री विमर्श तक तो पहुंचे ही नहीं है, साथ ही स्त्री ‘विमर्श’ में हो सकता है आप ही मुझ पर बीस पड़ें, लेकिन स्त्री सम्मान पर लड़ने में ही लोगों की पक्षधरता खुलकर सामने आती है।

इस लड़ाई को स्त्री विमर्श कहने वाले दिल्ली के कवि विमल कुमार जी ने पहले फोन पर मुझसे बहस की, फिर अपने फेसबुक पर आरोप लगाया कि ‘यह विमर्श जो कि खूनी हो गया है एक स्त्री साहित्यकार द्वारा पुरूष साहित्यकार को नीचा दिखाकर ऊपर उठने का प्रयास है।’ विमल कुमार की इस बात पर मुझे पहले इसलिए हंसी आयी कि चलो मुझे भी साहित्यकार माना जाने लगा, कमतर ही सही। लेकिन उनसे ये पूछने का मन हो रहा है कि यदि मेरा आशय वही होता जो आपने कहा है तो मैं फातमी जी को ही क्यों चुनती, दूसरों को या खुद आपको ही क्यों नहीं? जवाब यही है न कि क्योंकि उन्होंने ऐसी टिप्पणी कर मुझे मौका दे दिया? तो आप लोग कृपया ऐसी टिप्पणियों से बचकर महिलाओं को आगे आने का मौका न दें और सर्वोच्चता पर कायम रहें। हमें दुख नहीं होगा।

एक आरोप यश मालवीय ने लगाया। उनका कहना है कि ‘फातमी जी के बयान की निंदा करने वालों को साहित्य की समझ ही नहीं है उनका बस चलता तो वे फिराक, बेदी, कृश्नचन्दर, निराला आदि को देश निकाला दे देते।’ वास्तव में यश मालवीय का यह आरोप ही सभी आरोपों में ऐसा आरोप है जिस पर सबसे अच्छा और स्वस्थ स्त्री विमर्श हो सकता है।
मैं उनसे ये कहना चाहती हूं कि हो सकता है कि आपको साहित्य की समझ मुझसे बेहतर हो, लेकिन ये सामने आ गया कि जनवाद की समझ मुझमें आपसे बेहतर है। औरतों का मजाक उड़ाने वाले साहित्य को अलोकतान्त्रिक और पितृसत्तात्मक सोच वाला साहित्यकार ही ‘अच्छा साहित्य’ कह सकता है। यह सही है कि अच्छा साहित्य रचने वाले बहुत से साहित्यकारों की भाषा और सोच में भी पितृसत्ता रही है। क्या इसके खिलाफ बोलना गलत है? कुछ साहित्यकारों के साथ ये ‘समय की सीमा’ इसलिए कह सकते हैं कि उस रचना के समय या उस साहित्यकार के रचनाकाल के समय तक पितृसत्ता के खिलाफ लड़ने की चेतना इतना विकसित नहीं हुई थी। लेकिन आज जबकि महिलाओं और दलितों ने अपने आन्दोलनों से जनवाद की चेतना को सर्वव्यापी बना दिया है, तो अब इस दौर में उनके खिलाफ लिखना या बोलना आपका पिछड़ापन और सामंती पितृसत्तात्मक दंभ के सिवाय कुछ नहीं है। फिराक चूंकि इलाहाबाद में रहे है और मेरी पीढ़ी के तुरन्त पहले वाले लोगों के जेहन में भी अभी उनकी याद ताजा है, इसलिए लोगों से अक्सर उनके किस्से सुनने को मिलते रहते हैं। पढ़ने में वे जितने अच्छे रचनाकार लगते हैं उनके बारे में सुनने में वे उतने ही गाली-गलौच करने वाले असभ्य और सामंती इंसान लगते हैं। खुद फातमी जी उनके महिलाओं को अपमानित करने वाले सन्दर्भो को भरी महफिल में सुनाकर लोगों को आनन्दित करते रहते हैं। अब यश मालवीय के बयान से यह समझ में आया कि ये लोग उन्हें इस पर इसलिए नहीं टोकते हैं क्यों ऐसा करना फिराक पर उंगली उठाना होगा और उन पर उंगली उठाना उनके साहित्य पर उंगली उठाना होगा। जबकि वे मानते हैं कि एक बार जो महान हो गया उसकी कही गयी हर बात महान ही होनी चाहिए। साहित्य और साहित्कारों के बारे में ऐसी समझ रखने के कारण इन क्षेत्रों में फिराक जैसे लोग बेहतर इंसान नहीं बन पाते, और हम सब उनका और बेहतर पढ़ने से वंचित रह जाते हैं। अब के पहले के साहित्य में जो भी गैरजनवादी है उसकी शिनाख्त होनी चाहिए ताकि आगे उसे और जनवादी बनाया जा सके। वास्तव में जनवाद एक ऐसी चेतना है जो मंजिल मिलने के बाद मंजिल आगे बढ़ा लेती है। यश मालवीय ने जितने भी साहित्यकारों का नाम लेकर फातमी का बचाव किया है, हम आज की मंजिल के हिसाब से हम उनका मूल्यांकन नहीं करेंगे, लेकिन उसकी शिनाख्त जरूर करेंगे। और जब हम आज के साहित्यकारों पर बात करेंगे, तो आज के जनवाद की मंजिल को ध्यान में रखकर ही करेंगे न कि पीछे छूट चुकी मंजिल को ध्यान में रखकर। बल्कि साहित्यकार तो और भी आगे की देख लेता है, तो उसे तो आज की जनवादी चेतना के भी आगे रहना चाहिए। यश मालवीय जी चाहें तो जनवाद की इस समझदारी पर मुझसे बात कर सकते हैं इस बहाने मैं भी उनकी साहित्यिक समझ से लाभान्वित होउंगी। लेकिन शर्त एक ही है कि यह लाभान्वयन ‘शाम की पेय गोष्ठी’ में न होकर दिन के उजाले में ठण्डे पानी और गरम चाय के साथ होगा। वास्तव में आज जन संगठनों के साथ हर लेखक संगठन को भी अपने यहां इस जनवाद और जनवादीकरण पर जरूर बात करनी चाहिए, वरना वे स्त्रीविमर्श और दलित विमर्श को अस्मितावादी विमर्श कहकर वर्ग और इसके बीच का द्वन्दात्मक रिश्ता देखने से वंचित रह जायेंगे।

