कोल इंडिया के एसईसीएल कंपनी : सिंचाईका पानी नहीं तो नहीं चलेगी कोयला खदान_भी.

उन्होंने कोयला खोदने के लिए जमीन ली, बदले में वहां की जनता को रोजी-रोटी देने और उस क्षेत्र के विकास का आश्वासन था। लेकिन यह आश्वासन मुनाफे और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया! वह उस भूजल को भी किसानों को सिंचाई के लिए देने के लिए तैयार नहीं है, जो कोयला उत्खनन के बाद निकलता है और यूं ही बर्बाद हो जाता है।

यह कहानी किसी निजी कोयला कंपनी की नहीं है, सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न मानी जाने वाली कोल इंडिया के एसईसीएल कंपनी की है, जिसका सुरकछार एरिया प्रबंधन वहां के किसानों को ऐसा भूमिगत जल ही देने से इंकार कर रहा है, जबकि कोरबा जिले का यह हिस्सा भयंकर सूखे की चपेट में है और गरीब किसान किसी भी तरह अपनी बची-खुची फसल को बचाने के जतन में लगे हैं। ऐसे समय में किसानों के प्रति संवेदनशील होने के बजाय पानी देने में टाल-मटोल करके आज प्रबंधन अपनी जगजाहिर किसान विरोधी सोच का ही प्रदर्शन कर रहा है, जबकि इस काम के लिए उसे अपनी अंटी से कुछ खर्चना भी नहीं है।

#मार्क्सवादीकम्युनिस्टपार्टी ही ऐसे समय में क्षेत्र के किसानों का सहारा बनती आई है, जिसके बैनर तले आक्रोशित किसानों ने, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं, आज 5 अगस्त को एसईसीएल के सुरकछार एरिया प्रबंधन कार्यालय का माकपा के कोरबा जिला सचिव प्रशांत झा, किसान सभा नेता सुखरंजन नंदी ,दिलहरण बिंझवार व जनवादी महिला समिति की नेता सावित्री चौहान और रमा के नेतृत्व में घेराव कर दिया और मुख्य द्वार पर ताले जड़कर मजदूरों औऱ अधिकारियों की आवाजाही तक रोक दी। कार्यालय के दो घंटे तक जाम रहने के बाद प्रबंधन आंदोलनकारियों से बातचीत करने के लिए बाध्य हुआ और खेतों में पानी पहुंचाने के लिए दो दिनों की मोहलत मांगी। इससे सुरकछार गांव के 100 परिवारों की 50 हेक्टेयर जमीन में लगी धान की फसल के बचने की उम्मीद बंधी है। माकपा के ज्ञापन में किसानों ने एरिया प्रबंधन को 3 दिनों के अंदर खेतों में पानी उपलब्ध कराने की मांग की है, अन्यथा 8 अगस्त से खदान बंद करने की चेतावनी दी है।

इस आंदोलन से पहले किसानों ने पिछले एक साल में कई बार पार्टी के राज्य समिति सदस्य सपुरण कुलदीप के जरिये पानी देने के लिए अधिकारियों से अनुनय-विनय किया था, लेकिन यह नम्रता काम न आई। कहावत भी है, #लातोंकेभूतबातोंसेनहींमानते! एसईसीएल पर चढ़े किसान विरोधी भूत को आंदोलन की लात से ही रास्ते पर लाने की जुगत अब किसान जनता समझ रही है।

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