अन्त में ये कि इस पूरे अनुभव ने मुझे ये बता दिया कि उस दिन फातमी जी ने जो वक्तव्य दिया, वह अकेले उनका नहीं था, बहुत सारे लोगों का था। मैं तो फातमी जी की तारीफ करूंगी कि उन्हें मेरे विरोध का पता चलते ही तुरन्त माफी मांगने में न देर की न ही संकोच किया। लेकिन उनके आस-पास मौजूद लोगों ने उन्हें क्लीन चिट देकर उन्हें 7 अप्रैल को सार्वजनिक माफी मांगने से रोक दिया, वरना इससे फातमी जी के तथाकथित विरोधियों का ही मुंह बन्द होता। सच मानिये मुझे इस एक सप्ताह में यह बात अच्छे से समझ में आ गयी कि बार-बार टोके जाने के बावजूद फातमी जी ऐसे क्यों हैं। उन्हें ऐसा बनाये रखने में उनके मौजूदा समर्थकों के साथ उनके मौजूदा विरोधी भी शामिल है। फातमी जी आप अकेले दोषी नहीं है।

गलती केवल फातमी जी की नहीं ,

पितृसत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का एक अनुभव

यह पढने के बाद दिल्ली की ही सामाजिक  कार्यकर्ता जुलैख़ा  जी ने सीजीबास्केट क़ो यह लिखा .

 

बिल्कुल सही हेडिंग लगाई है सीमा जी आपने. जैसा कि हमने पहले भी कहा (लिखा) था अभी भी वही कहना चाहते हैं.
ज़रूरी सवाल यही है के हाशिए के तमाम तबक़ों (जिनमें औरतें, दलित, आदिवासी, मुसलमान, ट्रांसजेंडर, मेहनतकश अवाम शामिल हैं) के बारे में सार्वजनिक तौर पर मंचों/निज़ी चर्चा में उनकी मौजूदगी/ग़ैर मौजूदगी में, उनकी अस्मिता को मजरूह (चोट ) करने की हिम्मत इन श्रेष्ठ प्राणि वर्ग में आती कहां से है?
और ये भी के – वहां मौजूद सरों (एकाध को छोड़कर) ज़्यादातर के लिए “जाने भी दो यारो” जैसा चालु नज़रिया “वापरने” का “ग़ैर संवैधानिक” हौसला कहां से मिलता है?
ऐसे अमानवीय/आपराधिक कृत्य को हल्का मज़ाक़ या भाषा की त्रुटि मात्र समझने वाले बेशर्मों के भीतर डर, झिझक, शर्म क्यूं नहीं पैदा होती? वहां मौजूद “भीड़” में किसी भी तरह का लेहाज़ छोड़कर, “कहने” वाले की ग़लत बयानी पर टोक देने/बात वापिस लेने के लिए दबाव बनाने की ज़िम्मेदारी का एहसास क्यूं नहीं जागता?
ये कुछ ज़रूरी सवाल हैं. जो, ख़ुद को समझदार/प्रगतिशील कहाने वालों
की तरफ़ से (पब्लिक का पब्लिक में, निज़ी का निज़ी में) उठाया ही जाना चाहिए…फ़िर लेकिन भी अगर आप जवाब देने से बचना चाहते हैं….! तो बेशक जाईये…. लोकतंत्र का फ़ायदा उठाईये…!!!
वे तमाम “नर-मादा” जो ग़ैर इंसानी, सामंती, श्रेष्ठतावादी पितृसत्ता की सड़ांध मारती लाश को छाती से चिपकाए ब्राह्मणवाद की ग़ुलाम “क़लम” थामे लोग हमारी नज़रों में सिवाय चारण के कुछ और हो ही नहीं सकते हैं- फ़िर चाहे वे लेफ़्ट हों या “राईट”, जसम हो या जलेस-प्रलेस, जनमत हो या समानांतर क्या फ़र्क़ पड़ता है? क़लम “बेचु” तथाकथित प्रख्यात (कुख्यात) नामी “बड़े” साहित्य मठाधीशों के “नामों में लगी पूंछ” उनके “पावर बैंक”/आक्सीज़न सेंटर्स का ख़ुद ही पता दे रही हैं…! औरतें हमेशा से इनके मनोरंजन/शाब्दिक जुगाली का सबसे आसान (मुफ़्त का) और पसंदीदा शग़ल रही है. जो इनकी मर्दानगी के “ठस्स” को क़ायम रखने में (हर सूरत) तत्पर रही है. ये बेग़ैरत भीड़ हैं, इनके मुख से निकले अनुचित( किसी भी नागरिक, जातीय, धार्मिक समुदाय के ख़िलाफ़) शब्दों को संवैधानिकता और क़ानूनी धाराओं में जब तक (थोक में) क़ैद नहीं करवाया जाएगा तब तक इनकी ग़ुलाम ज़हनियत (मानसिकता) पे लगाम नहीं लग सकती…!!! “जाने भी दो यारों” का चलन अब छोड़ना ही होगा… अब तो बोलने के ख़तरे उठाने ही पड़ेंगे….

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